अध्याय 14 : भारतवर्ष की नदियाँ और जनपद
पुण्य-सलिला नदियाँ और जनपद
ऋषियों ने प्रश्न किया – “हे सूत जी! भारतवर्ष के पर्वतों का श्रवण कर हम धन्य हो गए। अब कृपया यहाँ बहने वाली पवित्र नदियों और उनके तटों पर बसे हुए जनपदों का वर्णन कीजिए। कौन सी नदी कहाँ से निकलती है? किन जनपदों में कैसे लोग रहते हैं? यह ज्ञान हमारी तीर्थ-यात्रा का मार्ग प्रशस्त करेगा।” सूत जी बोले – “भारतवर्ष में असंख्य नदियाँ हैं, जिनमें कुछ हिमालय से, कुछ विन्ध्य से और कुछ सह्याद्रि से निकलती हैं। इन नदियों का जल पुण्यदायक और पापनाशक है। यहाँ अनेक जनपद बसे हैं, जो भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृति के पोषक हैं।”
हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ
हिमालय पर्वत से गंगा, सिन्धु, सरस्वती, यमुना, शतद्रु (सतलुज), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), चन्द्रभागा (चिनाब), ईरावती (रावी), कुहू, गोमती, सरयू, कोशी, गण्डकी, बाहुदा, दृषद्वती आदि अनेक नदियाँ निकलती हैं। गंगा तो स्वर्ग से अवतरित हुई मानी जाती है और यह तीनों लोकों में पवित्र है। यमुना सूर्यपुत्री कहलाती है। सरस्वती तो अन्तःसलिला रहकर भी तीर्थ-रूप में पूजी जाती है।
विन्ध्य और सह्याद्रि की नदियाँ
विन्ध्य पर्वत से नर्मदा, ताप्ती, वेत्रवती, कर्मण्वती, गोदावरी, भीमरथी, वेणा, तुङ्गभद्रा आदि नदियाँ निकलती हैं। नर्मदा को शिवजी की पुत्री कहा गया है और इसकी परिक्रमा का विशेष माहात्म्य है। सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) से कावेरी, कृष्णवेणी, पयस्विनी, शरावती आदि नदियाँ बहती हैं। ये नदियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में वैभव और समृद्धि लाती हैं।
गङ्गा सिन्धुः सरस्वती च यमुना शतद्रुस्तथा ।
वितस्ता विपाशा चन्द्रभागा ईरावती कुहूः ॥
गोमती सरयूश्चैव हिमवत्पादसम्भवाः ।
नर्मदा ताप्ती वेत्रवती विन्ध्यपादविनिर्गताः ॥
भारतवर्ष के जनपद
भारतवर्ष में अनेक जनपद बसे हुए हैं, जिनमें कुरु, पाञ्चाल, कोसल, विदेह, मगध, अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, चोल, केरल, पाण्ड्य, सौराष्ट्र, आभीर, शूरसेन, मत्स्य, चेदि, काशी, मालव, सिन्धु-सौवीर, गन्धार, काम्बोज, बाह्लीक आदि प्रमुख हैं। ये सब जनपद अपनी-अपनी भाषा, वेशभूषा और आचार-व्यवहार के लिए प्रसिद्ध हैं। मध्यदेश आर्यावर्त कहलाता है, जो सबसे पवित्र भूमि मानी जाती है।
नदियों और जनपदों का महत्त्व
ये नदियाँ केवल जलस्रोत ही नहीं हैं, अपितु भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा हैं। गंगा-यमुना के तट पर अनेक राजर्षियों ने यज्ञ किये। नर्मदा-तट पर मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम था। कावेरी के किनारे अगस्त्य मुनि निवास करते थे। जनपदों की इस विविधता में भी एक सूत्र में बँधी सनातन संस्कृति दिखायी पड़ती है। यहाँ जन्म लेने वाला मनुष्य पुण्यात्मा होता है और इन पावन नदियों के स्मरण-मात्र से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
स्मरणादेव गङ्गायाः पापं याति सहस्रधा ।
नाशयन्ति दुरितानि सर्वनद्यः शुभोदकाः ॥
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्तः ॥