अध्याय 23 : ग्रहों की गति और उनका प्रभाव
ग्रहों की गति और मानव जीवन पर प्रभाव
ऋषियों ने पूछा – “हे सूत जी! सूर्य, चन्द्र के अतिरिक्त भी अनेक ग्रह हैं जो आकाश में विचरण करते हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु – ये ग्रह कहाँ से उत्पन्न हुए? इनकी गति कैसी है और ये मानव के भाग्य पर कैसा प्रभाव डालते हैं? हमें ग्रहों के विषय में सविस्तार बताइए।” सूत जी ने कहा – “ये सभी ग्रह कर्म-देवता हैं, जो मनुष्य के पूर्व-जन्मों के शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने के लिए नियुक्त हैं। इनकी गति और स्थिति ही ज्योतिष-शास्त्र का आधार है।”
नवग्रहों की उत्पत्ति
सूर्य तो भगवान विष्णु के तेज से उत्पन्न हुए हैं। चन्द्रमा समुद्र-मन्थन से प्रकट हुए। मंगल (भौम) पृथ्वी के पुत्र हैं और भूमि-पुत्र कहलाते हैं। बुध चन्द्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के पुत्र हैं। बृहस्पति अंगिरा ऋषि के पुत्र और देवताओं के गुरु हैं। शुक्र भृगु ऋषि के पुत्र और दानवों के गुरु हैं। शनि सूर्य और छाया के पुत्र हैं। राहु सिंहिका का पुत्र है, जो समुद्र-मन्थन के समय अमृत पीकर अमर हो गया था और विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया – सिर वाला भाग राहु और धड़ वाला भाग केतु कहलाया।
सूर्याचन्द्रमसौ देवा मङ्गलश्चोर्वरीसुतः ।
बुधो बृहस्पतिः शुक्रः शनैश्चरफणीश्वरौ ॥
ग्रहों की गति और राशि-चक्र
ये सब ग्रह बारह राशियों के चक्र में अपनी-अपनी गति से भ्रमण करते हैं। सूर्य एक राशि में एक मास रहता है। चन्द्रमा एक राशि में ढाई दिन रहता है। मंगल डेढ़ मास, बुध एक मास, बृहस्पति एक वर्ष, शुक्र एक मास और शनि ढाई वर्ष तक एक राशि में रहता है। राहु-केतु की गति सदा वक्र (उल्टी) होती है। ये सभी ग्रह मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं और वायु के बन्धनों से बँधे हुए हैं।
ग्रहों का शुभ-अशुभ प्रभाव
सूर्य आत्मा के कारक हैं और पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं। चन्द्रमा मन और माता के कारक हैं। मंगल साहस और भाई-बहन का प्रतिनिधित्व करता है। बुध बुद्धि और वाणी का देवता है। बृहस्पति ज्ञान और सन्तान का कारक है। शुक्र वैभव और पत्नी का स्वामी है। शनि कर्म और दुःख का देवता है। राहु भ्रम और केतु मोक्ष का कारक है। जिस मनुष्य की कुण्डली में जैसा ग्रह जिस भाव में बैठता है, वैसा ही उसका फल मिलता है। यह सम्पूर्ण व्यवस्था ईश्वर की न्याय-प्रणाली है।
ग्रहाणां गतयः सर्वाः कर्मपाशेन योजिताः ।
शुभं वाशुभमत्यन्तं मानवानां प्रयच्छति ॥
ग्रह-शान्ति और उपासना का फल
सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य नवग्रहों की उत्पत्ति और उनकी गति का ज्ञान रखता है, वह ग्रह-दोषों से मुक्त हो जाता है। उसे नियमित रूप से ग्रह-मन्त्रों का जाप और दान करना चाहिए। इस अध्याय के श्रवण से ग्रह-पीड़ाएँ शान्त होती हैं और जीवन में सुख-शान्ति आती है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे त्रयोविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥