अध्याय 21 : सूर्यदेव की उत्पत्ति और उनका मण्डल
सूर्यदेव का प्रादुर्भाव और दिव्य मण्डल
ऋषिगण बोले – “हे सूत जी! सूर्यदेव सम्पूर्ण जगत के चक्षु हैं। इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? इनका रथ, सारथि और घोड़े कौन से हैं? सूर्यमण्डल में किन-किन देवताओं का निवास है और सूर्य की परिक्रमा का क्या रहस्य है? कृपया हमें सूर्यदेव के जन्म और उनके वैभव का विस्तृत ज्ञान दीजिए।” सूत जी ने कहा – “सूर्य भगवान विष्णु के ही तेज से उत्पन्न हुए हैं। ये ब्रह्माण्ड के आत्मा हैं और इनकी उपासना से आरोग्य, ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती है।”
सूर्यदेव की उत्पत्ति की कथा
जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का आरम्भ किया तो उन्होंने देखा कि संसार अन्धकारमय है। तब उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया। विष्णु जी ने अपने नेत्र-कमल से एक अद्भुत तेज प्रकट किया, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने लगा। उसी तेज से सूर्यदेव का प्रादुर्भाव हुआ। सूर्य को विवस्वान भी कहा जाता है। इनका विवाह प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ। संज्ञा से वैवस्वत मनु, यम और यमुना नामक तीन सन्तानें हुईं। सूर्य का तेज असह्य था, जिससे संज्ञा ने अपनी छाया (छाया नामक प्रतिमूर्ति) वहाँ छोड़ दी और स्वयं अश्विनी बनकर तप करने चली गयीं। छाया से शनैश्चर (शनि), सावर्णि मनु और ताप्ती नदी उत्पन्न हुए।
विष्णोर्नेत्रसहस्रस्य तेजसः सम्भवो रविः ।
ब्रह्मणा प्रार्थितो लोकान् प्रकाशयितुमुद्यतः ॥
सूर्य का रथ, सारथि और सप्त अश्व
सूर्यदेव का रथ सोने का बना है और नौ हजार योजन लम्बा है। इस रथ में एक पहिया और बारह नाभियाँ हैं, जो बारह महीनों का प्रतीक हैं। इस रथ में सात हरे रंग के घोड़े जुते हैं, जिनके नाम हैं – गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति। ये सात वैदिक छन्दों के प्रतीक हैं। रथ का सारथि अरुण है, जो विनता का पुत्र और गरुड़ का बड़ा भाई है। अरुण शरीर से बिना पैरों का है, किन्तु अपने हाथों से लगाम थामे हुए सूर्य-रथ का संचालन करता है।
सूर्यमण्डल में देवताओं का निवास
सूर्यमण्डल एक विशाल दिव्य नगर के समान है। बारह महीनों में बारह अलग-अलग आदित्य सूर्यमण्डल में रहते हैं, जो सूर्य के अंश हैं – धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान, पूषा, पर्जन्य, अंशुमान, भग, त्वष्टा और विष्णु। साठ हजार वालखिल्य ऋषि सूर्य के आगे-आगे चलते हैं और स्तुति करते हैं। गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, नाग और राक्षस भी मण्डल में निवास करते हैं और बारी-बारी से सूर्य की सेवा में लगे रहते हैं।
रथेनैकचक्रेण सप्ताश्वेनारुणेन च ।
याति सूर्यो जगच्चक्षुः सहस्रकिरणोज्ज्वलः ॥
सूर्य-वर्णन का फल
सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य प्रतिदिन सूर्योदय के समय इस अध्याय का पाठ करता है या श्रवण करता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी होता है। उसे नेत्र-रोग नहीं होता और वह दीर्घायु होता है। सूर्य की यह उत्पत्ति-कथा महापातकों का नाश करने वाली है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥