अध्याय 31 : तीर्थयात्रा का फल और नियम
तीर्थयात्रा का अक्षय फल और उसके नियम
नैमिषारण्य के ऋषियों ने पूछा – “हे सूत जी! तीर्थयात्रा को सब पापों का नाश करने वाली कहा जाता है। तीर्थ कितने प्रकार के हैं? तीर्थयात्रा पर जाने वाले मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए? तीर्थ में स्नान, दान और श्राद्ध का क्या फल है? और तीर्थयात्रा करने वाले को किन बातों से बचना चाहिए? कृपया हमें तीर्थयात्रा का सम्पूर्ण फल और नियम बताइए।” सूत जी ने कहा – “तीर्थयात्रा तपस्या का ही एक रूप है। जो श्रद्धापूर्वक तीर्थयात्रा करता है, वह अपने सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।”
तीर्थों के प्रकार और महत्त्व
तीर्थ तीन प्रकार के होते हैं – जङ्गम तीर्थ, स्थावर तीर्थ और मानस तीर्थ। साधु-सन्त, गुरु, पिता और पति जङ्गम तीर्थ हैं। पवित्र नदियाँ, पर्वत, सरोवर और तीर्थ-स्थान स्थावर तीर्थ हैं। सत्य, क्षमा, दया और इन्द्रिय-संयम मानस तीर्थ हैं। स्थावर तीर्थों में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी प्रमुख हैं। प्रयाग, काशी, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र और सेतुबन्ध (रामेश्वरम्) ये तीर्थ-राज कहलाते हैं। इन तीर्थों में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं।
तीर्थानि तु त्रिधा प्रोक्तानि जङ्गमं स्थावरं तथा ।
मानसं चेति विप्रेन्द्राः सर्वपापहरं परम् ।।
गुरवः साधवो भर्ता पिता माता च जङ्गमम् ।
गङ्गाद्याः स्थावराः प्रोक्ताः सत्याद्यं मानसं स्मृतम् ॥
तीर्थयात्रा के नियम और सावधानियाँ
तीर्थयात्रा पर जाने वाले को संयमी और ब्रह्मचारी रहना चाहिए। पैदल चलने का विशेष पुण्य है। रास्ते में किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए, न ही झूठ बोलना चाहिए। तीर्थ में स्नान करके देव-दर्शन करना चाहिए और यथाशक्ति दान करना चाहिए। तीर्थ में केश-मुण्डन, पिण्डदान और श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जो मनुष्य तीर्थ में क्रोध करता है, काम-भोग करता है या छल करता है, उसकी तीर्थयात्रा निष्फल हो जाती है और वह पाप का भागी होता है। तीर्थ-जल की एक बूँद भी महापातकों का नाश करने वाली होती है।
तीर्थयात्रा का पुण्य-फल
सूत जी ने कहा – “जो मनुष्य एक बार भी तीर्थयात्रा कर लेता है, वह यमराज के भय से छूट जाता है। तीर्थ में त्यागे हुए प्राण मोक्ष देने वाले होते हैं। इस अध्याय के श्रवण से सब तीर्थों की यात्रा का फल मिलता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥