radha bhajan

आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा लिरिक्स (Aarti Nagdwara Sheshshai Avatara Lyrics in Hindi) - Mahadev Arti - Bhaktilok

691 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:
आरती | Aarti Lyrics

आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा लिरिक्स (Aarti Nagdwara Sheshshai Avatara Lyrics in Hindi) - Mahadev Arti - Bhaktilok

सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा में भगवान शिव की आराधना और उनकी पावन आरती का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है। "आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा" भगवान शिव और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के उस परम स्वरूप का सजीव चित्रण करती है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं। शेषनाग की शैया पर विराजमान भगवान विष्णु और उनके आराध्य भगवान आशुतोष महादेव के समन्वय को दर्शाती यह दिव्य आरती साधक के अंतर्मन को जागृत कर देती है। सावन मास, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि तथा सोमवार के पावन अवसरों पर इस आरती का सस्वर गायन करने से साधक को भवसागर से तरने की असीम शक्ति प्राप्त होती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन आरती के संपूर्ण बोल, इसका सरल हिंदी अर्थ, शास्त्रीय संदर्भ, गायन विधि और इसके आध्यात्मिक रहस्यों का सविस्तार अध्ययन करेंगे, जिससे आपकी साधना और अधिक पुष्ट हो सके।

अध्याय एवं श्रेणी जानकारी

श्रेणी: Evening Bhajan, Mahadev Bhajan, Mahadev Song, Evening Prayer & Aarti | स्रोत: पारंपरिक सनातन भक्ति साहित्य

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा, भक्ति भाव से जो गावे, पावे भवपारा। ॐ जय शिव ओंकारा... एकाननन चतुराननन पंचाननन राजे, हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे। ॐ जय शिव ओंकारा... दो भुज चार चतुर्भुज दशभुज अति सोहे, तीन रूप त्रिलोकन जनन सकल मोहे। ॐ जय शिव ओंकारा... अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी, चंदन मृगगम सोहै भाले शशि धारी। ॐ जय शिव ओंकारा... श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे, सनकादिक ब्रह्मादिक सुर मुनि संगै। ॐ जय शिव ओंकारा... कर के बीच कमंडल चक्र त्रिशूल धर्ता, जगकर्ता जगहर्ता जगपालन कर्ता। ॐ जय शिव ओंकारा... ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, 4 मधु कैटभ दोउ मारे सुर होए सुभ एका। ॐ जय शिव ओंकारा... लक्ष्मी और सावित्री पार्वती साजा, पार्वती आधींगी, शिवजी महाराज राज। ॐ जय शिव ओंकारा... तन में जो भभूत रमाने, हलाहल को पीने, भक्तों के संकट को पल में तू ही हरने। ॐ जय शिव ओंकारा... जो कोई आरती गावे, शिवजी को ध्यावे, कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे। ॐ जय शिव ओंकारा...

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

यह पावन आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह अद्वैत वेदांत और शैव-वैष्णव समन्वय का एक अद्भुत काव्य रूप है। आइए इसके प्रत्येक चरण के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

प्रथम चरण: ओंकार स्वरूप और त्रिमूर्ति का रहस्य

आरती के आरंभ में भगवान शिव को 'ओंकार' (प्रणव मंत्र) का स्वरूप बताया गया है। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव—यह तीनों शक्तियां वास्तव में एक ही परम ब्रह्म के तीन अलग-अलग पहलू हैं। "अर्द्धांगी धारा" यह दर्शाती है कि प्रकृति (शक्ति) और पुरुष (शिव) का मिलन ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।

द्वितीय चरण: नागद्वारा और शेषशायी का स्वरूप

"आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा" पंक्ति में भगवान विष्णु (शेषशायी, जो क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर विराजते हैं) और भगवान शिव (जो गले में नाग लपेटे रहते हैं) के उस अद्वैत संबंध को उजागर किया गया है जहाँ दोनों में कोई भेद नहीं है। शिव और विष्णु एक ही परम शक्ति के दो रूप हैं। जो भक्त इस रहस्य को समझकर प्रेमपूर्वक इस आरती का गान करता है, वह इस संसार रूपी भवसागर को आसानी से पार कर लेता है।

तृतीय चरण: अनंत रूपों और विभूतियों का वर्णन

भगवान के रूप असीम हैं। एक मुख वाले, चार मुख वाले ब्रह्मा जी, पांच मुख वाले सदाशिव और उनके विभिन्न वाहन (हंस, गरुड़ और वृषभासुर नंदी) इस बात के प्रतीक हैं कि संपूर्ण प्रकृति और जीव-जंतु उन्हीं के नियंत्रण में हैं। त्रिगुणमयी माया के स्वामी होने के कारण वे संपूर्ण संसार को अपनी मोहनी शक्ति से संचालित करते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

शब्द / पद सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
शेषशाई शेषनाग की शैया पर लेटने वाले भगवान विष्णु का क्षीरसागर में योगनिद्रा रूप
नागद्वारा नागों के स्वामी या द्वारपाल रूप भगवान शिव जिनका आभूषण नाग है
पंचाननन पाँच मुख वाले सदाशिव के पाँच मुख (ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात)
हलाहल विष / जहर समुद्र मंथन के समय निकला घातक विष जिसे शिव ने पिया
बाघम्बर बाघ की खाल पहनने वाले वैराग्य और भौतिक मोह से परे होने का प्रतीक
भवपार संसार सागर से मुक्ति जन्म-मरण के चक्र से छूट जाना

आरती में वर्णित देवता की महिमा | Glory of the Deity

भगवान शिव आदियोगी, महादेव और संहारकर्ता के रूप में पूजनीय हैं। इस आरती में शिव और विष्णु के अभेद का दर्शन कराया गया है। शास्त्रों में कहा गया है— "शिवः विष्णुः च भेदं यः करोति प्रमूढधीः" (जो शिव और विष्णु में भेद करता है, वह अज्ञानी है)। यह आरती उसी महान दार्शनिक एकता को पुष्ट करती है। भगवान शिव भक्तों के संकटों का निवारण करने वाले आशुतोष हैं, जो हलाहल विष पीकर भी नीलकंठ कहलाए और संपूर्ण संसार को जीवनदान दिया।

यदि आप भगवान शिव की अन्य स्तुतियों का भी पाठ करना चाहते हैं, तो हमारे पावन लेख शिव तांडव स्तोत्र का अध्ययन अवश्य करें, जो साधक में ऊर्जा और ओज का संचार करता है। इसी प्रकार संध्या वंदन के समय श्री हनुमान चालीसा का पाठ भी मानसिक बल प्रदान करता है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

सनातन संस्कृति में आरती केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा की पराकाष्ठा है। आरती की थाली सजाते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • थाली की सामग्री: चांदी, पीतल या तांबे की थाली में कपूर, शुद्ध घी का दीपक, कुमकुम, अक्षत (अतूट चावल), पुष्प, और जल से भरा आचमनी पात्र रखें।
  • दीप प्रज्वलन: घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। दीपक में पाँच बत्तियां (पंचमुखी दीपक) जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • आरती का क्रम: आरती गाते समय थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएं। सबसे पहले भगवान के चरणों में चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार, और मुखमंडल पर तीन बार दीप घुमाते हुए कुल सात बार पूर्ण वृत्त बनाएं।
  • शंख और घंटी: आरती के दौरान निरंतर घंटी बजाएं और आरती के अंत में शंखनाद अवश्य करें, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

एक नजर में आरती की जानकारी | Aarti Quick Information

आरती का नाम आरती नागद्वारा शेषशाई अवतारा (Mahadev & Vishnu Aarti)
आराध्य देव भगवान शिव (महादेव) एवं भगवान विष्णु (शेषशायी)
प्रमुख अवसर सोमवार व्रत, सावन मास, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि, दैनिक संध्या वंदन
भाषा ब्रज-प्रभावित हिंदी / सरल अवधी
मुख्य संदेश शिव-विष्णु अभेद, भक्ति और शरणागति द्वारा भवसागर से तरना
श्रेणी Evening Bhajan & Mahadev Aarti

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस आरती का मुख्य भाव भगवान शिव और भगवान विष्णु के अद्वैत स्वरूप को समझना है। यह बताती है कि जगत के पालनकर्ता विष्णु और संहारकर्ता शिव दोनों एक ही परम ब्रह्म की दो अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं, जिनकी शरण में जाने से मनुष्य भवसागर पार कर लेता है।

यह आरती प्रतिदिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में भगवान शिव की पूजा के समय गाना अत्यंत फलदायी है। विशेषकर सोमवार के दिन, सावन मास में और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इसका सस्वर पाठ विशेष रूप से लाभकारी होता है।

हाँ, आप इसे घर के मंदिर में संध्या पूजन के दौरान अकेले या परिवार के साथ सस्वर गा सकते हैं। सच्ची निष्ठा और पवित्र भाव से की गई आरती से घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति का संचार होता है।

आरती के समय शरीर और मन की स्वच्छता का ध्यान रखें। दीप प्रज्वलित करते समय घी या शुद्ध तेल का उपयोग करें, थाली को घड़ी की दिशा में घुमाएं और अंत में दोनों हाथों से आरती की ज्योति लेकर अपनी आंखों से लगाएं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन भक्ति परंपरा, पौराणिक ग्रंथों और पारंपरिक संकीर्तन साहित्यों के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की सुविधा और प्रामाणिकता को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक सही उच्चारण और भाव के साथ प्रभु की आराधना कर सकें।


स्रोत एवं संदर्भ

1. शिवमहापुराण - कोटि रुद्र संहिता एवं विधिसंघ.
2. पारंपरिक सनातन आरती संग्रह एवं भजन रत्नावली.
3. श्रीमद्भगवद्गीता - भक्ति योग संदर्भ.

संबंधित भजन एवं लेख

आपकी साधना को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए हमारे अन्य पावन लेखों का भी अध्ययन करें:

शिव तांडव स्तोत्रम्

रावण रचित ओजस्वी स्तोत्र जो साधक में शिवभक्ति और पराक्रम जगाता है।

श्री हनुमान चालीसा

संकट मोचन महाबली हनुमान जी की महिमा और संपूर्ण चालीस चौपाइयों का पाठ।

राधा कृष्ण पावन भजन

प्रेम रस से ओतप्रोत युगल सरकार के मधुर संकीर्तन और पद।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 25 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!