🙏 मैं राधा वल्लभ की – राधा वल्लभ मेरे

(Main Radha Vallabh Ki – Radha Vallabh Mere) – श्री राधा वल्लभ संकीर्तन

🌸 राधा वल्लभ – कृष्ण का राधा प्रिय स्वरूप | पूर्ण समर्पण और शरणागति का संकीर्तन

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: राधा-कृष्ण भजन / संकीर्तन / शरणागति
🎶 भाव: समर्पण, आत्मीयता, श्रद्धा, निस्वार्थ प्रेम
📍 विशेषता: राधा वल्लभ (कृष्ण) के साथ अपने नित्य संबंध का स्मरण, भटकने के बाद शरणागति
📀 प्रचलन: राधा वल्लभ सम्प्रदाय और राधा-कृष्ण भक्तों में अत्यंत प्रिय संकीर्तन

📜 संकीर्तन लिरिक्स (हिन्दी में)

मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे

तुम सदा-सदा से मेरे
राधा वल्लभ मेरे
तुम सदा-सदा से मेरे
राधा वल्लभ मेरे
तुम सदा-सदा से मेरे
राधा वल्लभ मेरे

हम सदा-सदा से तेरे
राधा वल्लभ मेरे
हम सदा-सदा से तेरे
राधा वल्लभ मेरे
हम सदा-सदा से तेरे
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे

हम भटक चुके बहुतेरे
राधा वल्लभ मेरे
हम दुख पाए बहुतेरे
राधा वल्लभ मेरे
हम दुख पाए बहुतेरे
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे

अब रखिए अपने नेरे
राधा वल्लभ मेरे
तुम सदा-सदा से मेरे
राधा वल्लभ मेरे
हम सदा-सदा से तेरे
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे

जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश
जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद
जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश
जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद
जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश
जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद
जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश
जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद

मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे
मैं राधा वल्लभ की
राधा वल्लभ मेरे

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / राधा वल्लभ संकीर्तन

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह श्री राधा वल्लभ संकीर्तन अत्यंत सरल किन्तु गहन समर्पण भाव से युक्त है। “मैं राधा वल्लभ की, राधा वल्लभ मेरे” – भक्त कहता है कि मैं राधा वल्लभ (श्रीकृष्ण) का हूँ, और राधा वल्लभ मेरे हैं। यह परस्पर संबंध का स्मरण है – जैसे राधा और कृष्ण अभिन्न हैं, वैसे ही भक्त और प्रभु का संबंध भी नित्य और अटूट है।

“तुम सदा-सदा से मेरे” और “हम सदा-सदा से तेरे” – यह दोहराव भक्त के विश्वास को दृढ़ करता है कि यह संबंध अनादि है, सदा से है और सदा रहेगा। यह भक्ति का अभेद भाव है – जहाँ “मैं तुम्हारा” और “तुम मेरे” का अहसास होता है।

“हम भटक चुके बहुतेरे, हम दुख पाए बहुतेरे” – भक्त स्वीकार करता है कि उसने संसार में बहुत भटकना और दुख सहा है। अब वह थक गया है और राधा वल्लभ की शरण में आता है। “अब रखिए अपने नेरे” – अब हमें अपने पास (समीप) रखिए।

अंत में जयघोष है – “जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश, जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद” – राधा वल्लभ (कृष्ण) की जय, और श्री वृन्दावन (जहाँ रास-लीला होती है) के वनचंद (चंद्रमा के समान सुंदर) की जय।

यह संकीर्तन सिखाता है कि सच्चा भक्त वह है जो स्वयं को पूर्ण रूप से राधा वल्लभ को समर्पित कर देता है, और यह जानता है कि उसका प्रभु भी सदा उसके साथ है। यह भक्ति में पूर्ण आत्मसमर्पण और विश्वास का गीत है।

🔍 संकीर्तन का विशेष महत्त्व

राधा वल्लभ सम्प्रदाय: यह भजन राधा वल्लभ सम्प्रदाय (हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित) में अत्यंत महत्वपूर्ण है। “राधा वल्लभ” का अर्थ है राधा के प्रिय – श्रीकृष्ण। इस सम्प्रदाय में राधा को सर्वोपरि माना जाता है और कृष्ण उनके वश में हैं।

“मैं राधा वल्लभ की” – समर्पण का उच्चतम भाव: यह पंक्ति बताती है कि भक्त का सर्वस्व राधा वल्लभ हैं, और वह उनका है। इसमें किसी प्रकार की शर्त या अपेक्षा नहीं, केवल समर्पण है।

भटकने के बाद शरणागति: “हम भटक चुके बहुतेरे” – यह स्वीकारोक्ति बहुत महत्वपूर्ण है। सच्चा भक्त वही है जो अपनी असफलताओं और भटकन को स्वीकार करता है और फिर प्रभु की शरण में आता है।

💖 राधा वल्लभ के प्रति समर्पण

🎯 संदेश

जब भक्त सच्चे मन से कहता है “मैं राधा वल्लभ की”, तो वह अपना अहंकार, अपनी स्वतंत्रता और अपनी सारी चिंताएँ प्रभु को सौंप देता है। राधा वल्लभ उसके सदा अपने रहते हैं, और भक्त सदा उनका।

✨ आस्था का प्रतीक

यह संकीर्तन राधा-कृष्ण भक्ति के गहरे रस में डुबो देता है। “राधा वल्लभ मेरे” के बार-बार दोहराने से भक्त के हृदय में अपनत्व और विश्वास का संचार होता है।

🙏 राधे-राधे ।। जय राधा वल्लभ ।। जय श्री वृन्दावन धाम ।।

॥ इति राधा वल्लभ संकीर्तन सम्पूर्णम् ॥
॥ मैं राधा वल्लभ की, राधा वल्लभ मेरे – तुम सदा-सदा से मेरे, हम सदा-सदा से तेरे ॥