प्रस्तावना एवं परिचय
सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
🙏 तुझे देख के जी भरता ही नहीं – अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया
श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें।
(Tujhe Dekh Ke Jee Bharta Hi Nahin – Ab Jaun Kahan Main Sanwariya) – कृष्ण भजन / विरह गीत
विवरण एवं मुख्य बिंदु
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
तुझे देख के जी भरता ही नहीं,
तुझे देख के जी भरता ही नहीं।
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया,
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया।
मोहन छोड़ गए, दिल तोड़ गए,
अब बनके फिरूँ मैं बावरिया,
अब बनके फिरूँ मैं बावरिया।
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया।
मुरली की मीठी तानों पर,
दिल मेरा कन्हैया खोने लगा।
मुरली की मीठी तानों पर,
दिल मेरा कन्हैया होने लगा।
अब आ के सुना दो बाँसुरिया,
अब आ के सुना दो बाँसुरिया।
अब मिल भी जाओ साँवरिया।
तिरछी चितवन, बाँकी है अदा,
तेरे नैन कटीले कजरारे।
तिरछी चितवन, बाँकी है अदा,
तेरे नैन कटीले कजरारे।
अब तेरे बिना दिल लगता नहीं,
अब तेरे बिना दिल लगता नहीं।
अब काहे सताए साँवरिया,
अब मिल भी जाओ साँवरिया।
तुझे देख के जी भरता ही नहीं,
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया,
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया,
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया।
🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / कृष्ण विरह गीत
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह अत्यंत मार्मिक कृष्ण विरह भजन है। “तुझे देख के जी भरता ही नहीं” – भक्त कहता है कि साँवरिया (कृष्ण) को देखकर भी मन नहीं भरता, दर्शन की तृप्ति नहीं होती। “अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया” – अब मैं कहाँ जाऊँ? तुम्हीं मेरे सब कुछ हो।
“मोहन छोड़ गए, दिल तोड़ गए, अब बनके फिरूँ मैं बावरिया” – मोहन ने मुझे छोड़ दिया, दिल तोड़ दिया, अब मैं पागल (बावरिया) बनकर फिरूँगा।
पहले अंतरे में – मुरली की मीठी तानों पर दिल कन्हैया में खोने लगा, और फिर वहीं होने लगा (अर्थात लीन हो गया)। भक्त कहता है – अब आकर बाँसुरी सुनाओ, और मिल भी जाओ साँवरिया।
दूसरे अंतरे में – तिरछी चितवन, बाँकी अदा, कटीले कजरारे नैन – कृष्ण के मोहक रूप का वर्णन। “अब तेरे बिना दिल लगता नहीं” – तुम्हारे बिना दिल कहीं नहीं लगता। अब क्यों सताते हो? मिल जाओ।
यह भजन प्रभु के वियोग में भक्त की व्याकुलता, उनके दर्शन की अतृप्त प्यास और मिलन की तड़प को दर्शाता है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
“तुझे देख के जी भरता ही नहीं” – अतृप्त दर्शन की प्यास: यह पंक्ति भक्त की उस स्थिति को दर्शाती है जहाँ प्रभु के दर्शन करने के बाद भी और अधिक देखने की तड़प बनी रहती है।
“मोहन छोड़ गए, दिल तोड़ गए” – विरह की पीड़ा: यह गोपियों के कृष्ण वियोग की उस पीड़ा को व्यक्त करता है जब कृष्ण वृन्दावन छोड़कर गए थे।
बावरिया (पागल) बनना: प्रेम में दीवाना हो जाना – यह भक्ति की वह अवस्था है जहाँ भक्त संसार की सुधि खो देता है।
💖 विरह भक्ति की गहराई
🎯 संदेश
सच्ची भक्ति में प्रभु के दर्शन की तृप्ति कभी नहीं होती – बार-बार देखने की प्यास बनी रहती है। जब वे मिलते नहीं, तो हृदय व्याकुल हो जाता है और भक्त बावरा (पागल) बन जाता है। यही प्रेम की सच्चाई है।
✨ आस्था का प्रतीक
यह भजन हर उस भक्त की आवाज़ है जो कृष्ण के वियोग में तड़पता है। “अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया” – यह पुकार प्रभु के अतिरिक्त किसी और में आशा न रहने को दर्शाती है।
🙏 जय श्री कृष्ण ।। साँवरिया मिल जाओ ।। अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया ।।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
प्रस्तुत राधा-कृष्ण भजन "तुझे देख के जी भरता ही नहीं (अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया) भजन लिरिक्स | Tujhe Dekh Ke Jee Bharta Hi Nahin Ab Jaun Kahan Main Sanwariya Bhajan Lyrics" के माध्यम से भक्त और आराध्य के परम संबंध को दर्शाया गया है। वैष्णव संप्रदाय में राधा-कृष्ण का प्रेम लौकिक प्रेम न होकर जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। इस भजन की एक-एक पंक्ति का सार यही है कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं राधा रानी के प्रेम के अधीन हैं। बिना राधा के न तो वे मुरली बजाते हैं और न ही गोपी-गोपियों को सुख देते हैं।
भजन के पदों में यह स्पष्ट होता है कि वृंदावन की कुंज गलियों में जब तक 'राधे-राधे' नाम की गूंज नहीं होती, तब तक भगवान श्यामसुंदर का मन भी वहां नहीं रमता। भक्त राधा जी से आग्रह करता है कि वे भी कृष्ण की इस भक्ति और दिव्यता का रहस्य उजागर करें, ताकि एक सामान्य साधक भी कृष्ण प्रेम का अधिकारी बन सके।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान कृष्ण की आराधना से पूर्व राधा जी का नाम स्मरण करना अनिवार्य माना गया है। राधा नाम की महिमा स्वयं कृष्ण गाते हैं। इस भजन को श्रद्धापूर्वक गाने या सुनने से साधक के हृदय में भक्ति रस का संचार होता है और मानसिक विकारों तथा चिंताओं का समूल नाश होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें। राधा-कृष्ण भजन के गायन से गृहक्लेश दूर होता है, दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और पारिवारिक वातावरण सात्विक बनता है। यदि इसका नियमित संकीर्तन किया जाए, तो साधक को मानसिक एकाग्रता और दिव्य शांति की अनुभूति होती है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
इस भजन के संकीर्तन के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) अथवा संध्या आरती के समय का है। गायन के समय दीप प्रज्वलित कर, तुलसी दल अर्पित करें और शुद्ध भाव से युगल सरकार (राधा-कृष्ण) की छवि का ध्यान करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
इस भजन के मुख्य आराध्य देव कौन हैं?
इस भजन के मुख्य आराध्य देव युगल सरकार अर्थात भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी जी हैं।
राधा-कृष्ण भजन का पाठ किस दिन विशेष रूप से करना चाहिए?
यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए हर दिन शुभ है, किन्तु एकादशी, पूर्णिमा और शनिवार/रविवार के दिन इसका संकीर्तन विशेष फलदायी माना गया है।
क्या यह भजन पारिवारिक सुख-शांति के लिए सहायक है?
हाँ, राधा-कृष्ण के भक्तिमय भजनों को घर में नियमित रूप से गाने अथवा सुनने से दांपत्य प्रेम बढ़ता है और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।
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