Krishna Bhajan

तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो लिरिक्स (Tara Hai Saara Zamana Lyrics in Hindi) - Krishna Bhajan Tripti Shaqya - Bhaktilok

67 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो" एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी कृष्ण भजन है, जिसे सुप्रसिद्ध भजन गायिका तृप्ति शाक्या ने अपनी मधुर आवाज में गाकर जन-जन के कंठ का हार बना दिया है। यह भजन मूलतः 'विनय' और 'शरणागति' (प्रपत्ति) के भाव पर आधारित है, जिसमें एक व्याकुल जीवात्मा अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण से भवसागर से पार उतारने की गुहार लगा रही है। सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में इस भजन का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। जब कोई भक्त संसार के प्रपंचों से थककर भगवान की शरण में आता है, तब उसके अंतर्मन से यही पुकार निकलती है। इस भजन में भगवान के उन ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों का स्मरण किया गया है जहाँ उन्होंने अपने भक्तों की रक्षा की और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या, शास्त्रीय संदर्भ और इसके गायन के महत्व का सांगोपांग विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो लिरिक्स


॥ कोरस ॥

तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।
हम को भी तारो श्याम हम को भी तारो॥
तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।

॥ अंतरा १ ॥

तुमने ही गोवर्धन उठाया, इन्द्र का मान घटाया।
कालिया नाग को नाथ के तुमने, यमुना का कष्ट मिटाया।
भक्तों के संकट निवारो श्याम हम को भी तारो॥
तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।

॥ अंतरा २ ॥

द्रोपदी की लाज बचाई, सभा में चीर बढ़ाई।
नरसी का भात भरा तुमने, भक्तों की लाज बचाई।
हमरी भी लाज बचाओ श्याम हम को भी तारो॥
तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।

॥ अंतरा ३ ॥

मीरा के तुम गिरधर कहलाए, विष का प्याला अमृत बनाए।
शबरी के जूठे बेर खाए, भक्तों के काज संवारे।
हमरी भी बिगड़ी बनाओ श्याम हम को भी तारो॥
तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।

॥ अंतरा ४ ॥

तुम हो दयालु दया के सागर, हम हैं पापी पाप के गागर।
अपनी दया का एक कतरा, हम पर भी बरसा दो गिरधर।
चरणों की सेवा लगाओ श्याम हम को भी तारो॥
तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मुख्य स्वर 'तारण' यानी उद्धार की कामना है। 'तारना' शब्द का अर्थ केवल भौतिक दुखों से मुक्ति नहीं, बल्कि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमात्मा के परम धाम को प्राप्त करना है। भक्त भगवान कृष्ण से कहता है कि हे श्यामसुंदर! आपने इस संसार के न जाने कितने जीवों का उद्धार किया है, इसलिए आपका नाम 'पतितपावन' और 'तारणहार' पड़ा है। जब आपने पूरे संसार (ज़माने) को तारा है, तो मुझ दीन-हीन पर भी अपनी कृपा दृष्टि डालिए और मुझे भी इस संसार रूपी भवसागर से पार उतारिए।

भजन के माध्यम से भक्त भगवान को उनके पूर्व में किए गए परोपकारों और भक्त-वत्सलता की याद दिलाता है। यह भगवान के प्रति उलाहना भी है और अनन्य विश्वास भी। भक्त जानता है कि वह स्वयं गुणों से हीन है, परंतु भगवान की दया असीम है। इसलिए, वह अपनी योग्यता के बल पर नहीं, बल्कि भगवान की अहैतुकी कृपा के बल पर मोक्ष की याचना कर रहा है। यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति योग के अत्यंत निकट है, जहाँ भगवान स्वयं कहते हैं कि जो मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसका योगक्षेम वहन करता हूँ।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह साधना मार्ग का एक महत्वपूर्ण सोपान है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शरणागति का चरमोत्कर्ष: भजन में भक्त अपने अहंकार को पूरी तरह शून्य कर देता है। वह स्वीकार करता है कि वह 'पाप की गागर' है और भगवान 'दया के सागर' हैं।
  • भक्तों के चरित्र का स्मरण: इसमें मीराबाई, द्रोपदी, नरसी मेहता और शबरी जैसे महान भक्तों का उल्लेख है। इन भक्तों का स्मरण करने से साधक के भीतर भी वैसी ही अनन्य भक्ति का उदय होता है।
  • करुण रस की प्रधानता: इस भजन का संगीत और शब्द विन्यास करुण रस से ओतप्रोत है, जो हृदय को द्रवित कर अश्रुधारा प्रवाहित करने में सक्षम है। अश्रुपात को भक्ति मार्ग में अंतःकरण की शुद्धि का सबसे बड़ा साधन माना गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान का नाम संकीर्तन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:

सर्वोत्तम समय: संध्या काल की आरती के समय या रात्रि के सत्संग में इस भजन को गाना अत्यंत प्रभावी होता है। शांत वातावरण में जब मन सांसारिक कार्यों से मुक्त होता है, तब इस भजन के शब्द सीधे हृदय में उतरते हैं।

गायन की विधि: इस भजन को गाते समय हाथ में करताल या मंजीरा लेकर, नेत्र बंद करके भगवान श्री कृष्ण के सौम्य रूप का ध्यान करना चाहिए। गायन में प्रदर्शन की भावना न होकर केवल और केवल पुकार का भाव होना चाहिए। यदि सामूहिक रूप से गाया जा रहा हो, तो कोरस के समय सभी भक्तों को एक स्वर में "श्याम हम को भी तारो" का उच्चारण करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण (श्यामसुंदर) को समर्पित है। भगवान कृष्ण को सनातन धर्म में पूर्ण पुरुषोत्तम अवतार माना गया है। वे केवल दुष्टों का संहार ही नहीं करते, बल्कि अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर उनके अत्यंत साधारण कार्यों को भी करते हैं। इस भजन में जिन संतों और भक्तों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं:

  • भक्तराज नरसी मेहता: गुजरात के परम वैष्णव संत, जिनका भात (मायरा) भरने स्वयं भगवान कृष्ण आए थे।
  • भक्त शिरोमणि मीराबाई: जिन्होंने गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व मान लिया था और जिनके लिए विष भी अमृत बन गया।
  • परम तपस्विनी शबरी: रामायण कालीन भक्त, जिनके प्रेम के वशीभूत होकर भगवान ने उनके जूठे बेर खाए थे।
  • महारानी द्रोपदी: जिनकी करुण पुकार पर भगवान ने अनंत चीर बढ़ाकर उनकी लाज की रक्षा की थी।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक धुनों और प्राचीन भक्ति पदों से प्रेरित है। आधुनिक समय में इसे सुप्रसिद्ध गायिका तृप्ति शाक्या ने अपने एल्बम के माध्यम से पुनर्जीवित किया। तृप्ति शाक्या की शास्त्रीय और सुगम संगीत पर मजबूत पकड़ ने इस भजन को एक नया आयाम दिया। इस भजन की पृष्ठभूमि ब्रज की रसिया और विनय परंपरा से जुड़ी है, जहाँ भक्त अपने आराध्य से अत्यंत आत्मीयता और अधिकार के साथ बात करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट है। इसकी काव्य शैली 'पद' शैली है, जिसमें एक स्थायी (मुखड़ा) और कई अंतरे होते हैं। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का प्रचुर प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए, "हम हैं पापी पाप के गागर, तुम हो दयालु दया के सागर" में 'पाप की गागर' और 'दया के सागर' के माध्यम से जीव और ईश्वर के बीच के अंतर और संबंध को अत्यंत खूबसूरती से दर्शाया गया है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. अहंकार का त्याग: जब तक मनुष्य के भीतर यह भ्रम रहता है कि वह स्वयं अपना उद्धार कर सकता है, तब तक उसे ईश्वर की पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं होती। समर्पण ही मोक्ष का मार्ग है।
  2. समता का भाव: भगवान जाति, वर्ण या सामाजिक स्थिति नहीं देखते। वे जहाँ महलों में रहने वाली द्रोपदी की पुकार सुनते हैं, वहीं वनवासी शबरी के जूठे बेर भी चाव से खाते हैं।
  3. प्रार्थना की शक्ति: जब संसार के सारे रास्ते बंद हो जाएं, तब ईश्वर की प्रार्थना ही एकमात्र संबल होती है। द्रोपदी की लाज बचाना इसी सत्य को प्रमाणित करता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
तारा (Tara) उद्धार किया, पार लगाया भवसागर से मुक्ति प्रदान करना।
ज़माना (Zamana) संसार, सृष्टि के जीव समस्त चराचर जगत के प्राणी।
मान (Maan) अहंकार, घमंड इंद्र का अभिमान जिसे कृष्ण ने गोवर्धन उठाकर तोड़ा था।
चीर (Cheer) वस्त्र, साड़ी द्रोपदी का वस्त्र हरण के समय बढ़ाया गया वस्त्र।
भात (Bhaat) मायरा, ननिहाल की रस्म नरसी मेहता की पुत्री के विवाह में दी गई भेंट।
कतरा (Katra) बूंद, अंश ईश्वर की असीम कृपा का एक छोटा सा अंश।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो..."
हे श्यामसुंदर! आपने इस चराचर जगत के अनगिनत जीवों का उद्धार किया है। जब आपने पूरे संसार को अपनी कृपा से कृतार्थ किया है, तो मुझ पर भी दया कीजिए और मुझे भी इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कीजिए।

"तुमने ही गोवर्धन उठाया, इन्द्र का मान घटाया..."
आपने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठ उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया था और वर्षा के देवता इंद्र के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था। हे प्रभु! मेरे जीवन में जो दुखों का पहाड़ है, उसे भी आप अपनी कृपा से उठा लीजिए।

"कालिया नाग को नाथ के तुमने, यमुना का कष्ट मिटाया..."
आपने यमुना नदी को कालिया नाग के भयंकर विष से मुक्त कराया था। उसी प्रकार मेरे मन रूपी यमुना में जो वासनाओं और विकारों का विष भरा है, उसे दूर कर मेरे अंतःकरण को शुद्ध कर दीजिए।

"द्रोपदी की लाज बचाई, सभा में चीर बढ़ाई..."
जब कुरुसभा में द्रोपदी असहाय थीं और कोई उनकी रक्षा करने वाला नहीं था, तब आपकी एक पुकार पर आपने वस्त्रों का अंबार लगा दिया। हे रक्षक! इस संसार रूपी सभा में मेरी भी लाज आपके ही हाथों में है।

"मीरा के तुम गिरधर कहलाए, विष का प्याला अमृत बनाए..."
मीराबाई ने जब आपको अपना पति मान लिया, तो उनके राणा द्वारा भेजे गए विष के प्याले को भी आपने अपनी कृपा से अमृत में बदल दिया। हे प्रभु! मेरे जीवन के कष्टों रूपी विष को भी आप आनंद रूपी अमृत में बदल दीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति भाव की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता के इस सुप्रसिद्ध श्लोक से होती है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

(श्रीमद्भगवद्गीता - १८.६६)

अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम तारा है सारा ज़माना श्याम हम को भी तारो
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण (श्यामसुंदर)
प्रसिद्ध गायिका तृप्ति शाक्या (Tripti Shaqya)
भाषा हिंदी (ब्रज मिश्रित)
भक्ति का भाव विनय, शरणागति, करुणा (Sharanagati Bhava)
मुख्य विषय भक्तों के उद्धार की पौराणिक कथाएं और मोक्ष की याचना
उपयुक्त अवसर कृष्ण जन्माष्टमी, एकादशी, संध्या आरती, सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन को सुप्रसिद्ध भजन गायिका तृप्ति शाक्या ने गाया है। उनकी भावपूर्ण और सुरीली आवाज ने इस भजन को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया है।

इस भजन में गोवर्धन धारण, कालिया नाग मर्दन, द्रोपदी चीर हरण, नरसी मेहता का भात, मीराबाई का विषपान और शबरी के जूठे बेर खाने जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख है।

'तारो' शब्द का अर्थ है 'उद्धार करना' या 'भवसागर से पार उतारना'। इसका तात्पर्य जीवात्मा को सांसारिक बंधनों और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करना है।

यह भजन मुख्य रूप से 'विनय भाव' और 'शरणागति भाव' पर आधारित है, जहाँ भक्त स्वयं को असमर्थ मानकर पूर्ण रूप से भगवान की कृपा पर निर्भर हो जाता है।

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन को शांति मिलती है, अहंकार का नाश होता है, और भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति और विश्वास सुदृढ़ होता है।

हाँ, कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी, और प्रत्येक एकादशी के अवसर पर इस भजन का गायन अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

"पाप की गागर" मनुष्य के अज्ञान और पापों का प्रतीक है, जबकि "दया के सागर" भगवान की अनंत और असीम करुणा को दर्शाता है, जो जीव के सभी पापों को नष्ट कर सकती है।

यह भजन सरल हिंदी भाषा में लिखा गया है, जिसमें ब्रज और लोक शैली का सुंदर सम्मिश्रण है, जिससे यह आम लोगों के लिए अत्यंत सुबोध बन जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस भजन के पाठ और भावार्थ की समीक्षा वैदिक विद्वानों और संगीत मनीषियों द्वारा की गई है। भजन में वर्णित सभी पौराणिक संदर्भ जैसे गोवर्धन लीला, द्रोपदी चीर हरण, और मीराबाई का चरित्र श्रीमद्भागवत महापुराण, महाभारत और भक्तमाल जैसे प्रामाणिक ग्रंथों पर आधारित हैं। यह भजन साधक को भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए एक उत्कृष्ट संबल है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण: भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन धारण का संदर्भ।
  • महाभारत (सभा पर्व): द्रोपदी चीर हरण और भगवान द्वारा वस्त्र बढ़ाने का प्रसंग।
  • भक्तमाल (नाभादास कृत): संत नरसी मेहता, मीराबाई और शबरी के भक्ति चरित्र का विवरण।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: शरणागति और भक्ति योग के सिद्धांत।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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