Krishna Bhajan

हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी लिरिक्स (Hey Gopal Krishna Karu Aarti Teri Lyrics in Hindi) - Shree Krishna Bhajan - Bhaktilok

155 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन धर्म की समृद्ध भक्ति परंपरा में भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति को दर्शाने वाला भजन "हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी" (Hey Gopal Krishna Karu Aarti Teri Lyrics) एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी रचना है। यह भजन मुख्य रूप से संध्या काल की आरती और दैनिक पूजा-अर्चना के समय गाया जाता है। वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांतों के अनुसार, भगवान कृष्ण की आरती उतारना केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा द्वारा परमात्मा के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम है। इस भजन में भगवान के विभिन्न मधुर रूपों—जैसे माखन चोर, राधा के प्यारे, मुरलीधर और गीता के उपदेशक—का स्मरण करते हुए भक्त उनके चरणों में अपनी भक्ति अर्पित करता है। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपके हृदय में भक्ति रस का संचार करेगा।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी

हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी।
हे प्रिय पति नंदन करूँ आरती तेरी॥

तुझपे ओ कान्हा बलिहारी जाऊँ,
साँझ सवेरे तेरे गुण गाऊँ।
प्रेम की गंगा बहाने वाले,
सबके संकट मिटाने वाले।
हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी॥

राधा के प्यारे, माखन के चोर,
नंद के दुलारे, माखन के चोर।
मुरली बजाकर मन हरने वाले,
सबके हृदय में बसने वाले।
हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी॥

दुष्टों का संहार करने वाले,
भक्तों का उद्धार करने वाले।
गीता का पावन ज्ञान सुनाया,
अर्जुन को अपना रूप दिखाया।
हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी॥

चरणों में तेरे शीश झुकाऊँ,
भक्ति का अपनी वरदान पाऊँ।
भवसागर से पार लगाने वाले,
मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले।
हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

प्रस्तुत भजन "हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी" का मुख्य भाव पूर्ण शरणागति और निष्काम भक्ति है। इस भजन में भक्त भगवान श्री कृष्ण को 'गोपाल' (गौओं के रक्षक और इंद्रियों के स्वामी) और 'प्रिय पति नंदन' (यशोदा नंदन और भक्तों के प्रिय) कहकर पुकारता है। आरती की प्रत्येक पंक्ति में भगवान के दिव्य गुणों और लीलाओं का गान किया गया है।

प्रथम अंतरे में भक्त कहता है कि वह अपने आराध्य कान्हा पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार है। वह सुबह और शाम केवल भगवान के मंगलमयी गुणों का गान करना चाहता है। भगवान श्री कृष्ण को "प्रेम की गंगा बहाने वाले" कहा गया है, क्योंकि उनका संपूर्ण अवतार प्रेम और करुणा का साक्षात विग्रह है। वे अपने भक्तों के सभी दैहिक, दैविक और भौतिक संकटों को हरने वाले हैं।

द्वितीय अंतरे में भगवान की मधुर लीलाओं का वर्णन है। वे राधा रानी के अत्यंत प्रिय हैं और नंद बाबा के दुलारे हैं। माखन की चोरी करना उनकी एक ऐसी लीला है जो दर्शाती है कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम रूपी माखन को चुराने के लिए सदैव लालायित रहते हैं। उनकी मुरली की मधुर तान केवल कानों को नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवात्मा के मन को हर लेती है और वे सबके हृदय में अंतर्यामी रूप में निवास करते हैं।

तृतीय और चतुर्थ अंतरे में भगवान के ऐश्वर्य रूप का वर्णन है। वे केवल माखन चोर नहीं हैं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए दुष्टों का संहार करने वाले और भक्तों का उद्धार करने वाले जगदीश्वर हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में उन्होंने अर्जुन को गीता का निष्काम कर्मयोग का उपदेश दिया और अपना विराट रूप दिखाकर संसार को यह संदेश दिया कि वे ही सृष्टि के आदि, मध्य और अंत हैं। भक्त अंत में प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मैं आपके चरणों में अपना मस्तक झुकाता हूँ, मुझे अपनी अनन्य भक्ति का वरदान दीजिए ताकि मैं इस संसार रूपी भवसागर से पार हो सकूँ।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन वैष्णव भक्ति मार्ग के 'सख्य' और 'माधुर्य' भाव का एक अद्भुत समन्वय है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • लीला और ऐश्वर्य का समन्वय: इस भजन में जहाँ एक ओर भगवान की बाल-लीलाओं (माखन चोरी, मुरली वादन) का वर्णन है, वहीं दूसरी ओर उनके ऐश्वर्य रूप (गीता ज्ञान, दुष्ट संहार) का भी सुंदर चित्रण है।
  • सरल और सुबोध भाषा: भजन की भाषा अत्यंत सरल और प्रवाहमयी है, जिससे कोई भी सामान्य साधक इसे आसानी से गा सकता है और इसके भावों से जुड़ सकता है।
  • आरती का आध्यात्मिक महत्व: आरती का अर्थ होता है 'आर्ति' यानी दुःख का निवारण। इस आरती को गाने से मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक को मानसिक शांति का अनुभव होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष नियम और समय निर्धारित हैं:

  • संध्या काल (Evening Prayer): यह भजन मुख्य रूप से संध्या काल की आरती के समय गाया जाता है। जब दिन और रात का मिलन होता है, उस समय इस भजन को गाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • पूजा विधि: भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख घी का दीपक या कपूर जलाकर, कांसे की थाली में फूल और अक्षत रखकर अत्यंत श्रद्धा भाव से यह आरती करनी चाहिए।
  • विशेष अवसर: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली और प्रत्येक महीने की एकादशी के दिन इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन भगवान श्री कृष्ण और उनकी आल्हादिनी शक्ति राधा रानी को समर्पित है। सनातन परंपरा में श्री कृष्ण को 'पूर्ण पुरुषोत्तम' माना गया है। इस भजन में प्रयुक्त शब्द 'गोपाल' और 'कान्हा' उनके उस रूप को दर्शाते हैं जो भक्तों के अत्यंत निकट है। संतों का मानना है कि जब हम गोपाल की आरती करते हैं, तो हम अपनी दसों इंद्रियों (गो) के स्वामी (पाल) को अपने जीवन की बागडोर सौंप रहे होते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति शैली पर आधारित है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सदियों से गाए जाने वाले भजनों की परंपरा से यह विकसित हुआ है। इसकी पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध की लीलाओं और महाभारत के गीता उपदेश से प्रेरित है। यह भजन सदियों से भक्तों के कंठ का हार बना हुआ है और विभिन्न संकीर्तन मंडलियों द्वारा इसे नए-नए मधुर रागों में गाया जाता रहा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के मधुर शब्दों का पुट है। जैसे 'कान्हा', 'बलिहारी', 'दुलारे' आदि शब्द ब्रज की माटी की सुगंध बिखेरते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक गेय पद (गीत) है, जिसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे- जाऊँ/गाऊँ, वाले/मिटाने)। इसकी लयबद्धता इतनी सटीक है कि यह सुनते ही मन को झंकृत कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि हमें जीवन जीने के महत्वपूर्ण संदेश देता है:

भजन की पंक्ति आध्यात्मिक संदेश दैनिक जीवन में उपयोगिता
प्रेम की गंगा बहाने वाले ईश्वर का मूल स्वरूप केवल प्रेम है। हमें भी अपने जीवन में सभी के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना चाहिए।
गीता का पावन ज्ञान सुनाया कर्तव्य पथ पर कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय कर्म पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
सबके संकट मिटाने वाले ईश्वर पर अटूट विश्वास ही दुखों से मुक्ति का मार्ग है। संकट के समय धैर्य रखना और ईश्वर की शरण में जाना।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
गोपाल गौओं का पालन करने वाले / इंद्रियों के रक्षक जो हमारी इंद्रियों को सही दिशा में ले जाते हैं।
बलिहारी न्योछावर होना / समर्पित होना अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना।
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे जीवात्मा मुक्त होना चाहती है।
पति नंदन यशोदा नंदन / भक्तों के स्वामी जो समस्त जगत के पालनहार और रक्षक हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी, हे प्रिय पति नंदन करूँ आरती तेरी।
हे गऊओं और इंद्रियों के स्वामी श्री कृष्ण! मैं अत्यंत श्रद्धा भाव से आपकी आरती उतार रहा हूँ। हे यशोदा नंदन और भक्तों के प्रिय स्वामी! मेरी इस आरती को स्वीकार करें।

२. तुझपे ओ कान्हा बलिहारी जाऊँ, साँझ सवेरे तेरे गुण गाऊँ।
हे कान्हा! मैं आपके इस सुंदर रूप पर अपना सर्वस्व न्योछावर करता हूँ। मेरी यही अभिलाषा है कि मैं सुबह और शाम केवल आपके ही दिव्य गुणों का गान करूँ।

३. प्रेम की गंगा बहाने वाले, सबके संकट मिटाने वाले।
आप इस संसार में निष्काम प्रेम की अविरल गंगा बहाने वाले हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, आप उसके सभी संकटों और दुखों का तत्क्षण निवारण कर देते हैं।

४. राधा के प्यारे, माखन के चोर, नंद के दुलारे, माखन के चोर।
आप श्री राधा रानी के प्राणप्रिय हैं और नंद बाबा के लाडले पुत्र हैं। आप भक्तों के हृदय रूपी माखन को चुराने वाले परम चतुर माखन चोर हैं।

५. मुरली बजाकर मन हरने वाले, सबके हृदय में बसने वाले।
अपनी बांसुरी की मधुर तान से आप समस्त चराचर जगत के मन को मोह लेते हैं। आप घट-घट वासी हैं और प्रत्येक जीव के हृदय में अंतर्यामी रूप में निवास करते हैं।

६. दुष्टों का संहार करने वाले, भक्तों का उद्धार करने वाले।
जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब आप अवतार लेकर दुष्टों का विनाश करते हैं और अपने अनन्य भक्तों का उद्धार कर उन्हें अपनी शरण प्रदान करते हैं।

७. गीता का पावन ज्ञान सुनाया, अर्जुन को अपना रूप दिखाया।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे, तब आपने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का अमर संदेश दिया और अपना दिव्य विराट रूप दिखाकर उनका संशय दूर किया।

८. चरणों में तेरे शीश झुकाऊँ, भक्ति का अपनी वरदान पाऊँ।
हे प्रभु! मैं आपके इन पावन चरणों में अपना मस्तक झुकाता हूँ। मुझे धन-दौलत नहीं, बल्कि केवल आपकी निश्चल और अनन्य भक्ति का वरदान चाहिए।

९. भवसागर से पार लगाने वाले, मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले।
आप ही इस कठिन संसार रूपी समुद्र से पार लगाने वाले एकमात्र खेवनहार हैं। आप ही जीवों को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात भगवान श्री कृष्ण के इस प्रसिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक भगवान के शरणागति भाव को दर्शाता है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम हे गोपाल कृष्ण करूँ आरती तेरी (Hey Gopal Krishna Karu Aarti Teri)
आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण (गोपाल / कान्हा)
मुख्य भाव शरणागति, माधुर्य और सख्य भाव
गायन का समय संध्या आरती, दैनिक पूजा, जन्माष्टमी उत्सव
भाषा सरल हिंदी (ब्रजभाषा के प्रभाव सहित)
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्काम कर्म

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से संध्या काल (शाम की आरती) के समय गाना सबसे उत्तम माना जाता है। हालांकि, सुबह की पूजा या किसी भी धार्मिक उत्सव के समय भी इसका गायन किया जा सकता है।

'गोपाल' दो शब्दों से मिलकर बना है—'गो' (गौएं या इंद्रियां) और 'पाल' (पालन करने वाला)। इसका अर्थ है गऊओं का पालन करने वाले और हमारी इंद्रियों को सही मार्ग पर ले जाने वाले भगवान श्री कृष्ण।

हाँ, इस भजन के अंतरे में "गीता का पावन ज्ञान सुनाया, अर्जुन को अपना रूप दिखाया" पंक्तियों के माध्यम से कुरुक्षेत्र में भगवान द्वारा दिए गए गीता के उपदेश और उनके विराट रूप का स्मरण किया गया है।

इस भजन के नियमित गायन से मन शांत होता है, अहंकार का नाश होता है और साधक के भीतर भगवान के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण का भाव जाग्रत होता है।

'प्रिय पति नंदन' का तात्पर्य भगवान के उस रूप से है जो अपने भक्तों के रक्षक, स्वामी और माता यशोदा के आनंद स्वरूप पुत्र हैं।

हाँ, जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद उनकी आरती के रूप में इस भजन का गायन अत्यंत लोकप्रिय और फलदायी माना जाता है।

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के मधुर और रसमय शब्दों का सुंदर समावेश किया गया है।

'भवसागर' का अर्थ है जन्म और मृत्यु का यह संसार रूपी चक्र। भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वे अपनी कृपा से हमें इस चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करें।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रसंगों और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर समीक्षित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन पाठ पहुँचाना है ताकि वे पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान की आराधना कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - श्री कृष्ण लीला प्रसंग)
  • श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८ - मोक्षसंन्यासयोग)
  • कल्याण (आरती अंक) - गीताप्रेस गोरखपुर
  • पारंपरिक वैष्णव भजन संग्रह एवं संकीर्तन परंपरा

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 25 Sep 2026

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