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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 4

अध्याय 3 · श्लोक 4

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||४||

na karmaṇām anārambhān naiṣkarmyaṃ puruṣo'śnute | na ca sannyasanād eva siddhiṃ samadhigacchati ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; कर्मणाम्: कर्मों का; अनारम्भात्: आरम्भ न करने से; नैष्कर्म्यम्: कर्मों से मुक्ति; पुरुष: मनुष्य; अश्नुते: प्राप्त करता है; न: नहीं; च: और; सन्न्यसनात्: संन्यास से; एव: ही; सिद्धिम्: सिद्धि; समधिगच्छति: प्राप्त होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कर्मों का आरम्भ न करने मात्र से मनुष्य नैष्कर्म्य (कर्मों से मुक्ति) को नहीं प्राप्त होता, और न केवल संन्यास (त्याग) से ही सिद्धि मिलती है।

English Translation

By merely abstaining from action one does not attain freedom from action (naiṣkarmya), nor does one attain perfection merely by renunciation.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान पहला सूत्र देते हैं: केवल कर्म न करने से कर्म-संन्यास की सिद्धि नहीं मिलती। असली नैष्कर्म्य तो कर्म करते हुए भी फल के आसक्ति से मुक्त रहना है। The Lord gives the first key: mere inaction does not lead to freedom from action; true freedom is acting without attachment.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।