मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्रीभगवान्
भगवान श्रीकृष्ण
उवाच
बोले
लोके
संसार में
अस्मिन्
इस
द्विविधा
दो प्रकार की
निष्ठा
स्थिति
पुरा
पहले
प्रोक्ता
कही गयी
मया
मेरे द्वारा
अनघ
हे निष्पाप
ज्ञानयोगेन
ज्ञान योग से
सांख्यानाम्
सांख्ययोगियों के लिए
कर्मयोगेन
कर्म योग से
योगिनाम्
योगियों के लिए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा (साधना मार्ग) मेरे द्वारा पहले कही गयी है – सांख्ययोगियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों (कर्मयोगियों) के लिए कर्मयोग।
"श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||३||"
श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय का यह तृतीय श्लोक संपूर्ण मानव जाति के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का एक शाश्वत प्रकाश स्तंभ है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन अत्यंत व्याकुलता, मानसिक द्वंद्व और विषाद से घिरे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके भ्रम का निवारण करने के लिए इस परम रहस्यमयी और व्यावहारिक ज्ञान का उद्घाटन किया। यह श्लोक केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि संसार के हर उस मनुष्य के लिए है जो अपने जीवन के कर्तव्यों और आध्यात्मिक लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने में असमर्थ महसूस करता है।
इस श्लोक का ब्रह्मांडीय महत्व इस बात में निहित है कि यह मानव चेतना के विकास के दो मुख्य मार्गों—ज्ञान और कर्म—को एक सूत्र में पिरोता है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इस सृष्टि में परम सत्य की प्राप्ति के लिए आदि काल से ही दो प्रकार की निष्ठाएं (मार्ग) अस्तित्व में रही हैं। पहली निष्ठा 'ज्ञानयोग' है, जो उन साधकों के लिए है जो विवेक, वैराग्य और गहन चिंतन के माध्यम से सत्य की खोज करते हैं। दूसरी निष्ठा 'कर्मयोग' है, जो उन साधकों के लिए है जो संसार में रहकर अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करते हुए ईश्वर को प्राप्त करते हैं।
सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक भारतीय सनातन परंपरा की उस उदारता और वैज्ञानिकता को दर्शाता है, जो किसी एक संकीर्ण मार्ग को थोपने के बजाय साधक की व्यक्तिगत प्रकृति (स्वभाव) और मानसिक योग्यता के अनुसार मार्ग चुनने की स्वतंत्रता देती है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मार्ग चाहे कोई भी हो, यदि उसमें पूर्ण निष्ठा और समर्पण है, तो अंतिम गंतव्य एक ही है—परम आनंद और मोक्ष की प्राप्ति।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
॥ मूल श्लोक ॥
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
॥ रोमन लिपि में लिप्यंतरण (Transliteration) ॥
śrī-bhagavān uvāca
loke ’smin dvi-vidhā niṣṭhā purā proktā mayānagha
jñāna-yogena sāṅkhyānāṁ karma-yogena yoginām
पठन एवं जप की प्रामाणिक विधि:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)
इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन दार्शनिक रहस्य छिपे हुए हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 'अनघ' कहकर संबोधित किया है, जिसका अर्थ है 'पापरहित'। यह संबोधन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल एक शुद्ध और पापरहित बुद्धि ही ज्ञान और कर्म के इस सूक्ष्म समन्वय को समझ सकती है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का विस्तृत अर्थ और उसका आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
गूढ़ दार्शनिक विश्लेषण:
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग दो अलग-अलग गंतव्यों तक ले जाने वाले मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक ही पर्वत की चोटी पर पहुँचने के दो अलग-अलग रास्ते हैं। सांख्यवादी (ज्ञानी) अपनी बुद्धि के तीक्ष्ण प्रयोग से यह समझते हैं कि "मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।" वहीं, कर्मयोगी अपने कर्मों को भगवान की पूजा मानकर करते हैं, जिससे उनका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और अंततः उन्हें भी उसी आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। इसलिए, दोनों मार्गों में कोई विरोध नहीं है।
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के उस ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक क्षण में जाना होगा, जहाँ अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों के विरुद्ध युद्ध करने की कल्पना से कांप उठते हैं। गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्ययोग) में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता का उपदेश दिया और साथ ही निष्काम कर्म की महिमा भी गाई। अर्जुन इस उपदेश से भ्रमित हो गए। उन्हें लगा कि यदि ज्ञानमार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है और आत्मा कभी मरती नहीं है, तो भगवान उन्हें इस घोर, हिंसक और विनाशकारी युद्ध में क्यों धकेल रहे हैं?
अर्जुन के इसी संशय का उत्तर देने के लिए तृतीय अध्याय का आरंभ होता है। अर्जुन पूछते हैं कि "हे जनार्दन! यदि आप कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस भयानक कर्म में क्यों लगाते हैं?" अर्जुन के इस सीधे और अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण यह श्लोक (३.३) कहते हैं।
वैदिक और उपनिषदिक संदर्भ:
सनातन धर्म के इतिहास में हमेशा से दो मुख्य विचारधाराएं रही हैं। एक है 'प्रवृत्ति मार्ग' (संसार में रहकर कर्म करना) और दूसरी है 'निवृत्ति मार्ग' (संसार का त्याग कर संन्यास लेना)। उपनिषदों में इन दोनों मार्गों का विशद वर्णन मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से इन दोनों मार्गों के बीच एक सुंदर समन्वय स्थापित करते हैं। वे बताते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में ही (पुरा प्रोक्ता), जब उन्होंने वेदों का ज्ञान दिया था, तभी इन दोनों मार्गों का निर्धारण कर दिया था।
भगवान यहाँ यह भी स्पष्ट करते हैं कि कोई भी मनुष्य अपनी प्रकृति के विपरीत जाकर साधना नहीं कर सकता। जिस मनुष्य के भीतर रजोगुण की प्रधानता है, वह बलपूर्वक संन्यास लेकर बैठ तो सकता है, लेकिन उसका मन निरंतर विषयों का ही चिंतन करता रहेगा। ऐसे व्यक्ति के लिए कर्मयोग ही एकमात्र सुरक्षित और सही मार्ग है। इसके विपरीत, जिसके भीतर सत्त्वगुण की प्रधानता है और वैराग्य स्वतः उत्पन्न हो चुका है, वह ज्ञानयोग का अधिकारी है। इस प्रकार, यह श्लोक वैदिक ज्ञान को अत्यंत व्यावहारिक और सुलभ बनाता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित श्रवण, मनन और जप करने से साधक को न केवल आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है, बल्कि उसके दैनिक जीवन में भी चमत्कारी मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन आते हैं। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह विवेचन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शारीरिक भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद कृत 'गीता व्याख्या', और स्वामी रामसुखदास जी महाराज की 'साधक संजीवनी' के गहन अध्ययन और दार्शनिक विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है। संपादकीय टीम ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि श्लोक के मूल व्याकरण, छंद और आध्यात्मिक मर्म के साथ कोई समझौता न हो।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि धर्म कोई पलायनवादी विचारधारा नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक अत्यंत व्यावहारिक कला है। चाहे आप एक छात्र हों, गृहस्थ हों, कॉर्पोरेट पेशेवर हों या संन्यासी—यह श्लोक आपको अपने कर्तव्यों को बिना किसी मानसिक तनाव के पूरा करने का दिव्य मार्ग दिखाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning
भगवान कहते हैं कि दो प्रकार की निष्ठा है – एक ज्ञानियों के लिए, एक कर्मयोगियों के लिए। The Lord says there are two kinds of spiritual paths – one for the contemplative, one for the active.
गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अध्याय अवलोकन
पृष्ठ अनुक्रमणिका
सर्वाधिक पढ़े गए श्लोक
दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें
प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।
भक्तिलोक ऐप इंस्टॉल करें
बिना इंटरनेट (Offline) भी भजन व पंचांग पढ़ें
डिजिटल 108 जाप माला
दैनिक राशिफल व उपाय
अपनी राशि चुनें:
♈ मेष राशि (Aries)
19 अक्टूबर 2026आज का दिन ऊर्जा और नए अवसरों से भरा रहेगा। कार्यक्षेत्र में आपकी योजनाएं सफल होंगी। परिजनों का भरपूर सहयोग मिलेगा।
दिव्य मंदिर शंख ध्वनि (Shankh Naad)
पूजा, आरती या संध्याकाल में वातावरण की शुद्धि व नकारात्मक ऊर्जा दूर करने हेतु पवित्र शंख ध्वनि बजाएं:
दैनिक पुण्य व संकल्प खाता
आज आपने कौन-से धर्म कर्म किए? (चेक करें):
पेज शेयर करें
सनातन धर्म और दिव्य ज्ञान को अपने प्रियजनों के साथ शेयर करें:
दिव्य ॐ ध्यान व तानपुरा
पवित्र 432Hz ध्यान ध्वनि
चित्त की शांति और एकाग्रता के लिए प्राकृतिक वैदिक ध्वनि तरंगे
दैनिक वैदिक सुविचार
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
व्हाट्सएप स्टेटस कार्ड
आज के शुभ दिन का दिव्य स्टेटस कार्ड तैयार है: