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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 3

अध्याय 3 · श्लोक 3

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||३||

śrībhagavān uvāca | loke'smin dvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha | jñānayogena sāṅkhyānāṃ karmayogena yoginām ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान श्रीकृष्ण; उवाच: बोले; लोके: संसार में; अस्मिन्: इस; द्विविधा: दो प्रकार की; निष्ठा: स्थिति; पुरा: पहले; प्रोक्ता: कही गयी; मया: मेरे द्वारा; अनघ: हे निष्पाप; ज्ञानयोगेन: ज्ञान योग से; सांख्यानाम्: सांख्ययोगियों के लिए; कर्मयोगेन: कर्म योग से; योगिनाम्: योगियों के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा (साधना मार्ग) मेरे द्वारा पहले कही गयी है – सांख्ययोगियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों (कर्मयोगियों) के लिए कर्मयोग।

English Translation

The Blessed Lord said: O sinless one, in this world two paths of spiritual life were taught by Me in the past – the path of knowledge (jñāna-yoga) for the sāṅkhyas (contemplatives) and the path of action (karma-yoga) for the yogis (active workers).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान स्पष्ट करते हैं कि दो मार्ग हैं – एक ज्ञान निष्ठा (सांख्य) और एक कर्म निष्ठा (योग)। यह विभाजन साधक की प्रकृति के अनुसार है। कोई विरोध नहीं, बल्कि दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं। The Lord clarifies that there are two paths – one of knowledge (Sankhya) and one of action (Yoga). The division is according to the nature of the seeker; both lead to the same goal.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।