श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 5

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 40 मिनट का पठन 156 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
हि
निश्चय ही
कश्चित्
कोई भी
क्षणम्
क्षणभर
अपि
भी
जातु
कभी
तिष्ठति
रहता है
अकर्मकृत्
बिना कर्म किए
कार्यते
कराया जाता है
हि
ही
अवशः
विवश
कर्म
कर्म
सर्वः
सब
प्रकृतिजै
प्रकृति से उत्पन्न
गुणै
गुणों द्वारा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

निश्चय ही कोई भी प्राणी क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि सभी प्रकृतिजनित गुणों के द्वारा विवश होकर कर्म करने को विवश किए जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: कर्म का सनातन चक्र और मानव अस्तित्व का रहस्य

सनातन हिंदू धर्म और वेदान्त दर्शन में भगवद्गीता को न केवल एक ग्रंथ, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक प्रश्न का सार्वभौमिक उत्तर माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय, जिसे 'कर्मयोग' की संज्ञा दी गई है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म की अनिवार्यता का अकाट्य सिद्धांत समझाते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||५||"—संपूर्ण मानव जाति के लिए एक महान दार्शनिक उद्घोषणा है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि इस भौतिक जगत (संसार) में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए जीवित रह सके।

साधारण मनुष्य अक्सर यह भ्रम पाल लेता है कि वह सब कुछ छोड़कर हिमालय की कंदराओं में बैठ जाएगा या आंखें मूंदकर निष्क्रिय हो जाएगा, तो वह कर्म के बंधनों से मुक्त हो जाएगा। परंतु, भगवद्गीता इस भ्रांति को जड़ से उखाड़ फेंकती है। जब तक शरीर है, तब तक श्वास चलना, हृदय का धड़कना, मस्तिष्क का विचार करना, और इंद्रियों का अपने विषयों की ओर प्रवृत्त होना—ये सभी प्रकृति के नियमों के अंतर्गत होने वाली अनिवार्य क्रियाएं हैं। प्रकृति के तीन गुण—सत्व, रज और तम—निरंतर गतिशील रहते हैं। इन गुणों के प्रभाव से कोई भी जीव विवश होकर कर्म करने के लिए बाध्य होता है। इस श्लोक का अध्ययन करने से हमें यह बोध होता है कि पलायनवाद (Escapism) सनातन धर्म का मार्ग नहीं है, बल्कि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना ही वास्तविक मोक्ष का मार्ग है।

Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक का व्याकरणिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जिंदगी में उलझा हुआ हर साधक अपने जीवन को सुचारू, तनावमुक्त और ईश्वर-समर्पित बना सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ तृतीयोऽध्यायः - कर्मयोग

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥

पाठ करने की विधि एवं नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्र आसन (कुशा या ऊनी) पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय का विधिवत पाठ करने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि वेद व्यास का स्मरण करें।
  • इस श्लोक का उच्चारण करते समय स्पष्टता और शुद्ध उच्चारण का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि वैदिक और आर्ष ग्रंथावली में स्वर एवं उच्चारण का विशेष महत्व होता है।
  • पाठ के उपरांत मानसिक रूप से अपने समस्त कर्मों को परमपिता परमेश्वर को समर्पित (ईश्वरार्पण) करने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लक के प्रत्येक शब्द की तह में जाकर उसके वास्तविक अर्थ को समझना ही सच्चा स्वाध्याय है। नीचे दी गई तालिका में श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका दार्शनिक और आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Essence)
न नहीं निषेधवाचक पद, जो यह सुनिश्चित करता है कि इसका कोई अपवाद (Exception) संभव नहीं है।
हि निश्चय ही / क्योंकि एक अकाट्य सार्वभौमिक सत्य (Universal Truth) को प्रमाणित करने वाला अव्यय पद।
कश्चित् कोई भी मनुष्य / जीव ब्रह्मांड का कोई भी प्राणी, चाहे वह ज्ञानी हो, अज्ञानी हो, राजा हो या रंक।
क्षणमपि एक पल के लिए भी / अल्पकाल को भी समय का सूक्ष्मतम भाग भी ऐसा नहीं है जब प्राणी कर्म से रहित रह सके।
जातु कभी भी काल के किसी भी खंड (भूत, भविष्य या वर्तमान) में यह नियम बदलता नहीं है।
तिष्ठति रहता है स्थिति या अवस्था को दर्शाता है कि कोई निष्क्रिय होकर बैठ नहीं सकता।
अकर्मकृत् कर्म न करने वाला (निष्क्रिय) ऐसी स्थिति जिसकी कल्पना तो की जा सकती है, पर भौतिक जगत में जो असंभव है।
कार्यते कराया जाता है जीव स्वतंत्र कर्ता नहीं है, बल्कि प्रकृति की शक्तियों द्वारा उससे कर्म कराया जाता है।
ह्यवशः निश्चित ही परवश / असहाय होकर माया और प्रकृति के नियमों के आगे अहंकारवश मनुष्य विवश हो जाता है।
कर्म क्रिया / कर्तव्य / कर्म शारीरिक, मानसिक और वाचिक स्तर पर होने वाली समस्त गतिविधियां।
सर्वः समस्त प्राणी / सभी सृष्टि का प्रत्येक जीव जो प्रकृति के अधीन है।
प्रकृतिजैः प्रकृति से उत्पन्न माया की तीन शक्तियों (सत्व, रज, तम) से उत्पन्न होने वाले स्वभाव से।
गुणैः गुणों द्वारा (सत्व, रज, तम) प्रकृति के त्रिगुण जो संसार के इंजन की भांति जीव को गतिमान रखते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह संवाद महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों में कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुआ था। कौरव और पांडव सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन, जो कि महान धनुर्धर थे, अपने परिजनों, गुरुजनों और प्रियजनों को सामने युद्ध के लिए तत्पर देखकर अत्यधिक विषाद से घिर गए। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया और उन्होंने युद्ध करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। अर्जुन का तर्क था कि अपनों का वध करके राज्य प्राप्त करने से बेहतर है कि भिक्षा मांगकर जीवन जिया जाए। वह कर्म (युद्ध रूपी कर्तव्य) का त्याग कर संन्यास लेना चाहते थे।

यहीं से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान, भक्ति और कर्म का जो महासागर बहाया, वही भगवद्गीता कहलाई। भगवान ने अर्जुन को समझाया कि हे अर्जुन! तुम्हारा यह सोचना कि तुम युद्ध से मुंह मोड़कर कर्म से बच जाओगे, एक मूर्खतापूर्ण और बालिश विचार है। शरीर धारण करने वाले प्रत्येक जीव को अपनी प्रकृति और अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्म करना ही होगा। यदि तुम इस समय क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए युद्ध नहीं भी करोगे, तो भी तुम्हारी प्रकृति (तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव, वीरता और अहंकार) तुम्हें विवश करके युद्ध के मैदान में खींच लाएगी।

वैदिक साहित्य, उपनिषदों और पुराणों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि ब्रह्म (परमात्मा) की इच्छा से यह सृष्टि चलती है और इस सृष्टि का प्रत्येक परमाणु गतिमान है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और पुराणों के माध्यम से बार-बार यही संदेश दिया है कि कर्म के बिना जीवन की एक सेकेंड की भी कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, कर्म का त्याग करने के बजाय, आसक्ति (Attachment) का त्याग करना ही श्रेष्ठ मार्ग है। यही इस श्लोक की ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि है जो आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी द्वापर युग में थी।

महत्वपूर्ण शास्त्रीय संदर्भ
  • ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (भीष्म पर्व)
  • अध्याय: तृतीय अध्याय (कर्मयोग)
  • वक्ता: भगवान श्री कृष्ण
  • श्रोता: पाण्डुपुत्र अर्जुन
  • मुख्य संदेश: कर्म की अनिवार्यता एवं अनासक्ति योग।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों मानसिक, आध्यात्मिक और दैहिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता (Mental Peace)

जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि कर्म करना प्रकृति का नियम है और वह हर बात के लिए पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, तो उसके मन से व्यर्थ की चिंता और नियंत्रण का तनाव समाप्त हो जाता है, जिससे चित्त शांत होता है।

2. पलायनवाद से मुक्ति (Freedom from Escapism)

जीवन की कठिनाइयों से भागने या जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने की प्रवृत्ति समाप्त होती है। साधक हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करता है और अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार (Positive Aura)

भगवद्गीता के श्लोकों के उच्चार से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) शरीर के चक्रों को संतुलित करते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और एक सकारात्मक आध्यात्मिक औरा का निर्माण होता है।

4. कर्मिक शुद्धि और बंधन मुक्ति (Karmic Purification)

जब कर्म फल की आसक्ति छोड़कर किए जाते हैं, तो नए कर्मों के बंधन नहीं बनते। पुराने संचित कर्मों का क्षय होता है और साधक धीरे-धीरे मुक्ति (मोक्ष) के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

5. ईश्वर के प्रति समर्पण भाव (Devotional Surrender)

यह बोध होता है कि हम सब उस महान प्रकृति रूपी यंत्र के अंग मात्र हैं। यह अहंकार समाप्त हो जाता है कि "सब कुछ मैं ही कर रहा हूँ", और शरणागति का दिव्य भाव जागृत होता है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Enhanced Decision Making)

कर्तव्य और अकर्तव्य का विवेक जागृत होता है। भ्रम और दुविधा की स्थिति में साधक सही और धर्मसम्मत निर्णय लेने में समर्थ होता है, जैसा अर्जुन ने युद्ध के अंत में किया था।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, आर्ष आचार्यों की टीकाओं और श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक भाष्य (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और पुराणों का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी ज्ञान पहुंचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय भाषा की पवित्रता, व्याकरण की शुद्धता और दार्शनिक गहराई का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार का भ्रामक या सतही विवरण न आने पाए। पाठक इस आलेख का अध्ययन करके अपने आध्यात्मिक जीवन को उन्नत बना सकते हैं और दैनिक जीवन में कर्मयोग के सिद्धांतों को आत्मसात कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: यहाँ 'अवशः' शब्द का अर्थ पूर्ण रूप से मजबूर होना नहीं है, बल्कि यह है कि जब तक मनुष्य ने अपनी इंद्रियों और मन को साधित नहीं किया है, तब तक प्रकृति के गुण (सत्व, रज, तम) उसे अपनी आदतों और संस्कारों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश करते रहते हैं। योग और साधना के माध्यम से मनुष्य इन गुणों को अपने अधीन (त्रिगुणातीत होना) कर सकता है, जिसके लिए भगवद्गीता आगे के अध्यायों में मार्ग बताती है।

उत्तर: कर्म-संन्यास का भौतिक अर्थ कर्मों को शारीरिक रूप से छोड़ना है, जो कि इस श्लोक के अनुसार असंभव है क्योंकि शरीर और मन की क्रियाएं बंद नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत, कर्मयोग का अर्थ है—कर्तव्य कर्मों को करना परंतु उनके फल (सफलता या असफलता, लाभ या हानि) की लालसा या आसक्ति का त्याग कर देना। भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग को ही सर्वश्रेष्ठ और सहज मार्ग बताते हैं।

उत्तर: सत्व गुण मनुष्य में ज्ञान, प्रकाश और संतोष पैदा करके अच्छे कर्मों की प्रेरणा देता है; रज गुण काम, लालसा, महत्वाकांक्षा और गतिविधियों को बढ़ाकर कर्म करवाता है; तथा तम गुण आलद, प्रमाद, अज्ञान और निद्रा के माध्यम से निष्क्रियता या तामसी कर्म करवाता है। इन तीनों गुणों के प्रभाव से कोई भी जीव एक क्षण भी अकर्मण्य नहीं रह सकता।

उत्तर: आज की कॉर्पोरेट और व्यस्त जीवनशैली में लोग टारगेट, प्रेशर और अपेक्षाओं के कारण भयंकर तनाव (Stress) का शिकार होते हैं। इस श्लोक और कर्मयोग के सिद्धांत को अपनाकर हम अपनी जॉब या बिजनेस को पूरी ईमानदारी से करें, लेकिन परिणाम (प्रमोशन, इंसेंटिव या लाभ) की चिंता में अपनी मानसिक शांति न खोएं। इससे कार्यक्षमता बढ़ती है और मानसिक तनाव समाप्त होता है।

उत्तर: तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का मुख्य उद्देश्य अर्जुन और संपूर्ण मानव जाति को यह समझाना है कि ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग परस्पर विरोधी नहीं हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए या समाज के बीच रहकर भी अपने निर्धारित कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करना ही सबसे बड़ी तपस्या और ईश्वर की सच्ची पूजा है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning

प्रकृति के गुण सभी को कर्म करने के लिए विवश करते हैं, इसलिए बिना कर्म रहना असम्भव है। The guṇas of nature compel everyone to act; thus remaining actionless is impossible.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/43 12% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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