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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 5

अध्याय 3 · श्लोक 5

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||५||

na hi kaścit kṣaṇam api jātu tiṣṭhaty akarmakṛt | kāryate hy avaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijair guṇaiḥ ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; हि: निश्चय ही; कश्चित्: कोई भी; क्षणम्: क्षणभर; अपि: भी; जातु: कभी; तिष्ठति: रहता है; अकर्मकृत्: बिना कर्म किए; कार्यते: कराया जाता है; हि: ही; अवशः: विवश; कर्म: कर्म; सर्वः: सब; प्रकृतिजै: प्रकृति से उत्पन्न; गुणै: गुणों द्वारा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

निश्चय ही कोई भी प्राणी क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि सभी प्रकृतिजनित गुणों के द्वारा विवश होकर कर्म करने को विवश किए जाते हैं।

English Translation

Verily, no one can remain inactive even for a moment; everyone is helplessly driven to action by the qualities (guṇas) born of material nature.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान यहाँ एक महत्वपूर्ण सत्य बताते हैं: कर्म से बचना असंभव है। शरीर और मन होने पर प्रकृति के गुण (सत्व, रज, तम) निरंतर क्रिया करवाते हैं। इसलिए कर्म-संन्यास का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि उनके फल का त्याग है। The Lord reveals an important truth: it is impossible to avoid action. As long as we have a body and mind, the guṇas of nature compel us to act. Thus, renunciation does not mean giving up action, but giving up attachment to results.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।