कर्म योग (Karma Yoga) – श्लोक 5

श्लोक ५ में बताया गया है कि कोई भी क्षणभर भी बिना कर्म नहीं रह सकता। Verse 5: No one can remain inactive even for a moment.

संस्कृत श्लोक

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||५||

na hi kaścit kṣaṇam api jātu tiṣṭhaty akarmakṛt | kāryate hy avaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijair guṇaiḥ ||5||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; हि: निश्चय ही; कश्चित्: कोई भी; क्षणम्: क्षणभर; अपि: भी; जातु: कभी; तिष्ठति: रहता है; अकर्मकृत्: बिना कर्म किए; कार्यते: कराया जाता है; हि: ही; अवशः: विवश; कर्म: कर्म; सर्वः: सब; प्रकृतिजै: प्रकृति से उत्पन्न; गुणै: गुणों द्वारा।

हिंदी अनुवाद

निश्चय ही कोई भी प्राणी क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि सभी प्रकृतिजनित गुणों के द्वारा विवश होकर कर्म करने को विवश किए जाते हैं।

English Translation

Verily, no one can remain inactive even for a moment; everyone is helplessly driven to action by the qualities (guṇas) born of material nature.

टीका / Commentary

भगवान यहाँ एक महत्वपूर्ण सत्य बताते हैं: कर्म से बचना असंभव है। शरीर और मन होने पर प्रकृति के गुण (सत्व, रज, तम) निरंतर क्रिया करवाते हैं। इसलिए कर्म-संन्यास का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि उनके फल का त्याग है। The Lord reveals an important truth: it is impossible to avoid action. As long as we have a body and mind, the guṇas of nature compel us to act. Thus, renunciation does not mean giving up action, but giving up attachment to results.