श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 18

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 40 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन | न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ||१८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
एव
ही
तस्य
उसके
कृतेन
किए गए कर्म से
अर्थ
प्रयोजन
न
नहीं
अकृतेन
न किए गए कर्म से
इह
इस लोक में
कश्चन
कुछ भी
न
नहीं
च
और
अस्य
इसके
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
कश्चित्
कोई
अर्थव्यपाश्रय
प्रयोजन के लिए आश्रय।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस (आत्मसंतुष्ट पुरुष) के लिए न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है और न कर्म न करने से। उसका सब भूतों में किसी प्रयोजन के लिए आश्रय नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का अठारहवां श्लोक मानव चेतना की उस सर्वोच्च और जाज्वल्यमान अवस्था का निरूपण करता है, जहाँ पहुँचकर जीवात्मा समस्त सांसारिक द्वंद्वों, कर्तव्यों और बंधनों से सर्वथा मुक्त हो जाती है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह उस परम स्वतंत्र पुरुष (जीवनमुक्त) के आंतरिक साम्राज्य का जीवंत मानचित्र है, जिसने अपनी आत्मा में ही संतोष पा लिया है। भारतीय सनातन संस्कृति में कर्म को बंधन का कारण माना गया है, परंतु जब वही कर्म निष्काम भाव से और आत्मज्ञान की ज्योति में किया जाता है, तो वह मोक्ष का द्वार बन जाता है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उस परम ज्ञानी की स्थिति के विषय में बता रहे हैं, जो न तो कर्म करने से किसी लाभ की आकांक्षा रखता है और न ही कर्म के परित्याग से उसे कोई हानि होती है।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को बाह्य निर्भरता से मुक्त कर पूर्णतः आत्मनिर्भर (आध्यात्मिक रूप से) बनने की प्रेरणा देता है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और दूसरों की अपेक्षाओं के बोझ तले दबा हुआ है, वहाँ यह श्लोक हमें सिखाता है कि वास्तविक सुख और स्वतंत्रता किसी बाह्य वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर निर्भर नहीं है। यह श्लोक हमें 'स्व' में प्रतिष्ठित होने का मार्ग दिखाता है, जो कि वेदों और उपनिषदों का परम लक्ष्य है। इस पावन श्लोक के गंभीर अनुशीलन से साधक के भीतर एक अभूतपूर्व वैराग्य और शांति का उदय होता है, जो उसे संसार में रहते हुए भी कमल के पत्ते की भांति निर्लिप्त रहना सिखाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |"

"न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ||१८||"

सस्वर पाठ एवं उच्चारण निर्देश:

इस श्लोक का उच्चारण अनुष्टुप छंद में किया जाता है। प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं। पाठ करते समय स्वरों के उतार-चढ़ाव (उदात्त, अनुदात्त और स्वरित) का ध्यान रखना चाहिए। प्रथम चरण "नैव तस्य कृतेनार्थो" का उच्चारण करते समय 'नैव' पर बल दें और 'कृतेनार्थो' को एक प्रवाह में बोलें। द्वितीय चरण "नाकृतेनेह कश्चन" में 'नाकृतेन' के बाद क्षणिक विराम लें। तृतीय और चतुर्थ चरण "न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः" का पाठ अत्यंत शांत और गंभीर मुद्रा में करना चाहिए।

साधना एवं जप की शास्त्रीय विधि:

  • शुभ मुहूर्त: इस श्लोक के मनन और जप के लिए ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४:०० से ५:३० बजे) सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पूर्व ३ बार दीर्घ प्राणायाम (पूरक, कुंभक, रेचक) करें ताकि चित्त शांत हो सके।
  • संकल्प: हाथ में जल लेकर मानसिक शांति, आत्मज्ञान की प्राप्ति और निष्काम कर्मयोग के उदय का संकल्प लें।
  • ध्यान: हृदय कमल में भगवान श्री कृष्ण के सारथी रूप का अथवा शांत सच्चिदानंद स्वरूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का १०८ बार मानसिक या उपांशु जप करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
नैव (न + एव) नहीं ही / निश्चित रूप से नहीं यह पूर्ण निषेध को दर्शाता है। ज्ञानी पुरुष के जीवन में किसी भी प्रकार की सांसारिक लालसा या कर्ताभाव का सर्वथा अभाव होता है।
तस्य उसका (उस आत्मज्ञानी का) यह उस सिद्ध पुरुष की ओर संकेत करता है जो शरीर-बुद्धि-मन के स्तर से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित हो चुका है।
कृतेन कर्म करने से संसार में किसी भी प्रकार के विहित कर्म, यज्ञ, दान या तप के अनुष्ठान से मिलने वाले फल की बात की गई है।
अर्थः प्रयोजन / लाभ / स्वार्थ ज्ञानी का कर्मों से कोई निजी स्वार्थ सिद्ध नहीं होता। वह जो भी कर्म करता है, केवल लोक-कल्याण के लिए करता है।
न न ही पुनः निषेधार्थक शब्द जो अकर्म (कर्म न करने) के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।
अकृतेन कर्म न करने से यदि वह किसी कर्म को छोड़ भी दे, तो उसे कोई पाप या प्रत्यवाय (दोष) नहीं लगता, क्योंकि उसका अंतःकरण शुद्ध हो चुका है।
इह इस संसार में इस मृत्युलोक या किसी भी अन्य लोक में ज्ञानी के लिए कोई बंधनकारी नियम शेष नहीं रहता।
कश्चन कोई भी / तनिक भी किसी भी प्रकार का लेशमात्र भी स्वार्थ या भय उसके भीतर शेष नहीं रहता।
न च अस्य और न ही इसका उस आत्मज्ञानी पुरुष का किसी भी अन्य जीव के साथ कोई स्वार्थपूर्ण संबंध नहीं होता।
सर्वभूतेषु समस्त प्राणियों में चींटी से लेकर ब्रह्मा तक, संसार के सभी चर-अचर जीवों के प्रति उसकी समदृष्टि होती है।
कश्चित् कोई भी किसी भी प्रकार का आश्रय या अपेक्षा।
अर्थव्यपाश्रयः प्रयोजन के लिए आश्रय वह अपनी प्रसन्नता, सुरक्षा या अस्तित्व के लिए किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु या देवता पर निर्भर नहीं रहता। वह पूर्णतः स्व-आश्रित है।

विस्तृत दार्शनिक विश्लेषण: आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं कि जिस पुरुष ने आत्मा को ही अपना सर्वस्व मान लिया है, उसके लिए कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता। जब तक मनुष्य के भीतर अपूर्णता की भावना रहती है, तब तक वह पूर्णता प्राप्त करने के लिए कर्म करता है। परंतु जो स्वयं पूर्ण (सच्चिदानंद) हो चुका है, उसके लिए कर्म केवल एक लीला मात्र है। वह कर्म करे तो भी बंधन नहीं, और न करे तो भी कोई हानि नहीं। यही वास्तविक 'नैष्कर्म्य' की स्थिति है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और अपने क्षत्रिय धर्म (युद्ध करने) से विमुख होने का प्रयास करते हैं, तब भगवान श्री कृष्ण उन्हें निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हैं। अर्जुन का तर्क था कि कर्म करने से पाप लगेगा और सन्यास ले लेना ही श्रेयस्कर है। भगवान कृष्ण अर्जुन के इस भ्रम का निवारण करते हुए समझाते हैं कि सन्यास का अर्थ कर्मों का बाह्य रूप से त्याग करना नहीं है, बल्कि कर्मों के फल की आसक्ति और कर्ताभाव का त्याग करना है।

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें राजा जनक के प्रसंग को देखना होगा, जिनका उल्लेख श्री कृष्ण ने इसी अध्याय के पूर्व के श्लोकों में किया है। राजा जनक एक परम ज्ञानी और जीवनमुक्त पुरुष थे। वे मिथिला के राजा थे, राजपाट के समस्त कार्य करते थे, परंतु उनका मन सदैव ब्रह्म में लीन रहता था। एक बार मिथिला में भीषण आग लग गई। लोग चिल्लाते हुए राजा जनक के पास आए कि "महाराज! आपका महल जल रहा है!" राजा जनक ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया—"मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन" (यदि पूरी मिथिला भी जल जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता, क्योंकि मैं शरीर या संपत्ति नहीं, अपितु अविनाशी आत्मा हूँ)।

यह श्लोक उसी जनक जैसी स्थिति वाले महापुरुषों के चरित्र को उद्घाटित करता है। भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि हे अर्जुन! जब तुम आत्मज्ञान को प्राप्त कर लोगे, तब तुम भी इसी प्रकार द्वंद्वों से मुक्त हो जाओगे। उस समय यदि तुम युद्ध करोगे, तो भी तुम्हें पाप नहीं लगेगा, क्योंकि तुम्हारे भीतर कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या अहंकार शेष नहीं रहेगा। इस प्रकार, यह श्लोक महाभारत के युद्ध के महासंकट के समय अर्जुन को परम शांति और निर्भयता प्रदान करने के लिए उद्घोषित किया गया था। यह वेदों के 'अद्वैत वेदांत' सिद्धांत का व्यावहारिक रूप है, जहाँ जीव और ब्रह्म की एकता सिद्ध होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का नियमित श्रवण, मनन और पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

१. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

जब साधक यह समझ जाता है कि उसकी आत्मा पूर्ण है और उसे किसी बाह्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है, तो उसकी सारी चिंताएं और मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

२. कर्ताभाव का विसर्जन (अहंकार की निवृत्ति)

यह श्लोक मनुष्य के भीतर से 'मैं कर रहा हूँ' के अहंकार को नष्ट करता है, जिससे वह ईश्वर के हाथों का एक निमित्त मात्र बन जाता है।

३. अपेक्षाओं और निराशा से मुक्ति

दूसरों से अपेक्षाएं ही दुःख का कारण हैं। इस श्लोक के प्रभाव से साधक 'अर्थव्यपाश्रयः' (दूसरों पर निर्भरता) से मुक्त होकर परम संतोष का अनुभव करता है।

४. कर्मों के बंधन से मुक्ति (कर्मयोग की सिद्धि)

साधक निष्काम भाव से कर्म करना सीख जाता है, जिससे नए संचित कर्म नहीं बनते और पुराने प्रारब्ध कर्म धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।

५. सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य आभा (Aura) का विकास

इस श्लोक के नियमित जप से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं, जिससे साधक के चारों ओर एक अत्यंत पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा का सुरक्षा कवच निर्मित होता है।

६. समत्व बुद्धि की प्राप्ति

सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम रहने की शक्ति प्राप्त होती है, जो कि योग की पराकाष्ठा है (समत्वं योग उच्यते)।

७. भय का समूल नाश

मृत्यु और हानि का भय केवल उसे होता है जो शरीर से जुड़ा है। आत्मज्ञान का यह श्लोक साधक को अभय (निडरता) का वरदान देता है।

८. लोक-कल्याण (निष्काम सेवा) की भावना

निजी स्वार्थ न रहने पर साधक का संपूर्ण जीवन प्राणिमात्र की सेवा और कल्याण के लिए समर्पित हो जाता है, जिससे समाज में समरसता आती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण Bhaktilok.in के विद्वान मंडल द्वारा प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों के आलोक में तैयार किया गया है। इस आलेख की सामग्री आदि गुरु शंकराचार्य के 'शांकरभाष्य', स्वामी चिन्मयानंद के गीता प्रवचनों और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों पर आधारित है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, विशुद्ध दार्शनिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से श्रीमद्भगवद्गीता के संदेशों को समझाने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। हमारा उद्देश्य सनातन ज्ञान की इस अमूल्य धरोहर को आधुनिक पीढ़ी तक अत्यंत सरल, सुबोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का मुख्य संदेश 'पूर्ण आंतरिक स्वतंत्रता' है। भगवान श्री कृष्ण समझाते हैं कि जो व्यक्ति आत्मज्ञानी हो चुका है, वह कर्म करने या न करने के द्वंद्व से ऊपर उठ जाता है। उसकी प्रसन्नता और शांति किसी बाहरी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती। वह पूरी तरह से अपने भीतर ही तृप्त रहता है।

शास्त्रीय दृष्टि से, आत्मज्ञानी पुरुष के लिए कोई 'कर्तव्य' शेष नहीं रहता क्योंकि उसके भीतर कोई अपूर्णता नहीं होती। परंतु, समाज को सही मार्ग दिखाने (लोकसंग्रह) के लिए वह कर्म करता रहता है। उसका कर्म करना किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि संसार के कल्याण और मर्यादा की रक्षा के लिए होता है, जैसे राजा जनक या स्वयं भगवान श्री कृष्ण करते हैं।

'अर्थव्यपाश्रयः' का अर्थ है—अपने किसी स्वार्थ या प्रयोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहना। दैनिक जीवन में, जब हम अपनी खुशी के लिए दूसरों की प्रशंसा, धन या अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं, तो हम दुखी होते हैं। इस श्लोक को जीवन में उतारने का अर्थ है कि हम अपनी खुशी को आंतरिक बनाएं, जिससे कोई भी बाहरी परिस्थिति हमारी मानसिक शांति को भंग न कर सके।

यह श्लोक गृहस्थों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए अनेक जिम्मेदारियां और तनाव होते हैं। यदि गृहस्थ इस श्लोक के भाव को समझकर 'निष्काम भाव' से अपने परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का पालन करे, तो वह घर में रहते हुए भी सन्यासी की भांति मुक्त रह सकता है। यह श्लोक पलायनवाद का नहीं, बल्कि अनासक्ति का संदेश देता है।

सामान्य मनुष्य जब अपने नियत कर्तव्यों को छोड़ता है, तो उसे आलस्य या प्रमाद के कारण पाप (दोष) लगता है। परंतु आत्मज्ञानी पुरुष का अंतःकरण राग-द्वेष से सर्वथा मुक्त होता है। वह यदि बाह्य रूप से कर्म न भी करे, तो भी उसका मन सदैव परमात्मा में लीन रहता है। इसलिए उसके किसी भी आचरण से कोई पाप या पुण्य का बंधन उत्पन्न नहीं होता।

© Bhaktilok.in — सनातन धर्म, दर्शन और संस्कृति का पावन मंच।

"सर्वं श्रीकृष्णार्पणमस्तु"

श्लोक का अर्थ / Meaning

आत्मसंतुष्ट पुरुष के लिए कर्म करने या न करने से कुछ लाभ-हानि नहीं, वह किसी पर आश्रित नहीं। The self-satisfied has no benefit from action or inaction; he depends on nothing.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/43 42% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!