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🙏 भजामि विन्ध्यवासिनी स्तोत्रम्
(निशुम्भ-शुम्भ-गर्जनी) – संपूर्ण श्लोक व अर्थ
📝 स्तोत्र परिचय
📜 भजामि विन्ध्यवासिनी स्तोत्रम् (संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ)
॥ १ ॥
निशुम्भ-शुम्भ-गर्जनी,
प्रचण्ड-मुण्ड-खण्डिनी।
वन-रणे प्रकाशिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी॥
अर्थ: जो निशुम्भ और शुम्भ राक्षसों के गर्जन को ध्वस्त करने वाली हैं, जो प्रचण्ड (भयंकर) मुण्ड (सिरों) को खण्डित करने वाली हैं, जो वन और युद्ध में प्रकाशमान हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ २ ॥
त्रिशूल-मुण्ड-धारिणी,
धरा-विघात-हारिणी।
गृहे-गृहे निवासिनी,
भजामि विन्ध्यवासिनी॥
अर्थ: जो त्रिशूल और मुण्ड (खोपड़ी) धारण करती हैं, जो पृथ्वी के विघ्नों को हरने वाली हैं, जो घर-घर में निवास करती हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ३ ॥
दरिद्र-दुःख-हारिणी,
सदा विभूति-कारिणी।
वियोग-शोक-हारिणी,
भजामि विन्ध्यवासिनी॥
अर्थ: जो दरिद्रता और दुःख को दूर करने वाली हैं, जो सदा ऐश्वर्य प्रदान करने वाली हैं, जो वियोग और शोक को हरने वाली हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ४ ॥
लसत्-सुलोल-लोचनं,
लतासनं वरप्रदम्।
कपाल-शूल-धारिणी,
भजामि विन्ध्यवासिनी॥
अर्थ: जिनके नयन चंचल और सुन्दर हैं, जो लता (बेल) के समान सुन्दर आसन पर विराजमान हैं, जो वरदान देने वाली हैं, जो कपाल और शूल धारण करती हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ५ ॥
कराब्ज-दान-दायिनीं,
शिवाशिव-प्रदायिनीम्।
वरा-वराननां शुभां,
भजामि विन्ध्यवासिनीम्॥
अर्थ: जो कमल के समान हाथों से दान देने वाली हैं, जो शिव (कल्याण) और अशिव (अकल्याण) दोनों का फल प्रदान करने वाली हैं (भक्त की भावना के अनुसार), जो वरदान देने वाली, सुन्दर मुख वाली और शुभ हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ६ ॥
कपीन्द्र-जामिनी-प्रदां,
त्रिधा-स्वरूप-धारिणीम्।
जले-थले निवासिनीं,
भजामि विन्ध्यवासिनीम्॥
अर्थ: जो कपीन्द्र (हनुमान) और जामिनी (रात्रि) प्रदान करने वाली हैं, जो तीन रूपों (सृष्टि, स्थिति, संहार) को धारण करने वाली हैं, जो जल और थल (स्थल) में निवास करने वाली हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ७ ॥
विशिष्ट-शिष्ट-कारिणीम्,
विशाल-रूप-धारिणीम्।
महोदरे विलासिनीं,
भजामि विन्ध्यवासिनीम्॥
अर्थ: जो विशिष्ट और शिष्ट (उत्तम) कार्य करने वाली हैं, जो विशाल रूप धारण करने वाली हैं, जो महोदर (विशाल उदर) में विलास करने वाली हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
॥ ८ ॥
पुरन्दरादि-सेवितां,
पुरादि-वन्स-खण्डिताम्।
विशुद्ध-बुद्धि-कारिणीं,
भजामि विन्ध्यवासिनीम्॥
अर्थ: जिनकी इन्द्र (पुरन्दर) आदि देवगण सेवा करते हैं, जो पुर (त्रिपुर) आदि असुरों का खण्डन करने वाली हैं, जो विशुद्ध बुद्धि प्रदान करने वाली हैं, उन विन्ध्यवासिनी देवी की मैं भजना करता हूँ।
🕉️ इति श्रीभजामि विन्ध्यवासिनी स्तोत्रम् सम्पूर्णम्।
✨ भजामि विन्ध्यवासिनी स्तोत्र का महत्व
यह स्तोत्र माँ विन्ध्यवासिनी की स्तुति में रचित एक अत्यन्त प्रभावशाली स्तोत्र है। माँ विन्ध्यवासिनी भगवती दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं, जो विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करती हैं। यह स्तोत्र निशुम्भ-शुम्भ-गर्जनी के नाम से भी प्रसिद्ध है, क्योंकि इसमें माँ के उस रूप का वर्णन है जिन्होंने निशुम्भ और शुम्भ नामक राक्षसों का वध किया था।
इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्त को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- दरिद्रता और दुःख का नाश – देवी दरिद्र-दुःख-हारिणी हैं, अतः इनके स्मरण से आर्थिक कष्ट दूर होते हैं।
- विघ्नों का निवारण – ये धरा-विघात-हारिणी हैं, अर्थात पृथ्वी के सभी विघ्नों को हरने वाली हैं।
- शत्रुओं का संहार – निशुम्भ-शुम्भ-गर्जनी, प्रचण्ड-मुण्ड-खण्डिनी – ये शत्रुओं का विनाश करने वाली हैं।
- वियोग-शोक का निवारण – जो वियोग और शोक को हरने वाली हैं।
- विशुद्ध बुद्धि की प्राप्ति – विशुद्ध-बुद्धि-कारिणी होने के कारण ये स्पष्ट एवं शुद्ध बुद्धि प्रदान करती हैं।
इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से नवरात्रि के अवसर पर, मंगलवार, शुक्रवार या अष्टमी-नवमी के दिन करना चाहिए। भक्ति और श्रद्धा से इसका जाप करने से माँ विन्ध्यवासिनी की असीम कृपा प्राप्त होती है।
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