Ram Bhajan

आज रंग बरसाने बरसाने आयो नटवर नंद किशोर रसिया (aaj rang barsane barsane aayo natvar nandkishor rasiya Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

79 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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आज रंग बरसाने बरसाने आयो नटवर नंद किशोर रसिया - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

"आज रंग बरसाने बरसाने आयो नटवर नंद किशोर रसिया" ब्रजभूमि की अगाध भक्ति और माधुर्य रस का वह जीवंत भजन है जो फाल्गुन मास की मस्ती, राधा-कृष्ण के असीम प्रेम और लठमार होली की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत कर देता है। भगवान श्री कृष्ण, जिन्हें 'नटवर नंद किशोर' के रूप में पूजा जाता है, वे केवल द्वारकाधीश या योगीराज ही नहीं, अपितु ब्रज के वे प्रिय रसिया हैं जो गोपियों के साथ फाग खेलने बरसाने की कुंज-गलियों में पदार्पण करते हैं। ब्रज की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह जीव (गोपी/भक्त) और ब्रह्म (कृष्ण) के बीच के आनंदमय मिलन का प्रतीक है, जहाँ अहंकार के सारे रंग धोकर केवल भगवत्प्रेम का रंग शेष रहता है। इस भजन का गायन विशेष रूप से फाल्गुन संक्रांति, होली के पावन पर्व, मंदिरों में होने वाले समाज गायन और ब्रज यात्रा के दौरान अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ किया जाता है। इसके स्वर सुनते ही मन वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर और बरसाने की लाडली जी के प्रांगण में पहुँच जाता है, जहाँ हर हृदय में केवल कृष्ण-प्रेम की हिलोरें उठती हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थाई (मukhda):

आज रंग बरसाने, बरसाने आयो नटवर नंद किशोर (रसिया),
आज रंग बरसाने बरसाने, आयो नटवर नंदकिशोर।
नटवर नंद किशोर किशनीयां, रस-लम्पट रसभौर॥

अंतरा 1:

ग्वाल बाल का लेकर टोला।
रंग रंगों का भर कर झोला॥
हल्ला-गुल्ला कर कर सजनी, खूब मचायो शोर-आज...

अंतरा 2:

गोपिन छीन लियो पिचकारी।
नर से आज बनायो नारी॥
मुंह छुपाता फिरे सांवरा, जैसे भागत चोर - आज...

अंतरा 3:

घुंघट में कान्‍हां शरमावे।
छोड़ो छोड़ो तरले पावे॥
राधा रानी हाथ नचावे, नटखट नंदचकोर - आज...

अंतरा 4:

गुलाल उड़े बादर बन छाये।
ब्रज के लोग देखने आये॥
भक्त जन गावें मंगल गीत, मचे चहूं ओर शोर - आज...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस सुंदर भजन का भावार्थ ब्रज की अनूठी संस्कृति और राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों में निहित है। जब फागुन मास में नटवर नंदकिशोर अपने सखाओं (ग्वाल-बालों) का दल लेकर बरसाने में रंग खेलने पहुँचते हैं, तो वहाँ का दृश्य अद्भुत होता है। 'नटवर नंद किशोर किशनीयां' पद में कृष्ण की उस कलात्मकता का वर्णन है जो ब्रज की गोपियों के हृदय को मोह लेती है। वे हाथों में गुलाल और रंगों से भरी झोली लेकर बरसाने की गलियों में आते हैं और चारों तरफ हंसी-ठिठोली का शोर मच जाता है।

भजन के अगले चरण में बरसाने की हसमुख और स्वाभिमानी गोपियों का पराक्रम झलकता है। वे कृष्ण और उनके सखाओं की पिचकारियां छीन लेती हैं और हँसी-मज़ाक में नटखट सांवरे को स्त्री के वेश (घूंघट) में सजा देती हैं। जिस कृष्ण से सारा संसार डरता है और जो गोवर्धन धारी हैं, वे गोपियों के हाथों पराजित होकर चोर की भांति मुंह छुपाते फिरते हैं। राधा रानी अपनी सखियों के साथ कान्हा को नचाती हैं और कान्हा हाथ जोड़कर क्षमा मांगते नजर आते हैं। यह प्रसंग जीव और ईश्वर के बीच के उस मधुर और अनन्य संबंध को दर्शाता है जहाँ भक्त अपने प्रेम से भगवान को भी नचाने की सामर्थ्य रखता है। गुलाल के बादल आसमान में छा जाते हैं और संपूर्ण ब्रजमंडल आनंद और उल्लास में डूब जाता है.

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि इसके कई आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयाम हैं:

  • माधुर्य भक्ति का प्रतीक: यह भजन चैतन्य महाप्रभु और मीराबाई द्वारा पोषित माधुर्य उपासना पद्धति का जीवंत उदाहरण है, जहाँ भगवान के साथ सखा, प्रेमी और प्रियतम का संबंध स्थापित किया जाता है।
  • अहंकार का शमन: जिस प्रकार सर्वशक्तिमान कृष्ण बरसाने की गोपियों के आगे हार मान जाते हैं और घूंघट में छुपते हैं, वह यह सिखाता है कि प्रेम के आगे सारे अहंकार और बल नतमस्तक हो जाते हैं।
  • सांस्कृतिक एकता और उल्लास: यह भजन ब्रज की लोक संस्कृति, परंपरा और सामूहिक भाईचारे का प्रतीक है जो पीढ़ियों से लोगों को बांधे हुए है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए फाल्गुन मास, विशेषकर बसंत पंचमी से लेकर होली के पावन पर्व (धुलंडी) तक का समय सर्वोत्तम माना जाता है। इसे सुबह के समय नित्यकर्म से निवृत्त होकर भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के श्री चरणों में ध्यान लगाकर गाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त:

  • मंदिरों में होने वाले फागोत्सव और समाज गायन के दौरान।
  • कीर्तन, सत्संग और घरों में होने वाली पारिवारिक पूजा के समय।
  • वृंदावन, बरसाना या गोवर्धन की तीर्थयात्रा के दौरान बस या मार्ग में यात्रा करते समय।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के आराध्य भगवान श्री कृष्ण और वृषभान नंदिनी श्री राधा रानी हैं। इनके साथ ही ब्रज की समस्त गोपियां, ग्वाल-बाल और संत समाज इस परंपरा के संवाहक रहे हैं। वल्लभाचार्य, निंबार्क आचार्य और चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने ब्रज की इसी प्रेम-भक्ति को संपूर्ण विश्व में प्रचारित किया, जहाँ भगवान को अपने बच्चे, सखा या प्रियतम के रूप में भजने की परंपरा है। अधिक जानकारी के लिए आप श्री कृष्ण भजन संग्रह पढ़ सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

ब्रज के लोकगीतों और पारंपरिक भजनों की श्रृंखला में यह रचना मौखिक परंपरा से होती हुई लिखित स्वरूप में आई है। ब्रज भाषा की सुमधुर शब्दावली और ठेठ ग्रामीण मुहावरों का इसमें सुंदर प्रयोग हुआ है। यह रचना उन अज्ञात संत कवियों और ब्रजवासियों की देन है जिन्होंने राधा-कृष्ण की नित्य विहार लीलाओं को अपनी रचनाओं में अमर कर दिया। इसके बोल ब्रज की गलियों की हर उस गूंज को दर्शाते हैं जो आज भी बरसाने की होली में अनुभव की जाती है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ ब्रज भाषा में रचित है, जिसमें संगीतात्मकता और लयबद्धता का अनूठा समन्वय है। इसमें निम्नलिखित साहित्यिक विशेषताएं पाई जाती हैं:

  • लोकोक्तियाँ एवं मुहावरे: 'रंग बरसे', 'छोड़ो तरले पावे' जैसे प्रयोग ब्रज की मौलिकता को दर्शाते हैं।
  • हास्य और रस का सुंदर मिश्रण: श्रृंगार रस के साथ-साथ हास्य रस का अनूठा मेल इस भजन को बालकों से लेकर वृद्धों तक सभी का प्रिय बनाता है।
  • गेयता (Rhythm): भजन का प्रत्येक चरण ताल और ढोलक की थाप पर आसानी से गाया जा सकता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के साथ हमारा संबंध भय या औपचारिकता का नहीं, बल्कि अगाध प्रेम और अपनापन का होना चाहिए। जिस प्रकार गोपियां कृष्ण के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती हैं, वह जीव की परमात्मा के प्रति स्वतंत्रता और आत्मीयता को दर्शाता है। जीवन में चाहे कितनी भी व्यस्तताएं हों, भगवान के प्रति उत्सवधर्मिता और आनंद का भाव कभी कम नहीं होना चाहिए। उत्सव और भक्ति का यह समन्वय जीवन को निराशा से उबारकर सकारात्मकता से भर देता है। इसी प्रकार के अन्य पावन गीतों के लिए विशेष होली भजन लिरिक्स देखें।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
नटवर नंद किशोर कलाओं में श्रेष्ठ, नंद बाबा के पुत्र कृष्ण भगवान श्री कृष्ण का संबोधन
रसिया रस से परिपूर्ण, प्रेम में मग्न व्यक्ति ब्रज के सांवरे कृष्ण के लिए
रस-लम्पट रसभौर प्रेम रस में पूरी तरह डूबे हुए भौंरे समान कृष्ण की रसपूर्ण छवि
तरले पावे विनती करना / पैर पड़ना गोपियों के आगे कृष्ण का हार मानना
नंदचकोर नंद बाबा का प्रिय चकोर पक्षी समान पुत्र कृष्ण का एक सुंदर नाम

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"आज रंग बरसाने, बरसाने आयो नटवर नंद किशोर..." - कवि वर्णन करता है कि आज का दिन अत्यंत पावन है क्योंकि स्वयं योगेश्वर कृष्ण बरसाने की कुंजों में रंग खेलने पधारे हैं।

"ग्वाल बाल का लेकर टोला, रंग रंगों का भर कर झोला..." - कृष्ण अकेले नहीं आए हैं, बल्कि अपने सखा मित्रों का पूरा दल लेकर आए हैं जिनके पास रंगों और गुलाल से भरी झोलियां हैं।

"गोपिन छीन लियो पिचकारी, नर से आज बनायो नारी..." - बरसाने की चतुर गोपियों ने कान्हा की पिचकारी छीन ली और हँसी-मज़ाक में उन्हें स्त्री के वस्त्र पहनाकर घूंघट में बैठा दिया।

"घुंघट में कान्‍हां शरमावे, छोड़ो छोड़ो तरले पावे..." - कृष्ण लज्जित होकर घूंघट में शरमा रहे हैं और गोपियों के आगे हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि अब छोड़ दो।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान श्री कृष्ण की आराधना और ब्रज रस के स्मरण हेतु निम्नलिखित श्लोक का स्मरण अत्यंत फलदायी माना जाता है:

"कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्ष्स्थल कौस्तुभम्।
नासाये वरमौक्तिकं करतले, मुरली च बाहुदले॥
सर्वाङ्गङ्ग सुधोन्मृते दिविषदो, वन्धे कृपानिधिम्।
मद्वाचार्य सुलोचनामृतरसं, राधे श्यामा सहचरम्॥"

यह श्लोक भगवान श्री कृष्ण और राधारानी के उस दिव्य स्वरूप का दर्शन कराता है जो भक्त के हृदय में प्रेम रस का संचार करता है। आप चाहें तो श्री राधा अष्टक स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

बिंदु विवरण
भजन का नाम आज रंग बरसाने बरसाने आयो नटवर नंद किशोर रसिया
आराध्य देवी-देवता श्री राधा-कृष्ण (युगल सरकार)
रचनाकार / परंपरा पारंपरिक ब्रज लोकगीत / संत परंपरा
भाषा ब्रजभाषा एवं हिंदी
मुख्य थीम फाल्गुन उत्सव, लठमार होली, माधुर्य भक्ति
मुख्य भाव प्रेम, उल्लास, हास्य एवं समर्पण
गाने का उपयुक्त अवसर फाल्गुन मास, होली, सत्संग और मंदिर उत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के बीच बरसाने की होली और फाल्गुन मास के उत्सव से संबंधित है।

यह मुख्य रूप से फाल्गुन मास, होली के त्योहार, बरसाने की लठमार होली के उत्सव और मंदिरों में होने वाले समाज गायन के दौरान गाया जाता है।

'नटवर नंद किशोर' भगवान श्री कृष्ण का संबोधन है, जो नंद बाबा के पुत्र हैं और अपनी लीलाओं से सबको नचाते हैं।

यह भजन ठेठ ब्रज भाषा और लोक शैली में रचित है, जो ब्रज की संस्कृति को जीवंत करता है।

इस भजन के गायन से मन में सकारात्मकता, आनंद और भगवान श्री कृष्ण के प्रति माधुर्य भक्ति का भाव जागृत होता है।

हाँ, इसे होली के दिनों में या सत्संग के दौरान घर पर परिवार के साथ संगीत के साथ अत्यंत उत्साह से गाया जा सकता है।

गोपियों ने कृष्ण की पिचकारी छीन ली और हँसी-मज़ाक में उन्हें स्त्री का वेश पहनाकर घूंघट में छुपा दिया।

ब्रज की होली में द्वापर युग की लीलाओं का सजीव रूप देखने को मिलता है, जहाँ लठमार होली, समाज गायन और प्रेम का अनूठा उत्सव मनाया जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख ब्रज की लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और कृष्ण भक्ति के ग्रंथों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करना है ताकि वे ब्रज के उत्सवों के आध्यात्मिक मर्म को समझ सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ब्रज के सांस्कृतिक उत्सव एवं लोकगीत परंपरा - शोध एवं संदर्भ ग्रंथ।
  • श्रीमद्भागवत पुराण - रासलीला एवं फागोत्सव प्रसंग।
  • भक्ति कालीन संत साहित्य एवं ब्रज भाषा कोष।
  • पारंपरिक समाज गायन संकलन, वृंदावन।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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