क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए लिरिक्स (Kya Khilaya Jaye Tujhe Kya Pilaya Jaye Lyrics in Hindi) - शिव भजन
देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित यह अत्यंत पावन और भावपूर्ण भजन "क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए लिरिक्स (Kya Khilaya Jaye Tujhe Kya Pilaya Jaye Lyrics in Hindi) - Shiv Bhajan" सनातन धर्म और शिव भक्ति की उस सर्वोच्च अवस्था का सजीव चित्रण करता है जहाँ साधक अपने आराध्य के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और आत्मीयता का भाव प्रकट करता है। हिंदू पौराणिक परंपरा में भगवान शिव को 'आशुतोष' अर्थात अतिशीघ्र प्रसन्न होने वाले और 'भोलेनाथ' कहा गया है। उन्हें संसार के मोह-माया, राजसी वैभव या स्वर्ण-रत्नों की कोई अभिलाषा नहीं होती; वे केवल एक लोटा जल, धतूरा, बेलपत्र और सच्चे भाव के भूखे हैं। इस भजन के माध्यम से साधक यह पूछता है कि जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण चराचर जगत को अन्न-जल और जीवन प्रदान किया है, जिसे समस्त ब्रह्मांड का पोषणकर्ता माना जाता है, उसे भक्त अपने क्षुद्र सामर्थ्य से क्या भोग अर्पित करे। यह भजन शिव भक्तों के बीच विशेष रूप से महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, प्रदोष व्रत और विभिन्न सत्संग समारोहों में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इसके शब्द श्रोता के मन में भक्ति रस का संचार करते हुए उसे सांसारिक दुखों से ऊपर उठाकर परम चेतना से जोड़ने का सामर्थ्य रखते हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मुखड़ा:
क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए,
मेरे भोलेनाथ तुझे क्या रिझाया जाए!
तू तो खुद ही जग का पालनहार है दाता,
तुझको दुनिया का हर एक भोग सुहाता।
अंतरा 1:
लोग चढ़ाते हैं तुझको सोने और चांदी के हार,
मेरे पास तो केवल भक्ति का है सच्चा प्यार।
बेलपत्र और धतूरा ही मेरी पूंजी है प्यारे,
चरणों में तेरे जीवन के हर दुःख हैं हमारे।
क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए... शशिभूषण तुझे क्या रिझाया जाए!
अंतरा 2:
गंगा धारी जटाओं में तेरी जल की धारा बहे,
तेरी महिमा को त्रिलोकी में वेद पुराण कहें।
भांग और ठंडाई का भोग तू प्रेम से स्वीकार करे,
भक्त का छोटा सा अर्पण भी तू बेहिसाब करे।
क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए... त्रिनेत्रधारी तुझे क्या रिझाया जाए!
अंतरा 3:
भस्म रमी है अंग पे तेरे, मृगचर्म का वास,
तू ही आदि और अंत है मेरा, तू ही श्वास-प्रश्वास।
नंदी पे हो कर सवार, तू जग कल्याण करे,
तेरी एक नजर से जीवन के सारे पाप हरे।
क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए... नीलकंठ तुझे क्या रिझाया जाए!
समापन / रिफ़्रेन:
तेरा नाम ही सबसे बड़ा प्रसाद है देवा,
जन्म-जन्मांतर तक करते रहें हम तेरी सेवा।
भक्ति के इस सागर में हमको गोता लगाने दे,
शिव शंकर मेरे मन में अपना वास बसाने दे!
क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए... मेरे भोलेनाथ तुझे क्या रिझाया जाए!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस सुंदर भजन का भावार्थ बहुत ही गहरा और आध्यात्मिक है। भजन के आरंभ में भक्त आकुल भाव से यह पूछता है कि हे भोलेनाथ! आप तो पूरे ब्रह्मांड के भरण-पोषण करने वाले हैं, संपूर्ण सृष्टि की क्षुधा और प्यास को शांत करने वाले हैं, भला मैं आपको क्या खिलाऊँ और क्या पिलाऊँ? जो स्वयं सम्पूर्ण चराचर जगत का स्वामी हो, उसे भौतिक वस्तुओं का भोग लगाना केवल साधक के आंतरिक प्रेम और समर्पण को व्यक्त करने का माध्यम मात्र है।
भजन के अगले चरणों में भक्त अपनी दीनता और भगवान की उदारता का बहुत ही सुंदर वर्णन करता है। संसार के धनी लोग भले ही भगवान को सोने-चांदी के आभूषण और महंगे उपहार चढ़ाते हों, किंतु एक साधारण भक्त के पास केवल श्रद्धा, विश्वास और प्रेम के फूल होते हैं। भगवान शिव ऐसे दयालु हैं कि वे करोड़ों के महलों की अपेक्षा एक छोटे से बेलपत्र और थोड़े से जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे जटाओं में गंगा धारण करने वाले और विष को कंठ में रोकने वाले 'नीलकंठ' हैं, जिन्हें सांसारिक वैभव से कोई मोह नहीं है। वे केवल और केवल शुद्ध अंतःकरण की भक्ति से रीझते हैं। यह भजन साधक को सिखाता है कि ईश्वर के समक्ष सामग्री का नहीं, बल्कि समर्पण के भाव का महत्व होता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
देवादिदेव महादेव को समर्पित यह भजन न केवल संगीतिक दृष्टि से अत्यंत मधुर है, बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्व भी बहुत व्यापक है। इसकी मुख्य विशेषताओं में भगवान शिव के वैराग्य, उनकी सहजता और उनकी असीम करुणा का गुणगान शामिल है। सनातन धर्म में शिव को 'भोलेनाथ' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे बहुत थोड़ी सी पूजा से संतुष्ट हो जाते हैं।
- वैराग्य का संदेश: यह भजन साधक को सांसारिक प्रपंचों और दिखावे से दूर रहकर सरल जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
- आंतरिक प्रेम की प्रधानता: इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि भगवान को बाहरी दिखावे की वस्तुएं नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और सच्चा प्रेम चाहिए।
- सुलभ आराधना: बेलपत्र, जल और धतूरे जैसी प्रकृति की सहज देन से शिव की आराधना का मार्ग प्रशस्त करता है।
- सार्वभौमिक स्वीकार्यता: यह भजन हर आयु वर्ग के लोगों और शिव भक्तों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भगवान शिव की आराधना और इस भजन का गायन या श्रवण करने के लिए कुछ विशेष समय और नियम निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें अपनाने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है:
- प्रातःकाल और प्रदोष काल: सुबह स्नान के पश्चात सूर्योदय के समय या संध्याकाल में प्रदोष बेला में इस भजन का श्रवण और गायन अत्यंत फलदायी माना गया है।
- सावन मास और सोमवार: पवित्र सावन मास में और प्रत्येक सोमवार को शिवालय में रुद्राभिषेक के दौरान इस भजन को गाने से विशेष कृपा मिलती है।
- महाशिवरात्रि पर्व: महाशिवरात्रि की रात्रि के चारों प्रहर की पूजा में जागरण के समय इस भजन से वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है।
- सत्संग एवं मंडली: पारिवारिक अनुष्ठानों, भंडारों और शिव चर्चा के आयਤनों में सामूहिक रूप से इसे गाने से सामूहिक ऊर्जा और भक्ति का संचार होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में सनातन परंपरा के प्रमुख देवता भगवान शिव (महादेव, शंकर, भोलेनाथ) हैं। शिव हिंदू त्रिमूर्ति में संहार और पुनरुत्थान के देवता हैं, किंतु वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत कृपालु और करुणामय हैं। उन्हें आदि योगी भी कहा जाता है जो कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न रहते हैं। इस भजन की रचना लोक परंपरा और संत कवियों की उस धारा से प्रेरित है जो आडंबरों का खंडन करती है और सीधे ईश्वर के साथ हृदय के संवाद को महत्व देती है। शिव भक्तों और नाथ पंथ के योगियों के संकीर्तन में ऐसे भावप्रधान भजनों का विशेष स्थान रहा है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
लोक संगीत और भजन परंपरा में ऐसे गीत पीढ़ियों से मौखिक रूप से और लिखित रूप में प्रवाहित होते रहे हैं। "क्या खिलाया जाए तुझे..." भजन की पृष्ठभूमि उत्तर भारतीय लोक संगीत, भजन संध्याओं और संतवाणी पर आधारित है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में भक्तजनों ने अपने सरल शब्दों में महादेव के प्रति अपने प्रेम को इन पंक्तियों में ढाला है। यह भजन किसी एक विशेष कवि की रचना होने के साथ-साथ लोक-मानस की सामूहिक अभिव्यक्ति बन चुका है, जो हर शिव भक्त के दिल की आवाज़ बन जाता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और आम बोलचाल की हिंदी तथा ब्रज-अवधि मिश्रित लोक शैली है। इसमें किसी भी प्रकार के क्लिष्ट संस्कृत शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है ताकि एक साधारण ग्रामीण से लेकर आधुनिक नगरवासी तक हर कोई इसके अर्थ को आसानी से समझ सके और गा सके। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें प्रश्नोत्तर शैली (क्या खिलाया जाए तुझे...) का सुंदर प्रयोग किया गया है जो श्रोता के मन में जिज्ञासा और भक्ति भाव दोनों को एक साथ जागृत करती है। तुकबंदी और लयबद्धता इसे संगीत के सुरों में आसानी से ढलने योग्य बनाती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल मनोरंजन या संगीत का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक गहन दार्शनिक संदेश देता है:
- अहंकार का त्याग: जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम ईश्वर को कुछ विशेष देने में असमर्थ हैं, तो हमारा अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
- सादगी और संतोष: भगवान शिव का जीवन और यह भजन हमें सादगी से जीने और प्रकृति के करीब रहने की सीख देता है।
- निस्वार्थ भाव से सेवा: भगवान जिस प्रकार बिना किसी भेदभाव के सबको सब कुछ देते हैं, हमें भी अपने जीवन में निस्वार्थ भाव अपनाना चाहिए।
- सच्ची भक्ति: बाहरी आडंबरों और महंगे आयोजनों से अधिक महत्वपूर्ण भगवान के प्रति आंतरिक निष्ठा और प्रेम है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| आशुतोष | शीघ्र प्रसन्न होने वाले | जो भक्त की थोड़ी सी पूजा से ही संतुष्ट हो जाते हैं। |
| नीलकंठ | जिसका कंठ नीला हो | समुद्र मंथन के समय विषपान कर सृष्टि की रक्षा करने वाले। |
| शशिभूषण | जिसने चंद्रमा को आभूषण के रूप में धारण किया हो | मन की शीतलता और शांत चेतना के प्रतीक शिव। |
| त्रिनेत्रधारी | तीन नेत्रों वाले | भूत, भविष्य और वर्तमान को देखने वाली अनंत दृष्टि। |
| मृगचर्म | हिरण की खाल | भोग-विलासिता से पूर्णतः विरक्त और प्रकृति के समीप रहने वाला स्वरूप। |
| भस्म | राख | इस संसार की नश्वरता और वैराग्य का प्रतीक। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए, मेरे भोलेनाथ तुझे क्या रिझाया जाए!"
इस प्रारंभिक पंक्ति में भक्त अपनी असमर्थता और करुणा की पराकाष्ठा को प्रकट करता है। वह सोचता है कि जो समस्त ब्रह्मांड का भरण-पोषण करता है, उसे भोजन या पेय अर्पित करना केवल एक प्रतीक है। असली प्रश्न यह है कि उस महायोगी को कैसे प्रसन्न किया जाए।
"लोग चढ़ाते हैं तुझको सोने और चांदी के हार, मेरे पास तो केवल भक्ति का है सच्चा प्यार।"
यहाँ भक्त सांसारिक धन-दौलत और अपने पास उपलब्ध आत्मीय प्रेम के बीच तुलना करता है। वह स्पष्ट करता है कि उसके पास दिखाने के लिए रत्न नहीं हैं, किंतु भगवान के चरणों में समर्पित निर्मल प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है।
"बेलपत्र और धतूरा ही मेरी पूंजी है प्यारे, चरणों में तेरे जीवन के हर दुःख हैं हमारे।"
शिवलिंग पर अर्पित किए जाने वाले साधारण बेलपत्र और धतूरे को भक्त अपनी अमूल्य निधि मानता है। वह अपने समस्त दुखों को शिव चरणों में समर्पित कर मानसिक शांति प्राप्त करता है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को और अधिक गहरा करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख शिव मंत्रों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
महामृत्युंजय मंत्र - भगवान शिव की कृपा, आरोग्य और मोक्ष प्राप्ति का महामंत्र।
इसके साथ ही भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का निरंतर जप इस भजन के भाव को जीवंत बनाए रखता है। आप इस संदर्भ में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करके शिव की प्रचंड और दिव्य ऊर्जा का अनुभव भी कर सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए (Kya Khilaya Jaye Tujhe Kya Pilaya Jaye) |
| आराध्य देव | भगवान शिव / महादेव / भोलेनाथ |
| रचनाकार / परंपरा | पारंपरिक लोक भजन एवं संत वाणी |
| भाषा | सरल हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य विषय | शिव भक्ति, वैराग्य, प्रेम और समर्पण |
| प्रमुख भाव | निष्कपट प्रेम, आत्मीयता और शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत, भजन संध्या |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"क्या खिलाया जाए तुझे क्या पिलाया जाए" भजन किस देवता को समर्पित है?
यह अत्यंत पावन भजन देवादिदेव महादेव भगवान शिव (भोलेनाथ) को समर्पित है।
इस भजन को कब और किस अवसर पर गाया जाता है?
इसे सावन मास के सोमवार, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, रुद्राभिषेक और किसी भी शिव भजन संध्या या सत्संग के दौरान अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कौन-सी सामग्रियां सबसे प्रिय हैं?
भगवान शिव को शुद्ध जल, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग और चंदन अत्यंत प्रिय हैं। वे बाहरी दिखावे की अपेक्षा सच्चे भाव से शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
क्या इस भजन को घर पर सामान्य पूजा के समय गाया जा सकता है?
हाँ, इस भजन को घर पर सुबह या शाम की पूजा के दौरान, शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय आसानी से गाया जा सकता है, जिससे घर का वातावरण सकारात्मक बनता है।
इस भजन से हमें क्या आध्यात्मिक सीख मिलती है?
यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए महंगे उपहारों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मन की निर्मलता, सादगी और सच्चा प्रेम ही सबसे बड़ा अर्पण है।
शिव भक्ति का मूल आधार क्या माना गया है?
शिव भक्ति का मूल आधार अहंकार का त्याग, सांसारिक मोह-माया से विरक्ति और शिव के कल्याणकारी स्वरूप में पूर्ण विश्वास रखना है।
क्या इस भजन के बोल विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग मिलते हैं?
चूंकि यह एक पारंपरिक लोक भजन है, इसलिए इसके कुछ अंतरा स्थानीय गायकों और क्षेत्रों के अनुसार थोड़ा बहुत भिन्न हो सकते हैं, किंतु इसका मुख्य भाव और मukhड़ा समान रहता है।
शिव जी को 'आशुतोष' क्यों कहा जाता है?
'आशुतोष' का अर्थ है जो बहुत जल्दी संतुष्ट या प्रसन्न हो जाएं। भगवान शिव थोड़े से जल और बेलपत्र से ही अपने भक्त पर प्रसन्न होकर वरदान दे देते हैं, इसलिए उन्हें आशुतोष कहा जाता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok.in के उच्च गुणवत्ता मानकों और धार्मिक साहित्य की परंपराओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इस लेख में भगवान शिव की महिमा, लोक भजन के बोल, उनके दार्शनिक अर्थ और गायन की विधि का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। पाठकों की प्रामाणिक जानकारी और भक्ति भाव को पोषित करने के उद्देश्य से इसे संकलित किया गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव पुराण - कोट रुद्र संहिता एवं ईशान संहिता
- पारंपरिक लोक भजन एवं संत वाणी संग्रह
- सनातन धर्म संस्कृति और शिवाराधना पद्धतियां
- वैदिक दर्शन और भक्ति योग के ग्रंथ
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