Parvati Stotram

प्रदक्षिणा मंत्र(Pradakshina Mantra Lyrics in Sanskrit) - Bhaktilok

323 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

प्रदक्षिणा मंत्र (Pradakshina Mantra Lyrics in Sanskrit) - सम्पूर्ण पावन परिचय

सनातन धर्म, वैदिक संस्कृति और भारतीय पूजा पद्धति में 'प्रदक्षिणा' (Parikrama or Circumambulation) का अत्यंत विशिष्ट, पावन एवं आध्यात्मिक महत्व है। जब कोई साधक या भक्त किसी देव प्रतिमा, पवित्र शिवलिंग, तुलसी का पौधा, पीपल वृक्ष, गोमाता या तीर्थ क्षेत्र की परिक्रमा पूर्ण करता है, तो उसके पश्चात भगवान के चरणों में पूर्ण शरणागति और अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने के भाव से प्रदक्षिणा मंत्र का सस्वर पाठ किया जाता है। "यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे॥" यह अत्यंत प्राचीन, प्रभावशाली और वेदोपनिषद् परंपरा से जुड़ा हुआ श्लोक/मंत्र है जो मनुष्य को अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाने और अंतःकरण को पूर्णतः पवित्र करने का अचूक माध्यम माना गया है।

भक्तिलोचन (Bhaktilok) के इस पावन मंच पर हम आपके लिए प्रदक्षिणा मंत्र के संस्कृत लिरिक्स, शुद्ध पद-विच्छेद, शब्दार्थ, विस्तृत भावार्थ, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व तथा जप विधि की संपूर्ण जानकारी लेकर आए हैं। इस मंत्र का स्मरण करने मात्र से साधक के मन में अहंकार का शमन होता है और विनय एवं भक्ति रस का संचार होता है। परिक्रमा की यह प्रथा केवल भौतिक रूप से चक्कर लगाना नहीं है, बल्कि यह इस दार्शनिक सत्य का प्रतीक है कि सृष्टि के केंद्र में केवल और केवल परमेश्वर (ईश्वर) स्थित हैं और हम सब उस आदि शक्ति के चारों ओर घूमने वाले जीव हैं।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष गणेश्‍वर / महेश्वर / भगवन्॥

श्लोक का उच्चारण एवं पदच्छेद | Pronunciation & Padaccheda

संस्कृत के पावन श्लोकों का शुद्ध उच्चारण साधक को मानसिक एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। प्रदक्षिणा मंत्र के प्रत्येक शब्द को स्पष्ट रूप से बोलना चाहिए ताकि वायुमंडल में दिव्य कंपन उत्पन्न हो सके।

  • प्रथम पंक्ति: यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च (Yāni kāni ca pāpāni janmāntara-kṛtāni ca)
  • द्वितीय पंक्ति: तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे (Tāni sarvāṇi naśyantu pradakṣiṇā pade pade)
  • तृतीय पंक्ति: अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम (Anyathā śaraṇaṃ nāsti tvameva śaraṇaṃ mama)
  • चतुर्थ पंक्ति: तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष महेश्वर / भगवन् (Tasmāt kāruṇya-bhāvena rakṣa rakṣa maheśvara / bhagavan)

पदच्छेद एवं अन्वय | Padaccheda & Anvaya

श्लोक की व्याकरणिक संरचना और अन्वय (शब्दों का क्रम) इस प्रकार है:

अन्वय: यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च (सन्ति), तानि सर्वाणि प्रदक्षिणा पदे पदे नश्यन्तु। (हे ईश्वर्!) अन्यथा मम शरणं नास्ति, त्वम् एव शरणम् असि। तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष।

इसका तात्पर्य यह है कि इस जन्म या पूर्व जन्म के जितने भी संचित पाप या नकारात्मक कर्म हैं, वे भगवान की परिक्रमा करते हुए उनके प्रत्येक कदम के साथ नष्ट हो जाएं। हे प्रभु! आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई रक्षक नहीं है, केवल आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं। अतः अपनी अहेतुकी करुणा से मेरी रक्षा करें, रक्षा करें।

संस्कृत शब्द (Sanskrit Word) पदच्छेद (Padaccheda) सरल Hindi Meaning Contextual Meaning in Puja
यानि कानि यानि + कानि जो कुछ भी, जितने भी समस्त प्रकार के पाप कर्म
पापानि पापानि पाप, अधर्म या त्रुटियां अज्ञात या ज्ञात रूप से किए गए दोष
जन्मान्तरकृतानि जन्म + अन्तर + कृतानि पूर्व जन्मों में किए गए संचित कर्मों का भंडार
नश्यन्तु नश्यन्तु नष्ट हो जाएं, समाप्त हो जाएं शुद्धि और मुक्ति की कामना
प्रदक्षिणा पदे पदे प्रदक्षिणा + पदे + पदे परिक्रमा के प्रत्येक कदम पर निरंतर साधना और समर्पण का मार्ग
अन्यथा शरणं नास्ति अन्यथा + शरणम् + नास्ति इसके अलावा कोई शरण नहीं है पूर्ण अनन्य शरणागति (Surrender)
कारुण्यभावेन कारुण्य + भावेन करुणा या दया के भाव से भगवत कृपा की याचना

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या | Hindi Meaning & Explanation

प्रदक्षिणा मंत्र का यह पावन श्लोक सनातन संस्कृति की उस उच्च भावना का परिचायक है जहाँ मनुष्य अपनी सीमाओं, त्रुटियों और अज्ञानता को स्वीकार करते हुए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है। जब कोई भक्त मंदिर में ओम जय जगदीश हरे आरती या अन्य स्तोत्र पाठ के उपरांत भगवान की परिक्रमा करता है, तो वह इन पंक्तियों के माध्यम से प्रार्थना करता है— "हे प्रभु! इस जन्म में अथवा इसके पूर्व के जन्मों में मेरे द्वारा जाने-अनजाने में जो भी पाप, अपराध या गलतियां हुई हैं, वे सभी आपकी यह परिक्रमा करते-करते आपके चरणों में समाप्त हो जाएं। परिक्रमा के हर एक कदम के साथ मेरे कर्मों का मलिन प्रक्षालन हो जाए।"

जीवन की इस असीम यात्रा में मनुष्य कई बार सांसारिक मोह-माया के जाल में फंसकर गलत मार्ग पर चल पड़ता है। ऐसे में भगवान ही उसका एकमात्र संबल होते हैं। मंत्र के उत्तरार्ध में भक्त कहता है— "हे ईश्वर! इस संसार में मेरे उद्धार के लिए आपके अतिरिक्त अन्य कोई आश्रयदाता नहीं है। आप ही मेरे माता, आप ही मेरे पिता और आप ही मेरे सर्वस्व हैं। इसलिए हे करुणासागर! अपनी अहैतुकी कृपा से मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए।" यह भाव साधक के अहंकार को चूर-चूर कर उसके भीतर परम भक्ति और शांति का बीजारोपण करता है। इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर भक्त श्री हनुमान चालीसा और अन्य पवित्र पाठों से अपने दिन की शुरुआत करते हैं।

श्लोक का मुख्य भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Core Bhava & Spiritual Message

इस पावन मंत्र का केंद्रीय भाव पूर्ण शरणागति (Total Surrender) और आत्म-शुद्धि है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रदक्षिणा का अर्थ है— ईश्वर को अपने जीवन का केंद्रबिंदु मानना। जिस प्रकार सौरमंडल के सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं और अपनी कक्षा में सुरक्षित रहते हैं, ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन के केंद्र में भगवान को रखकर अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। जब हम भगवान की परिक्रमा करते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि ब्रह्मांड की धुरी हम नहीं, बल्कि परमात्मा हैं। यह विचार अहंकार का नाश करता है और मन में नम्रता, परोपकार तथा सेवा की भावना जागृत करता है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ | Scriptural & Mythological Context

प्रदक्षिणा करने की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। विभिन्न पुराणों जैसे स्कन्द पुराण, पद्म पुराण और नारद पुराण में परिक्रमा के विधि-विधान और उसके अचूक फलों का विस्तृत वर्णन मिलता है। शास्त्रानुसार, देवताओं की परिक्रमा दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में की जाती है, क्योंकि सूर्य और पृथ्वी की गति की दिशा भी यही है। परिक्रमा करते समय दाहिना हाथ देव प्रतिमा या पवित्र वस्तु की ओर होना चाहिए। शिव तांडव स्तोत्र के सस्वर पाठ और भगवान शिव की प्रदक्षिणा के समय विशेष रूप से इस मंत्र का स्मरण किया जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि भगवान गणेश ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) की प्रदक्षिणा कर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त किया था, तभी से देव दर्शन के पश्चात परिक्रमा करना अनिवार्य नियम बन गया।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वेदांत दर्शन के अनुसार, यह सम्पूर्ण जगत परमात्मा का ही विस्तार है। जब हम किसी मंदिर या पवित्र स्थान की परिक्रमा करते हैं, तो हम प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाते हैं कि हमारा जीवन भगवान के चारों ओर घूम रहा है। जन्म-जन्मांतर के संस्कारों (कर्म फल) के कारण जीवात्मा भवसागर में भटकती रहती है। प्रदक्षिणा मंत्र का सस्वर उच्चारण इन मानसिक और आत्मिक बंधनों को काटने की एक आध्यात्मिक तलवार है। 'पदे पदे' (कदम-कदम पर) शब्द यह सिखाता है कि साधना कोई एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक कदम पर धर्म, सत्य और ईश्वर का स्मरण बनाए रखना ही असली मनुष्यता है।

दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं सीख | Daily Life Lessons

यह मंत्र केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन में भी उतारा जा सकता है:

  • अहंकार मुक्ति: यह मंत्र हमें सिखाता है कि हम कितने भी ज्ञानी या धनवान क्यों न हों, सर्वोच्च सत्ता ईश्वर की ही है।
  • गलतियों का प्रायश्चित: अनजाने में हुई भूलों को स्वीकार कर क्षमा मांगने की मानसिक शक्ति यह मंत्र प्रदान करता है।
  • नियमित साधना: जीवन के हर पग पर सतर्क रहकर सत्कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
  • मानसिक शांति: तनाव और अवसाद से घिरे होने पर जब व्यक्ति भगवान की शरण में जाता है, तो उसे असीम शांति मिलती है।
  • कर्तव्यनिष्ठा: अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर निष्काम भाव से कार्य करने की सीख मिलती है।
  • विनम्रता: यह मंत्र जीवन में अहंकार को त्यागकर करुणा और प्रेम का मार्ग अपनाने का बल देता है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त | Sadhana & Recitation Vidhi

प्रदक्षिणा मंत्र का पाठ करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • समय: प्रातःकालीन पूजा, संध्या वंदन या मंदिर दर्शन के समय परिक्रमा पूर्ण होने पर तुरंत इस मंत्र का पाठ करें।
  • दिशा: हमेशा देव प्रतिमा, तुलसी या वृक्ष की परिक्रमा दाहिने हाथ की ओर से (दक्षिणावर्त) करें।
  • संख्या: सामान्यतः भगवान की 3, 7, 11 या 21 परिक्रमाएं की जाती हैं। प्रत्येक चक्कर या अंत में इस मंत्र का उच्चारण करें।
  • शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर श्रद्धा भाव के साथ मंत्र का उच्चारण करें।
  • भाव: पाठ करते समय मन में पूर्ण शरणागति और अपने पापों के प्रायश्चित का भाव रखें।

Quick Information Table

विवरण (Details) तथ्य / जानकारी (Facts)
मंत्र का नाम प्रदक्षिणा मंत्र (Pradakshina Mantra)
भाषा संस्कृत (Sanskrit)
मुख्य देवता समस्त देवी-देवता (विष्णु, शिव, गणेश, दुर्गा, सूर्य आदि)
स्रोत / ग्रंथ पुराण एवं सनातन वैदिक परंपरा
उद्देश्य पाप नाश, आत्मशुद्धि और पूर्ण शरणागति
पाठ का अवसर मंदिर परिक्रमा, पूजा और आरती के पश्चात
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति और शरण

मुख्य सीख | Key Takeaways

  1. प्रदक्षिणा मंत्र परिक्रमा प्रक्रिया का एक अनिवार्य और अत्यंत पावन अंग है।
  2. यह मंत्र जन्म-जन्मांतर के ज्ञात-अज्ञात पापों को नष्ट करने में सहायक है।
  3. इस मंत्र के माध्यम से भक्त ईश्वर के प्रति अपनी पूर्ण शरणागति व्यक्त करता है।
  4. परिक्रमा करने से शरीर और मन दोनों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  5. जीवन के केंद्र में ईश्वर को रखने से सारे संताप दूर हो जाते हैं।
  6. यह अहंकार का शमन कर साधक को विनम्र और संवेदनशील बनाता है।
  7. नियमित पूजा और पाठ के साथ इसका स्मरण करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रदक्षिणा मंत्र का मुख्य अर्थ क्या है?

इस मंत्र का अर्थ है कि इस जन्म और पूर्व जन्मों के मेरे सभी पाप परिक्रमा के प्रत्येक कदम के साथ नष्ट हो जाएं। हे प्रभु, आपके सिवा मेरा कोई अन्य रक्षक नहीं है, अतः अपनी करुणा से मेरी रक्षा करें।

परिक्रमा हमेशा किस दिशा में करनी चाहिए?

सनातन धर्म में हमेशा दक्षिणावर्त (Clockwise - दाहिने हाथ की तरफ से) ही देवी-देवताओं, तुलसी और पवित्र वृक्षों की परिक्रमा करने का विधान है।

क्या घर में पूजा करते समय भी परिक्रमा की जा सकती है?

हाँ, यदि घर के मंदिर में स्थान सीमित हो, तो अपनी ही जगह पर खड़े होकर दाहिने हाथ की ओर तीन बार घूमकर (आत्म-प्रदक्षिणा करके) इस मंत्र का पाठ किया जा सकता है।

प्रदक्षिणा मंत्र का पाठ कब करना चाहिए?

भगवान की आरती, पूजा और परिक्रमा पूर्ण करने के तुरंत पश्चात हाथ जोड़कर इस मंत्र का सस्वर पाठ करना चाहिए।

क्या यह मंत्र सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा के लिए उपयुक्त है?

निश्चित रूप से, यह सार्वभौमिक मंत्र है जिसे श्री विष्णु, शिव, माता दुर्गा, गणेश जी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा के समय बोला जा सकता है।

परिक्रमा करते समय माला फेरनी चाहिए या मंत्र जपना चाहिए?

परिक्रमा करते समय मुख्य रूप से इस श्लोक का मानसिक या हल्का मौखिक उच्चारण करना चाहिए, माला फेरने की अनिवार्यता नहीं होती।

इस मंत्र के जाप से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है?

इसके नियमित स्मरण से मन शांत होता है, अहंकार समाप्त होता है और भगवान के प्रति अगाध प्रेम एवं विश्वास की प्राप्ति होती है।

क्या प्रदक्षिणा मंत्र वेदों से लिया गया है?

यह मंत्र पौराणिक स्तोत्रों और सनातन पारंपरिक पूजा पद्धतियों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है जो सदियों से संतों और आचार्यों द्वारा प्रसारित किया गया है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोचन (Bhaktilok) पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन ग्रंथों, पुराणों और पारंपरिक आचार्यों के वचनों के आधार पर संकलित की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध संस्कृत मंत्रों का सही अर्थ और विधि बताना है। यह सामग्री पूरी तरह से शोधित और सत्यता पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • स्कन्द पुराण एवं पद्म पुराण - धार्मिक अनुष्ठान खंड
  • सनातन धर्म कर्मकांड पद्धति एवं पूजा विधान
  • वेदिक मंत्रोच्चार एवं स्तोत्र रत्नाकर

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!