Parvati Stotram

पवित्र करने का मंत्र(Pavitra karne ka mantra in Sanskrit) - Bhaktilok

249 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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पवित्र करने का मंत्र (Pavitra Karne Ka Mantra in Sanskrit) - परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में किसी भी पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान, संध्यावंदन या मांगलिक कार्य को आरंभ करने से पूर्व 'पवित्रीकरण' (Purification) की परंपरा है। इस प्रक्रिया में जिस परम पावन मंत्र का उच्चारण किया जाता है, उसे "पवित्र करने का मंत्र" या "पवित्रीकरण मंत्र" कहा जाता है। यह मंत्र है—"अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा..."। यह दिव्य मंत्र केवल बाह्य शरीर को ही नहीं, बल्कि साधक के अंतःकरण, मन, बुद्धि और संपूर्ण चेतना को पवित्र करने की अद्भुत सामर्थ्य रखता है। इस मंत्र के माध्यम से हम भगवान पुंडरीकाक्ष (कमल नयन भगवान विष्णु) का स्मरण करते हैं, जिनकी कृपा मात्र से मनुष्य हर प्रकार की अशुद्धि से मुक्त होकर देव-पूजन के योग्य बन जाता है। प्रस्तुत लेख में हम इस मंत्र के शास्त्रीय संदर्भ, शुद्ध उच्चारण, विस्तृत शब्दार्थ, दार्शनिक महत्व और दैनिक जीवन में इसके प्रयोग की विधि का सविस्तार अध्ययन करेंगे।

मूल मंत्र एवं शुद्ध पाठ | Complete Mantra

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद | Mantra Pronunciation

संस्कृत मंत्रों के पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए उनका शुद्ध उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। इस मंत्र के कठिन शब्दों का उच्चारण और पद-विच्छेद नीचे दिया गया है ताकि साधक इसका त्रुटिहीन पाठ कर सकें:

  • अपवित्रः (A-pa-vi-trah): अ-प-वि-त्रः (विसर्ग का हल्का 'ह' ध्वनि के साथ उच्चारण करें)।
  • पवित्रो वा (Pa-vi-tro Vaa): प-वि-त्रो वा।
  • सर्वावस्थां (Sar-vaa-vas-thaam): सर्व-अवस्थां (यहाँ संधि होने से 'सर्वावस्थां' बना है)।
  • गतोऽपि वा (Ga-to-pi Vaa): गतो-अपि वा (अवग्रह 'ऽ' का उच्चारण अत्यंत सूक्ष्म 'अ' के रूप में होता है)।
  • यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं (Yah Sma-ret-pun-da-ree-kaa-ksham): यः स्मरेत्-पुण्डरीकाक्षम्।
  • स बाह्याभ्यन्तरः (Sah Baah-yaabh-yan-ta-rah): स बाह्य-अभ्यन्तरः (बाहरी और भीतरी)।
  • शुचिः (Shu-chih): शु-चिः (विसर्ग का उच्चारण 'हि' की भांति कोमलता से करें)।

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद | Word-by-word Meaning

संस्कृत शब्द पद-विच्छेद सरल हिंदी अर्थ संदर्भगत आध्यात्मिक अर्थ
अपवित्रः अपवित्रः जो अशुद्ध या अपवित्र है शारीरिक, मानसिक या सूतकादि दोषों से युक्त जीव।
पवित्रो पवित्रः जो शुद्ध या पवित्र है सभी प्रकार के विकारों और अशुद्धियों से रहित अवस्था।
वा वा अथवा / या चाहे वह किसी भी स्थिति में हो।
सर्वावस्थां सर्व + अवस्थाम् सभी अवस्थाओं में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति या किसी भी शारीरिक-मानसिक परिस्थिति में।
गतोऽपि गतः + अपि गया हुआ भी / स्थित भी चाहे वह किसी भी परिस्थिति या स्थान पर उपस्थित हो।
यः यः जो कोई भी (साधक) बिना किसी भेदभाव के, स्मरण करने वाला प्रत्येक मनुष्य।
स्मरेत् स्मरेत् स्मरण करता है / ध्यान करता है हृदय से श्रद्धापूर्वक याद करना।
पुण्डरीकाक्षं पुण्डरीक + अक्षम् कमल के समान नेत्रों वाले (भगवान विष्णु) परमेश्वर, जो संपूर्ण जगत के स्वामी और परम पावन हैं।
स सः वह (मनुष्य) स्मरण करने वाला वह विशिष्ट साधक।
बाह्याभ्यन्तरः बाह्य + अभ्यन्तरः बाहर और भीतर से शारीरिक रूप से (बाहर) और मानसिक व वैचारिक रूप से (भीतर)।
शुचिः शुचिः पवित्र / शुद्ध हो जाता है यज्ञोपवीत, देव-पूजन और साधना के सर्वथा योग्य हो जाना।

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

सरल हिंदी अनुवाद: चाहे कोई मनुष्य अपवित्र हो अथवा पवित्र, या जीवन की किसी भी परिस्थिति (अवस्था) में क्यों न हो; जो कोई भी कमल के समान नेत्रों वाले भगवान श्री पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर दोनों ओर से पूर्णतः पवित्र हो जाता है।

विस्तृत भावार्थ: सनातन वैदिक दर्शन में शुचिता (पवित्रता) के दो आयाम स्वीकार किए गए हैं—बाह्य और आंतरिक। बाह्य पवित्रता जल, मिट्टी, स्नान और स्वच्छ वस्त्रों से प्राप्त होती है, जो कि भौतिक शरीर की शुद्धि के लिए आवश्यक है। परंतु आंतरिक पवित्रता, जिसमें मन के विचारों, भावनाओं, बुद्धि और अहंकार का शुद्धिकरण सम्मिलित है, केवल भौतिक साधनों से संभव नहीं है। आंतरिक अशुद्धियों जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष को दूर करने के लिए दिव्य चेतना का आश्रय लेना पड़ता है।

यह मंत्र उद्घोष करता है कि जब हम भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करते हैं, तो उनकी परम पावन ऊर्जा हमारे अंतःकरण में प्रवेश करती है। भगवान विष्णु का एक नाम 'पुण्डरीकाक्ष' है, जिसका अर्थ है कमल-नयन। कमल जिस प्रकार कीचड़ में रहकर भी सर्वथा निर्लिप्त और अत्यंत सुंदर व पवित्र रहता है, उसी प्रकार भगवान विष्णु की शरण में जाने वाला भक्त भी संसार रूपी कीचड़ के दोषों से अछूता रहकर भीतर से निष्पाप और शुद्ध हो जाता है। इसलिए, पूजा के प्रारंभ में इस मंत्र का पाठ कर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कने से संपूर्ण वातावरण दिव्य और पवित्र हो जाता है।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Spiritual Message

इस मंत्र का केंद्रीय आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहन और करुणामयी है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि:

  • ईश्वर की असीम करुणा: भगवान अपने भक्तों को अपनाने के लिए किसी कठिन शारीरिक योग्यता की मांग नहीं करते। चाहे मनुष्य किसी भी परिस्थिति में हो, यदि वह सच्चे हृदय से प्रभु को पुकारता है, तो भगवान उसे तत्काल स्वीकार कर पवित्र कर देते हैं।
  • स्मरण की महिमा: कलयुग में नाम-स्मरण और मानसिक ध्यान को सबसे सुलभ और शक्तिशाली साधन माना गया है। ॐ जय जगदीश हरे आरती में भी प्रभु की इसी सर्वव्यापकता और पावनकारी शक्ति का गान किया गया है।
  • समर्पण का भाव: यह मंत्र साधक के अहंकार को शांत करता है। साधक स्वीकार करता है कि वह स्वयं के प्रयासों से पूर्णतः शुद्ध नहीं हो सकता, उसे पवित्र होने के लिए परमात्मा की शरण की आवश्यकता है।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता | Scriptural Origin

यह मंत्र वैष्णव और वैदिक कर्मकांड पद्धतियों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उल्लेख विभिन्न पुराणों और पूजा-पद्धतियों के ग्रंथों में मिलता है। विशेष रूप से, गरुड़ पुराण, पद्म पुराण और हरिभक्तिविलास में इस मंत्र की महिमा और इसके विनियोग का वर्णन किया गया है।

  • देवता: इस मंत्र के अधिष्ठात्री देव भगवान पुण्डरीकाक्ष (श्री हरि विष्णु) हैं।
  • विनियोग: इसका उपयोग मुख्य रूप से पूजा के आरंभ में 'पवित्रीकरण' और 'आचमन' के समय किया जाता है।
  • छंद: यह मंत्र अनुष्टुप छंद में रचित है, जो कि वेदों और महाकाव्यों का अत्यंत लोकप्रिय और गेय छंद है।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त | Chanting Method, Rules & Vidhi

इस मंत्र का प्रयोग दैनिक पूजा या किसी विशेष अनुष्ठान के प्रारंभ में पवित्रीकरण के लिए किया जाता है। इसकी प्रामाणिक विधि निम्नलिखित है:

  1. आसन ग्रहण करें: सर्वप्रथम स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  2. पात्र में जल लें: अपने सम्मुख एक तांबे या पीतल के पात्र में स्वच्छ गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल रखें।
  3. कुशा या पुष्प का प्रयोग: दाहिने हाथ में कुशा (एक पवित्र घास) अथवा कोई पवित्र पुष्प (जैसे गेंदा या गुलाब) लें और उसे जल में डुबोएं।
  4. मंत्रोच्चारण: एकाग्रचित्त होकर आँखें बंद करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए इस मंत्र का स्पष्ट और मधुर स्वर में उच्चारण करें।
  5. जल का छिड़काव (प्रोक्षण): मंत्र की समाप्ति पर "स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः" कहते हुए उस जल को अपने सिर पर, शरीर पर और पूजा की समस्त सामग्रियों पर छिड़कें।
  6. मानसिक जप: यदि आप यात्रा में हैं या ऐसी स्थिति में हैं जहाँ जल उपलब्ध नहीं है, तो केवल मानसिक रूप से इस मंत्र का जप करने से भी समान फल प्राप्त होता है।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वैदिक दर्शन के अनुसार, मनुष्य का मूल स्वरूप 'सच्चिदानंद' (सत्-चित्-आनंद) है, जो सदैव शुद्ध और बुद्ध है। परंतु माया के प्रभाव और अज्ञानता के कारण जीव स्वयं को कर्ता मान बैठता है, जिससे उसके अंतःकरण पर कर्मों का मैल जम जाता है। यह मंत्र अद्वैत और विशिष्टाद्वैत दोनों दर्शनों के समन्वय को दर्शाता है।

जब हम कहते हैं "सर्वावस्थां गतोऽपि वा" (चाहे किसी भी अवस्था में हो), तो यह इंगित करता है कि आत्मा की मूल पवित्रता कभी नष्ट नहीं होती, वह केवल ढक जाती है। जैसे सूर्य बादलों के पीछे छिप जाता है, वैसे ही हमारी आंतरिक पवित्रता विकारों के पीछे छिप जाती है। भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करते ही ज्ञान रूपी पवन चलती है और अज्ञान के बादल छट जाते हैं, जिससे साधक अपनी वास्तविक शुद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार, यह मंत्र केवल एक कर्मकांडीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ | Spiritual Benefits

नियमित रूप से इस मंत्र का पाठ और स्मरण करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: इस मंत्र के प्रभाव से साधक के आसपास की नकारात्मक शक्तियां और तामसिक ऊर्जाएं दूर भागती हैं।
  • मानसिक शांति: भगवान विष्णु के नाम का स्मरण मन को तुरंत शांत करता है और तनाव व चिंता से मुक्ति दिलाता है।
  • पूजा का पूर्ण फल: अशुद्ध अवस्था में की गई पूजा निष्फल हो सकती है, परंतु इस मंत्र से पवित्र होकर की गई आराधना का अनंत गुना फल प्राप्त होता है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: साधक के भीतर यह विश्वास जागृत होता है कि वह अब भगवान की सुरक्षा और पावन छत्रछाया में है।
  • पापों का शमन: अनजाने में किए गए कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का प्रभाव इस मंत्र के प्रभाव से क्षीण हो जाता है।

मंत्र का दैनिक जीवन में महत्व | Daily Life Relevance

आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जिंदगी में इस मंत्र की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। हम दिनभर में कई ऐसे वातावरण और लोगों के संपर्क में आते हैं, जिससे हमारी मानसिक ऊर्जा प्रभावित होती है।

सुबह घर से निकलते समय या कार्यालय में कार्य प्रारंभ करने से पूर्व, यदि हम केवल एक बार इस मंत्र का स्मरण कर लें, तो हमारा मन सकारात्मक विचारों से भर जाता है। यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि हमारी बाहरी परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, हम अपने भीतर की पवित्रता को ईश्वर के स्मरण द्वारा सदैव सुरक्षित रख सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र एकाग्रता बढ़ाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।

एक नजर में मंत्र की जानकारी | Quick Information Table

विवरण महत्वपूर्ण जानकारी
मंत्र का नाम पवित्रीकरण मंत्र (Pavitrikaran Mantra)
मुख्य देवता भगवान पुण्डरीकाक्ष (श्री हरि विष्णु)
मूल स्रोत वैदिक कर्मकांड पद्धति / पुराण (पद्म पुराण)
छंद अनुष्टुप छंद (Anustup Chhand)
मुख्य उद्देश्य बाह्य और आंतरिक पवित्रता की प्राप्ति
उपयुक्त समय प्रातःकाल, पूजा के प्रारंभ में, संध्यावंदन के समय
साधना सामग्री शुद्ध जल, कुशा या पुष्प, तांबे का पात्र

मुख्य आध्यात्मिक संदेश | Key Takeaways

  • यह मंत्र सनातन धर्म में बाह्य और आंतरिक शुद्धि का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।
  • भगवान विष्णु (पुण्डरीकाक्ष) का स्मरण मात्र ही मनुष्य को सभी पापों और अशुद्धियों से मुक्त कर देता है।
  • पूजा-पाठ की शुरुआत हमेशा इस मंत्र के उच्चारण और जल प्रोक्षण से होनी चाहिए।
  • यह मंत्र सिखाता है कि भक्ति और समर्पण के मार्ग में शारीरिक सीमाओं से अधिक मानसिक भाव का महत्व है।
  • दैनिक जीवन में इसका प्रयोग मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

पवित्रीकरण के साथ-साथ सनातन परंपरा में अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का भी विधान है जो साधक की चेतना को उन्नत करते हैं। आप हमारे संग्रह में श्री कृष्ण स्तोत्र और पार्वती स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं, जो मन को भक्ति रस से सराबोर कर देते हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना के लिए आरती संग्रह का अनुकरण करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

पवित्र करने का मंत्र "अपवित्रः पवित्रो वा..." है। इसका अर्थ है कि चाहे कोई व्यक्ति पवित्र हो या अपवित्र, या किसी भी स्थिति में हो, यदि वह कमल-नयन भगवान विष्णु का स्मरण करता है, तो वह बाहर और भीतर दोनों से शुद्ध हो जाता है।

'पुण्डरीकाक्ष' दो शब्दों से मिलकर बना है—'पुण्डरीक' (सफेद कमल) और 'अक्ष' (नेत्र)। इसका अर्थ है "कमल के समान सुंदर और पावन नेत्रों वाले", जो कि भगवान विष्णु का एक अत्यंत प्रसिद्ध नाम है।

हाँ, इस मंत्र की विशेषता ही यही है कि यह "सर्वावस्थां" (सभी अवस्थाओं) में जपा जा सकता है। यदि आप अस्वस्थता या यात्रा के कारण स्नान नहीं कर पाए हैं, तो भी मानसिक रूप से इस मंत्र का जाप कर स्वयं को पवित्र कर सकते हैं।

दाहिने हाथ में कुशा या पुष्प लेकर उसे शुद्ध जल में डुबोएं। मंत्र का उच्चारण करते हुए उस जल को अपने सिर पर, शरीर पर और पूजा सामग्री पर छिड़कें। इसे 'प्रोक्षण' कहा जाता है।

बाह्य पवित्रता का संबंध शरीर, वस्त्र और स्थान की भौतिक सफाई से है। आंतरिक पवित्रता का संबंध मन की शुद्धि, विचारों की सकारात्मकता और दुर्भावनाओं की समाप्ति से है, जो केवल ईश्वर के ध्यान से प्राप्त होती है।

नियमित पाठ से मानसिक शांति मिलती है, नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है, एकाग्रता बढ़ती है और साधक के भीतर सकारात्मक आध्यात्मिक स्पंदन (Vibrations) का निर्माण होता है।

हाँ, बच्चों को इस मंत्र का अभ्यास अवश्य कराना चाहिए। इससे उनका उच्चारण शुद्ध होता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और उनमें सनातन संस्कारों का बीजारोपण होता है।

नहीं, यह मंत्र संपूर्ण सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए है। चाहे वे शैव हों, शाक्त हों या वैष्णव, सभी प्रकार के अनुष्ठानों में इस मंत्र का समान रूप से प्रयोग किया जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म की समृद्ध पूजा पद्धतियों और वैदिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। मंत्र के प्रत्येक शब्द का अर्थ और उसका आध्यात्मिक विश्लेषण प्रामाणिक स्रोतों के अनुकूल है। (संपादकीय रूप से तैयार सामग्री)

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पद्म पुराण: क्रियायोगसार खंड (पवित्रीकरण प्रसंग)।
  • गरुड़ पुराण: आचार कांड, नित्य कर्म विधि।
  • हरिभक्तिविलास: श्री सनातन गोस्वामी कृत, अर्चन विधि प्रकरण।
  • सनातन वैदिक नित्यकर्म पद्धति, कल्याण कल्पतरु, गीताप्रेस गोरखपुर।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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