hari bhajan

ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में(Na Ram Naam Lino Tene Bhari Jawani Me Lyrics in Hindi)

355 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

भगवान श्री राम के चरणों में समर्पित यह पावन भजन "ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में (Na Ram Naam Lino Tene Bhari Jawani Me Lyrics in Hindi)" सनातन धर्म की उस महान वैराग्य और भक्ति परंपरा का जीवंत स्मरण कराता है, जो मनुष्य को उसकी नश्वरता का बोध कराते हुए भगवद्भक्ति की ओर प्रेरित करता है। जीवन की चकाचौंध, युवावस्था के अहंकार और भौतिकता की दौड़ में इंसान अक्सर परम सत्य को भूल जाता है। यह भजन तीखे किंतु अत्यंत सत्य शब्दों के माध्यम से जीव को जगाने का प्रयास करता है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस और संत कबीर, सूरदास जैसे महापुरुषों की वाणी के मूल सिद्धांतों पर आधारित यह रचना साधक के मन में वैराग्य, भगवत्प्रेम और सच्ची भक्ति का भाव जागृत करती है। इसे प्रातःकालीन सत्संग, संकीर्तन, एकादशी जागरण या भगवत्कथा के दौरान अत्यंत भावपूर्ण स्वर में गाया जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखाड़ा:
ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में,
तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में! (टेक)

ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में,
तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में॥

अंतरा 1:
क्या लायो आटी में मिल जायगो माटी में,
एक दिन काया तेरी मिल जाएगी काठी में।
पानी का बबूला है मिल जायेगो पानी में,
तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में॥

अंतरा 2:
क्यों करता मेरा मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है तेरा,
एक दिन होगा भैया तेरा मरघट में डेरा।
कछु कमाई के लेजा रे ऐसी जिंदगानी में,
तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में॥

अंतरा 3:
कर सच्ची भक्ति है भक्ति में शक्ति है,
या भक्ति से भैया मिल जाएगी मुक्ति है।
तेने बालापन खोयो यो आनाकानी में,
तू डूब के मर जा रे चुल्लू भर पानी में॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन किसी को शारीरिक रूप से आहत करने के लिए नहीं, बल्कि मानव चेतना को झकझोर कर जगाने के लिए एक दार्शनिक व्यंग्य है। भजन के मुखड़े में कहा गया है कि यदि मनुष्य ने अपने जीवन के सबसे ऊर्जावान और सशक्त काल यानी 'भरी जवानी' में भगवान श्री राम के पावन नाम का स्मरण नहीं किया, तो उसका संपूर्ण जीवन व्यर्थ हो गया। 'चुल्लू भर पानी में डूब मरने' की बात यहाँ लोक-लाज और आत्मग्लानी के प्रतीक के रूप में कही गई है, ताकि मनुष्य अपनी भूल पर विचार कर सके।

पहले अंतरे में शरीर की नश्वरता का अत्यंत सुंदर और यथार्थ चित्रण किया गया है। कवि कहता है कि इंसान खाली हाथ दुनिया में आया था और अंत में इस मिट्टी के शरीर को भी माटी में ही मिल जाना है। यह शरीर और कुछ नहीं बल्कि पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है, जो पल भर में नष्ट हो सकता है। दूसरे अंतरे में मनुष्य की मोह-माया और अहंकार पर प्रहार किया गया है। जो व्यक्ति 'यह मेरा है, वह मेरा है' की रट लगाता रहता है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि अंत में उसका ठिकाना श्मशान (मरघट) ही है। इसलिए इस दुर्लभ मानव जीवन में कुछ पुण्य और भगवद्भक्ति की कमाई अवश्य कर लेनी चाहिए।

अंतिम अंतरे में स्पष्ट किया गया है कि सच्ची भक्ति में ही अपार शक्ति है और केवल इसी से आवागमन के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिल सकती है। मनुष्य ने अपना बचपन और जवानी खेलकूद, टालमटोल (आनाकानी) और सांसारिक प्रपंचों में ही गंवा दिए, यदि अब भी वह नहीं संभला तो उसका जीवन निष्फल हो जाएगा।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन भारतीय लोक-संस्कृति, संत परंपरा और वैराग्य रस का एक अद्भुत संगम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • वैराग्य प्रधान संदेश: यह भजन भौतिकवादी सुखों से ऊपर उठकर आत्मचिंतन और भगवदस्मरण की प्रेरणा देता है।
  • तुलसीदास और कबीर की वाणी का प्रभाव: इसमें रामचरितमानस के 'नश्वर शरीर' और 'भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है' के सिद्धांतों की झलक मिलती है।
  • सरल एवं मर्मस्पर्शी भाषा: बोलचाल की ठेठ भाषा और लोक-मुहावरों के प्रयोग से यह सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करता है।
  • नियमित स्मरण: इसे गाने या सुनने से मन का अहंकार और सांसारिक मोह क्षण भर के लिए क्षीण हो जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस प्रकार के वैराग्यपूर्ण और चेतावनी भरे भजनों को गाने और सुनने के लिए कोई विशेष उत्सव की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी इन्हें निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से गाया जाता है:

  • प्रातःकालीन बेला: सुबह उठकर ईश्वर स्मरण के समय आत्मचिंतन के लिए।
  • सत्संग और भजन संध्या: धार्मिक आयोजनों, रात्रिकालीन जागरण और संकीर्तन कार्यक्रमों में।
  • एकादशी एवं पर्व: व्रत और साधना के दिनों में मन को एकाग्र करने हेतु।
  • साधु-संतों की सभाओं में: वैराग्य और भक्ति रस से परिपूर्ण गोष्ठियों में।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को समर्पित है, जिनके नाम स्मरण मात्र से भवसागर तर जाता है। सनातन धर्म में तुलसीदास जी, कबीर दास जी और मीराबाई जैसे संतों ने राम नाम की महिमा का गान किया है। राम नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि तारक मंत्र है जो जीवन और मृत्यु के बंधन को काटने में सक्षम है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भजन (Traditional Folk Bhajan) शैली में रचा गया है, जिसे उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में संत परंपरा के गायकों द्वारा पीढ़ियों से गाया जाता रहा है। इसकी रचना का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को जीवन के अंतिम सत्य (मृत्यु और कर्म) से परिचित कराना और उन्हें सन्मार्ग पर लाना है। इसके कई संस्करण विभिन्न लोक कलाकारों द्वारा गाए जा चुके हैं, जिनमें हरिहरन जी और अन्य प्रतिष्ठित भजन गायकों की शैलियों का भी गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा लोक-हिन्दी (अवधी-ब्रज मिश्रित ठेठ हिंदी) है। इसमें रूपक अलंकार और उपमा का बहुत ही सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे— 'पानी का बबूला है', 'काया माटी में मिलना' आदि। काव्य शैली 'चेतावनी भजन' की है, जो श्रोता को सीधे संबोधित करते हुए उसे उसके कर्तव्यों का बोध कराती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • समय का सदुपयोग: जीवन का हर पल बहुमूल्य है, इसे व्यर्थ की बातों और अहंकार में नहीं गंवाना चाहिए।
  • नश्वरता का बोध: शरीर नाशवान है, केवल सत्कर्म और राम नाम ही शाश्वत हैं।
  • अहंकार का त्याग: 'मेरा-तेरा' का मोह छोड़कर निस्वार्थ भाव से जीवन जीना चाहिए।
  • भक्ति की सर्वोच्चता: मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र सरल मार्ग ईश्वर की सच्ची भक्ति है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
आटी में शुरुआत में / जन्म के समय खाली हाथ दुनिया में आना
काठी में अर्थी में / श्मशान की लकड़ी शरीर का अंतिम संस्कार
पानी का बबूला पानी का बुलबुला जीवन की क्षणभंगुरता
मरघट में डेरा श्मशान में निवास जीवन का अंतिम सत्य (मृत्यु)
आनाकानी टालमटोल करना भक्ति में विलंब करना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में..."
अर्थात हे मनुष्य! तूने अपने जीवन के सबसे सशक्त और ऊर्जावान समय में भगवान श्री राम का स्मरण नहीं किया। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

"क्या लायो आटी में मिल जायगो माटी में..."
अर्थात तू इस संसार में कुछ लेकर नहीं आया था और अंततः तेरी यह काया इसी मिट्टी में मिल जानी है। फिर घमंड किस बात का?

"कर सच्ची भक्ति है भक्ति में शक्ति है..."
अर्थात सभी प्रकार के प्रपंच छोड़कर भगवान की सच्ची शरण में जा, क्योंकि केवल भक्ति में ही इस भवसागर से पार लगाने की शक्ति है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाला सनातन परंपरा का यह प्रसिद्ध श्लोक स्मरण रखने योग्य है:

"अयुर हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तमयंच यः।
वयो युवति वृद्धस्य स्थिरी भूतं न गच्छति॥"

अर्थात: सूर्य का उगना और अस्त होना मनुष्य की आयु को कम करता रहता है। युवावस्था हो या वृद्धावस्था, बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम ना राम नाम लीनो तेने भरी जवानी में
समर्पित देवता भगवान श्री राम
रचना शैली पारंपरिक लोक चेतावनी भजन
भाषा लोक हिंदी / अवधी मिश्रित
मुख्य विषय वैराग्य, राम नाम महिमा, नश्वरता
प्रमुख भाव चेतावनी, आत्मचिंतन और भक्ति
उपयुक्त अवसर सत्संग, जागरण, प्रातः स्मरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह एक पारंपरिक चेतावनी और वैराग्य प्रधान भजन है, जो मनुष्य को जीवन की नश्वरता का बोध कराकर भगवद्भक्ति की प्रेरणा देता है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अहंकार और मोह-माया में अपना जीवन व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए, बल्कि समय रहते भगवान राम का नाम स्मरण कर भक्ति करनी चाहिए।

यह लोक-साहित्य और संत परंपरा का प्रसिद्ध पद है, जो मौखिक और लिखित रूप में उत्तर भारत की भजन परंपरा में पीढ़ियों से गाया जाता रहा है।

यह एक लोक मुहावरा है जिसका उपयोग मनुष्य को उसकी भूल पर आत्मग्लानी का अहसास कराने और उसे चेताने के लिए किया जाता है।

इसे सत्संग, जागरण, प्रातःकालीन स्मरण या एकांत में आत्मचिंतन के समय भावपूर्ण स्वर में गाया जा सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री भक्तिलोक (Bhaktilok) के संपादकीय मंडल द्वारा सनातन धर्म की लोक-साहित्य परंपरा, संत वाणी और वैराग्य दर्शन के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध गीत और उसका आध्यात्मिक भावार्थ प्रदान करना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

  • पारंपरिक लोक-भजन एवं संत वाणी संग्रह
  • रामचरितमानस - गोस्वामी तुलसीदास
  • भारतीय लोक-साहित्य और वैराग्य दर्शन

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!