Parvati Stotram

कन्हैया झूले पलना नेक हौले झोटा(kanhaiya jhule palna lyrics in Hindi) - Bhaktilok

122 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की लीलाओं का गान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। "कन्हैया झूले पलना नेक हौले झोटा" (Kanhaiya Jhule Palna) एक ऐसा ही अत्यंत लोकप्रिय और वात्सल्य रस से परिपूर्ण पारंपरिक भजन है, जो मुख्य रूप से श्री कृष्ण जन्माष्टमी, नंदोत्सव और विभिन्न मांगलिक अवसरों पर गाया जाता है। इस भजन में माता यशोदा के हृदय के अगाध वात्सल्य और ब्रज की गोपियों के निश्छल प्रेम का सजीव चित्रण मिलता है। जब हम इस भजन का श्रवण या गायन करते हैं, तो हमारा अंतर्मन सीधे द्वापर युग की पावन ब्रजभूमि में पहुँच जाता है, जहाँ साक्षात परब्रह्म परमात्मा एक नन्हे शिशु के रूप में पालने में झूल रहे हैं। यह भजन साधक के भीतर छिपे हुए वात्सल्य भाव को जाग्रत कर उसे ईश्वर के अत्यंत निकट ले जाने का एक सुगम माध्यम है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कन्हैया झूले पलना नेक हौले झोटा दीजो


कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।
नेक हौले झोटा दीजो, हाँ हौले झोटा दीजो॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

पलना है रतन जड़ित को, रेशम की लागी डोरी।
झुलावे जसोदा मैया, गावें सखियाँ सब जोरी॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

चंदा सो मुखड़ा चमके, घुंघराले बाल सोहें।
नैनन में कजरा सोहे, मनमोहन सबको मोहें॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

बाजत पैंजनिया पग में, ठुमकत-ठुमकत चाल।
किलकारी मारत हँसते, यशोदा के लाल॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

नंद बाबा मोद मनावें, बांटे बहु द्रव्य और दान।
सुर-नर-मुनि दर्शन आवें, गावें सब यशगान॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

तन सोहे पीत झँगा, गल वैजयंती माल।
न्योछावर करती मैया, वारि-वारि जाए गोपाल॥
कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह पावन भजन भगवान श्री कृष्ण के बाल्यकाल की उस अनुपम लीला को समर्पित है, जिसमें वे माता यशोदा के आँगन में सजे रत्नजड़ित पालने में झूल रहे हैं। इस भजन का मूल भाव "वात्सल्य भक्ति" है, जहाँ भक्त स्वयं को माता यशोदा या ब्रज की गोपियों के स्थान पर रखकर भगवान को दुलारता है।

भजन की शुरुआत में कहा गया है कि "कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो"। इसका अर्थ है कि हमारे प्यारे कन्हैया पालने में झूल रहे हैं, इसलिए हे सखी! पालने को बहुत ही धीरे से और प्यार से झूला (झोटा) देना, ताकि हमारे सुकुमार लला को कोई कष्ट न हो और वे सुखपूर्वक सो सकें या आनंद ले सकें। यह पंक्ति भक्त की अत्यंत संवेदनशीलता और भगवान के प्रति अगाध स्नेह को दर्शाती है।

आगे की पंक्तियों में पालने की सुंदरता का वर्णन है, जो हीरों और मोतियों से जड़ा हुआ है और जिसमें रेशम की कोमल डोरियाँ बंधी हैं। माता यशोदा स्वयं उस पालने को झुला रही हैं और ब्रज की गोपियाँ समूह में मंगल गीत गा रही हैं। कन्हैया का मुख मंडल पूर्णिमा के चंद्रमा के समान चमक रहा है, उनके नैनों में काजल लगा है और घुंघराले बाल उनके कपोलों पर क्रीड़ा कर रहे हैं। यह रूप इतना मनमोहक है कि जो भी इसे देखता है, वह सुध-बुध खो बैठता है। इस प्रकार, यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह ध्यान की एक उच्च अवस्था है जहाँ साधक भगवान के सगुण रूप का मानसिक दर्शन करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • वात्सल्य रस की पराकाष्ठा: यह भजन अष्टछाप के कवियों की परंपरा के अनुरूप वात्सल्य भाव को जाग्रत करता है। इसमें भगवान को ऐश्वर्य रूप में नहीं, बल्कि एक आश्रित शिशु के रूप में देखा गया है।
  • मानसिक शांति का साधन: इस भजन के मधुर स्वर और लयबद्ध शब्द अशांत मन को तुरंत शांत करते हैं और हृदय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
  • सामूहिक संकीर्तन का महत्व: "गावें सखियाँ सब जोरी" पंक्ति दर्शाती है कि सामूहिक रूप से किया गया कीर्तन भगवान को अत्यंत प्रिय है।
  • शरणागति का संदेश: जब हम भगवान को पालने में झुलाते हैं, तो हम अनजाने में ही अपने अहंकार को उनके चरणों में समर्पित कर देते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के नाम और लीला का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों एवं लोक परंपराओं में बताई गई हैं:

  • सर्वोत्तम अवसर: यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आधी रात को भगवान के जन्म के पश्चात गाया जाता है। इसके अतिरिक्त नंदोत्सव और घर में शिशु के जन्म या मुंडन संस्कार के समय भी इसका गायन अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय हाथ में छोटी घंटी या मंजीरा लेकर अत्यंत मधुर और शांत स्वर में गाना चाहिए। मन में यह भाव होना चाहिए कि साक्षात बाल कृष्ण आपके सम्मुख पालने में विराजमान हैं।
  • मानसिक सेवा: गायन के दौरान भगवान को धीरे-धीरे झूला झुलाने का मानसिक अभिनय (मानस पूजा) करना चाहिए। इससे ध्यान की गहराई बढ़ती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के आठवें अवतार, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल) को समर्पित है। ब्रज की रसिया परंपरा और अष्टछाप के महान संतों जैसे सूरदास, नंददास और रसखान की रचनाओं में इस प्रकार के पदों की प्रचुरता मिलती है। यद्यपि यह एक पारंपरिक लोक भजन है, परंतु इसकी आत्मा पूरी तरह से पुष्टि मार्ग और वैष्णव भक्ति संप्रदाय से जुड़ी हुई है। माता यशोदा और नंद बाबा इस लीला के मुख्य मानवीय पात्र हैं, जो वात्सल्य भक्ति के सर्वोच्च आदर्श हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि द्वापर युग के गोकुल और नंदगाँव से जुड़ी है। जब कंस के कारागार से निकलकर वासुदेव जी ने नन्हे कृष्ण को नंद बाबा के घर पहुँचाया, तो अगले दिन पूरे ब्रज में आनंद की लहर दौड़ गई। इसी आनंदोत्सव को "नंदोत्सव" कहा जाता है। माता यशोदा ने अपने लाला के लिए एक सुंदर रत्नजड़ित पालना तैयार करवाया था। ब्रज की गोपियाँ और देवलोक से आए देवी-देवता कन्हैया को पालने में झूलते देखने के लिए लालायित थे। इसी अलौकिक दृश्य को अमर बनाने के लिए ब्रज के लोक कवियों ने इस अत्यंत मधुर पद की रचना की, जो आज भी हर हिंदू घर में गूंजता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है, जो अपनी मधुरता और कोमलता के लिए जानी जाती है। ब्रजभाषा में "लला", "पलना", "झोटा", "जसोदा" जैसे शब्दों का प्रयोग हृदय को सीधे स्पर्श करता है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक "पद" है जिसे राग बिलावल या राग पीलू में अत्यंत सुंदरता से गाया जा सकता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर समावेश है, जैसे "चंदा सो मुखड़ा" में उपमा अलंकार का प्रयोग भगवान के मुख की अलौकिकता को दर्शाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल भक्ति रस में सराबोर नहीं करता, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश भी देता है:

  1. सरलता और निश्छलता: भगवान को पाने के लिए किसी कठिन साधना की नहीं, बल्कि यशोदा मैया जैसी सरल और निश्छल ममता की आवश्यकता होती है।
  2. धैर्य का महत्व: "हौले झोटा दीजो" हमें सिखाता है कि जीवन में किसी भी कार्य को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि अत्यंत धैर्य और कोमलता के साथ करना चाहिए।
  3. आनंद का उत्सव मनाना: नंद बाबा द्वारा दान देने का प्रसंग सिखाता है कि जब भी जीवन में ईश्वर की कृपा से कोई शुभ अवसर आए, तो उसे समाज के साथ बांटना चाहिए और दान-पुण्य करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
नेक थोड़ा सा / जरा सा भक्त की अत्यंत विनम्र प्रार्थना
हौले धीरे से / कोमलता से भगवान के प्रति अत्यंत संवेदनशीलता
झोटा पालने का झोंका लीला का आनंद लेने की क्रिया
रतन जड़ित हीरे-मोतियों से जड़ा हुआ हृदय रूपी मंदिर की बहुमूल्य श्रद्धा
पैंजनिया पैरों में पहनने वाले घुंघरू नाद ब्रह्म का प्रतीक
पीत झँगा पीला कुर्ता / वस्त्र ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति 1: "कन्हैया झूले पलना, नेक हौले झोटा दीजो।"
भावार्थ: हमारे प्यारे कन्हैया पालने में आनंदपूर्वक झूल रहे हैं। हे सखियों, इस पालने को बहुत ही धीरे से झूला देना ताकि कन्हैया की तंद्रा भंग न हो।

पंक्ति 2: "पलना है रतन जड़ित को, रेशम की लागी डोरी।"
भावार्थ: वह पालना साधारण नहीं है, वह सोने और बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ है और उसे हिलाने के लिए रेशम की अत्यंत कोमल डोरी बंधी हुई है। यह भक्त के हृदय की अमूल्य श्रद्धा को दर्शाता है।

पंक्ति 3: "झुलावे जसोदा मैया, गावें सखियाँ सब जोरी।"
भावार्थ: साक्षात जगत जननी स्वरूपा माता यशोदा स्वयं पालने की डोरी थामे हुए हैं और ब्रज की गोपियाँ जोड़ियाँ बनाकर मंगल बधाई गीत गा रही हैं।

पंक्ति 4: "चंदा सो मुखड़ा चमके, घुंघराले बाल सोहें।"
भावार्थ: कन्हैया का मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान दैदीप्यमान है और उनके मस्तक पर लटकते घुंघराले बाल उनकी सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप के इस प्रसिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

अथवा बालमुकुंद अष्टकम का यह श्लोक स्मरण करें:

करारविंदेन पदारविंदं मुखारविंदे विनिवेशयंतम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुंदं मनसा स्मरामि॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम कन्हैया झूले पलना नेक हौले झोटा दीजो
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण (बाल स्वरूप / लड्डू गोपाल)
काव्य विधा पारंपरिक लोक भजन / पद
मुख्य रस वात्सल्य रस (Maternal Love)
भाषा ब्रजभाषा (Brajbhasha)
गायन का मुख्य अवसर श्री कृष्ण जन्माष्टमी, नंदोत्सव, मुंडन, गृह प्रवेश
संबंधित भजन यशोमति मैया से बोले नंदलाला

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि को भगवान के प्राकट्य के बाद और अगले दिन नंदोत्सव के अवसर पर गाया जाता है। इसके अलावा घरों में बच्चों के जन्मोत्सव पर भी इसे गाने की परंपरा है।

"नेक हौले झोटा दीजो" का अर्थ है कि "पालने को बहुत ही धीरे से और कोमलता से झूला झुलाना"। यह पंक्ति भगवान के प्रति भक्त के अत्यंत कोमल और सुरक्षात्मक भाव को प्रदर्शित करती है।

इस भजन की मूल भाषा ब्रजभाषा है, जो भगवान श्री कृष्ण की लीला भूमि ब्रज क्षेत्र की मुख्य भाषा है और अपनी अत्यधिक मधुरता के लिए प्रसिद्ध है।

हाँ, यदि आपके घर में लड्डू गोपाल (बाल कृष्ण) विराजमान हैं, तो आप उन्हें प्रतिदिन संध्या आरती के समय या शयन कराते समय इस भजन को गाकर झूला झुला सकते हैं।

इस भजन के नियमित श्रवण और गायन से मानसिक तनाव दूर होता है, हृदय में वात्सल्य और प्रेम का संचार होता है तथा घर का वातावरण अत्यंत पवित्र और आनंदमय बनता है।

इस भजन में पूर्ण रूप से "वात्सल्य रस" की प्रधानता है, जो माता और पुत्र के बीच के अलौकिक और निश्छल प्रेम को दर्शाता है।

पारंपरिक रूप से इसे राग पीलू या राग बिलावल के स्वरों में गाया जाता है, जो सुबह और दोपहर के समय गाए जाने वाले अत्यंत मधुर राग हैं।

इसके साथ आप अच्युतम केशवम कृष्ण दामोदरम या यशोदा हरि पालने झुलावे जैसे प्रसिद्ध बाल लीला पदों का गायन कर सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, ब्रज लोक साहित्य और संकीर्तन परंपराओं के गहन अध्ययन के पश्चात यहाँ प्रस्तुत किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - बाल लीला प्रसंग)
  • अष्टछाप कवि संकलन एवं ब्रज लोकगीत संग्रह
  • कल्याण (श्रीकृष्ण अंक) - गीताप्रेस गोरखपुर

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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