कहत सुनत सब दिन गए उरझी न सुरझ्या मन दोहे का अर्थ (Kahat Sunat Sab Din Gaye Urajhi Na Surjhya Man Kahi Dohe Ka Arth in Hindi)
प्रकाशित तिथि: 2026 | विषय: संत कबीर दास के दोहे, आध्यात्मिक ज्ञान, मोह-माया मुक्ति और आत्म-चिंतन
संत कबीर दास जी की वाणी केवल शब्द मात्र नहीं हैं, बल्कि यह मानव जीवन के उस परम सत्य का दर्पण हैं जिसे हम सांसारिक प्रपंचों में उलझकर भूल चुके हैं। प्रस्तुत दोहा "कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन। कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥" भारतीय संत परंपरा और निर्गुण काव्यधारा का एक अत्यंत ही मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाला आध्यात्मिक संदेश है। इस दोहे के माध्यम से कबीर साहिब ने मनुष्य को उसकी अमूल्य आयु की नश्वरता, व्यर्थ की वाचालता और आत्म-साक्षात्कार के अभाव के प्रति सचेत किया है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन दोहे के शब्दार्थ, गूढ़ भावार्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि और दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
मूल दोहा / साखी | Original Text
कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥
यह साखी संत कबीर ग्रन्थवली तथा कबीर बीजक के अंतर्गत साखी ग्रंथ के विभिन्न अंगों से संकलित है। इसकी भाषा सदभाषा या संत-भाषा है जिसमें राजस्थानी, ब्रज, अवधी और पूर्वी हिंदी के शब्दों का सहज एवं प्रभावशाली समन्वय देखने को मिलता है।
उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure
कबीर दास जी के दोहे दो पंक्तियों (चरणों) के होते हैं, जिसमें अर्धसम मात्रिक छंद की विशिष्ट लय होती है। इसका पाठ करते समय शब्दों के आरोह-अवरोह पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि अंतर्मन तक इसका भाव उतर सके।
- प्रथम चरण: कहत सुनत सब दिन गए (अर्थात कहने और सुनने में ही संपूर्ण आयु बीत गई)।
- द्वितीय चरण: उरझी न सुरझ्या मन (अर्थात संसार के विकारों में उलझा हुआ मन कभी सुलझ नहीं पाया)।
- तृतीय चरण: कहि कबीर चेत्या नहीं (कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य ने फिर भी कभी चेतकर प्रभु का स्मरण नहीं किया)।
- चतुर्थ चरण: अजहूँ सो पहला दिन (आज भी स्थिति वैसी ही है जैसी जीवन के पहले दिन थी, अर्थात अज्ञान का आवरण ज्यों का त्यों बना हुआ है)।
कठिन शब्दार्थ | Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ एवं भावार्थ |
|---|---|---|
| कहत सुनत | कहना और सुनना | शास्त्र चर्चा, वाद-विवाद, कथा-कहानियां सुनने और व्यर्थ की बातचीत करने में समय बिताना। |
| सब दिन गए | सारे दिन/आयु बीत गई | जीवन का अधिकांश समय या पूरी आयु व्यर्थ के कार्यों में नष्ट हो गई। |
| उरझी | उलझना / फंसना | माया, मोह, वासना और सांसारिक प्रपंचों के चक्रव्यूह में मन का उलझ जाना। |
| सुरझ्या | सुलझना / मुक्त होना | विवेक और ज्ञान के द्वारा मन की ग्रंथियों का खुलना तथा परमात्मा में लीन होना। |
| कहि कबीर | कबीर दास जी कहते हैं | संत कबीर का चेतावनी भरा उपदेश। |
| चेत्या नहीं | चेतना नहीं / सचेत नहीं हुआ | आत्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया, सोये रहना। |
| अजहूँ | आज भी / अब भी | वर्तमान समय या वर्तमान स्थिति का बोध। |
| पहला दिन | जीवन का आरंभिक दिन या अज्ञानी अवस्था | आज भी मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से वहीं खड़ा है जहाँ वह जन्म के समय या अज्ञानतावस्था में था। |
पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation
कबीर साहिब की यह साखी गहराई से अध्ययन करने योग्य है। आइए इसके प्रत्येक चरण का विश्लेषण करते हैं:
"कहत सुनत सब दिन गए..."
मानव जीवन बहुत दुर्लभ है, परंतु मनुष्य अपनी अधिकांश आयु केवल दूसरों की बातें सुनने, कथाएं सुनने, अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने या सांसारिक चर्चाओं में ही गंवा देता है। वह वास्तविक साधना या आत्म-चिंतन के लिए समय नहीं निकाल पाता।
"...उरझी न सुरझ्या मन।"
संसार के सुख-भोग, राग-द्वेष, ईर्ष्या और मोह की वासनाओं में यह मन ऐसा उलझा कि कभी सुलझने का नाम ही नहीं लिया। जैसे उलझा हुआ धागा और अधिक कस जाता है, वैसे ही मन की उलझनें उम्र बढ़ने के साथ और जटिल होती गईं।
"कहि कबीर चेत्या नहीं..."
संत कबीर चेतावनी देते हैं कि जीवन का इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी मनुष्य ने अपनी इस मूर्खता और अज्ञानता पर विचार नहीं किया। उसने यह कभी नहीं सोचा कि वह किस उद्देश्य से इस पृथ्वी पर आया था।
"...अजहूँ सो पहला दिन।"
परिणाम यह है कि आज भी स्थिति वैसी ही है जैसी जीवन के पहले दिन थी। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के मार्ग पर मनुष्य ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया; उसका आध्यात्मिक खाता शून्य का शून्य ही रहा।
सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth
संत कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से मानव समाज को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी की ओर इंगित करते हैं। मनुष्य जीवन भर केवल यही कहता और सुनता रहता है—"यह मेरा है, यह तेरा है, समाज ऐसा है, दुनिया ऐसी है।" इसी प्रकार वाद-विवाद, ईर्ष्या-द्वेष और सांसारिक दुखों की चर्चा में उसकी पूरी आयु बीत जाती है। जिस मन को परमात्मा के ध्यान में लगकर शांत और सुलझा हुआ होना चाहिए था, वह माया के चक्रव्यूह में ऐसा उलझता चला गया कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी उसकी उलझनें कम नहीं हुईं।
कबीर साहिब कहते हैं कि मनुष्य ने जीवन भर कभी अपनी आत्मा की सुधि नहीं ली, कभी यह नहीं चेता कि मृत्यु समीप आ रही है। यदि आज भी आत्मविश्लेषण किया जाए, तो मनुष्य की स्थिति वैसी ही अज्ञानी बनी हुई है जैसी उसके बचपन या जीवन के प्रथम दिन थी। उसने शास्त्रों को पढ़ा, वक्ता बना, उपदेश दिए, परंतु अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया।
यह भावार्थ हमें श्री हनुमान चालीसा के पाठ और शिव तांडव स्तोत्र जैसी पवित्र साधनाओं के मर्म से भी जुड़ने की प्रेरणा देता है, जहाँ बाह्य कर्मकांड से अधिक आंतरिक शुद्धि और प्रभु के प्रति अनन्य समर्पण को सर्वोपरि माना गया है।
मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme
- आयु की नश्वरता: समय बहुत तीव्र गति से बीत रहा है, और व्यर्थ की बातों में जीवन गंवाना सबसे बड़ी मूर्खता है।
- मन की उलझनें: सांसारिक मोह-माया और वासनाएं मन को उलझाकर रखती हैं, जिससे आंतरिक शांति छिन जाती है।
- आत्म-चेतना का अभाव: मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म और आत्मा के मिलन) को भुलाकर भौतिकता में लीन है।
- तत्काल जागृति का संदेश: अभी भी समय है, मोह की निद्रा से जागकर हरिभजन में मन लगाएं।
आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message
भारतीय वेदांत दर्शन और निर्गुण भक्ति परंपरा में मन को ही बंधन और मोक्ष दोनों का कारण माना गया है। जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है—*“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”*। कबीर दास जी का यह दोहा इसी दार्शनिक सत्य का लोकभाषा में प्रस्तुतिकरण है। जब तक मनुष्य का मन सांसारिक कामनाओं, अहंकार और वासनाओं में उलझा रहता है, तब तक लाख उपाय करने पर भी उसे आत्मानुभूति नहीं हो सकती।
कबीर साहिब साधक को यह याद दिलाते हैं कि सत्संग, कथा और चर्चा का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब वह आचरण में उतरे और मन की ग्रंथियों (ग्रंथि = अज्ञान का आवरण) को खोले। यदि व्यक्ति केवल किताबी ज्ञान या वाचालता में उलझा रहे और उसका अहंकार न मिटे, तो उसकी सारी साधना व्यर्थ है।
भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition
संत कबीर दास जी ने भक्ति मार्ग की उन विसंगतियों पर कड़ा प्रहार किया जहाँ लोग दिखावे की भक्ति या केवल शास्त्रार्थ में उलझे रहते थे। भक्ति परंपरा में कबीर साहब की साखियां साधकों के लिए दिशा-निर्देश का काम करती हैं। यह भजन और दोहे साधक के अंतर्मन को झकझोर कर उसे अहंकार और पाखंड से मुक्त कराते हैं तथा सच्चे प्रेम और सहज साधना की ओर मोड़ते हैं।
दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons
विद्यार्थियों एवं युवाओं के लिए
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में युवा सोशल मीडिया, व्यर्थ की चर्चाओं और क्षणिक आकर्षणों में अपना बहुमूल्य समय गंवा देते हैं। कबीर का यह दोहा समय के सदुपयोग और लक्ष्य पर केंद्रित रहने की प्रेरणा देता है।
पारिवारिक एवं व्यावसायिक जीवन
परिवार और कार्यक्षेत्र की जिम्मेदारियों को निभाते हुए व्यक्ति अक्सर तनाव और मानसिक उलझनों में फंस जाता है। यह दोहा सिखाता है कि कर्तव्यों का पालन करें, परंतु मन को सांसारिक विकारों में उलझने न दें।
प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis
कबीर दास जी की काव्य शैली अत्यंत सहज, सरल, किंतु मर्मभेदी है। उन्होंने रूपकों और प्रतीकों का अद्भुत प्रयोग किया है:
- कहत सुनत: वाचालता और बाह्य कर्मकांड का प्रतीक।
- उरझना और सुरझना: मन की जटिलता (माया) और उसकी मुक्ति (ज्ञान) का रूपक।
- पहला दिन: जन्मकालीन अज्ञानता या साधनाहीन अवस्था का सटीक प्रतीक।
दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons
- समय बहुत अनमोल है, इसे व्यर्थ की बहस और गपशप में नष्ट न करें।
- अपने मन की वृत्तियों को पहचानें और उन्हें बुरे विचारों से मुक्त करें।
- केवल किताबी ज्ञान या उपदेश देने से मुक्ति नहीं मिलती, आचरण शुद्ध होना चाहिए।
- अहंकार का त्याग करके निरंतर ईश्वर का स्मरण और आत्म-चिंतन करें।
- कल कभी नहीं आता, जो करना है आज और अभी से शुरू करें।
एक नजर में | Quick Summary
| रचना | संत कबीर दास के दोहे / साखी |
|---|---|
| रचनाकार | संत कबीर दास जी |
| भाषा | सदभाषा / संत-भाषा (राजस्थानी, पूर्वी हिंदी, ब्रज मिश्रित) |
| परंपरा | निर्गुण भक्ति धारा / संत काव्य |
| मुख्य विषय | समय का सदुपयोग, मन की उलझन, आत्म-चेतना और वैराग्य |
| मुख्य संदेश | व्यर्थ की बातों में जीवन न गंवाएं, मन को सुलझाकर प्रभु भक्ति में लगाएं। |
| प्रमुख ग्रंथ | कबीर बीजक / कबीर ग्रन्थवली |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "कहत सुनत सब दिन गए" दोहे के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस पावन दोहे के रचयिता महान संत और समाज सुधारक संत कबीर दास जी हैं।
प्रश्न 2: इस दोहे का मुख्य केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर: इस दोहे का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य अपनी पूरी आयु व्यर्थ की बातों और सांसारिक उलझनों में गंवा देता है तथा अपने मन को प्रभु भक्ति की ओर नहीं मोड़ पाता है।
प्रश्न 3: 'उरझी न सुरझ्या मन' का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि मनुष्य का मन माया, मोह और विकारों के जाल में ऐसा उलझा कि जीवन भर प्रयास करने के बावजूद वह कभी सुलझ नहीं पाया।
प्रश्न 4: 'अजहूँ सो पहला दिन' पंक्ति से कबीर दास क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर: इसके माध्यम से कबीर जी यह कहना चाहते हैं कि जीवन का लंबा समय बीत जाने के बाद भी आध्यात्मिक प्रगति की दृष्टि से मनुष्य वहीं खड़ा है जहाँ वह जन्म के समय या अज्ञानता के पहले दिन था।
प्रश्न 5: कबीर दास के दोहे किस भाषा में रचित हैं?
उत्तर: कबीर दास जी के दोहे सदभाषा या संत-भाषा में रचित हैं, जिसमें हिंदी की विभिन्न बोलियों जैसे ब्रज, अवधी, राजस्थानी और भोजपुरी के शब्द सम्मिलित हैं।
प्रश्न 6: क्या यह दोहा आज के समय में भी प्रासंगिक है?
उत्तर: हाँ, आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे युग में जहाँ लोग इंटरनेट और भौतिक सुखों में उलझकर अपनी आंतरिक शांति खो बैठे हैं, यह दोहा अत्यधिक प्रासंगिक है।
प्रश्न 7: कबीर वाणी का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ना चाहिए?
उत्तर: कबीर वाणी हमें आत्म-चिंतन करने, अहंकार त्यागने और अपने समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देती है।
प्रश्न 8: इस दोहे को किस ग्रंथ से लिया गया है?
उत्तर: यह साखी कबीर बीजक और कबीर ग्रन्थवली के साखी अंग से संकलित है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संत कबीर दास की वाणी, प्रामाणिक साखी संग्रह, और भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के गहन अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की सहज बोधगम्यता और उच्च कोटि के साहित्यिक मानकों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- कबीर बीजक - संपादक: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी / डॉ. धर्मवीर
- कबीर ग्रन्थवली - श्यामसुंदर दास
- भारतीय संत साहित्य और दर्शन - गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन
- श्रीमद्भगवद्गीता - शांकर भाष्य
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