Parvati Stotram

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा तुर्क कहें रहमाना दोहे का अर्थ(Hindu Kahe Mohi Ram Piyara Turk Kahe Rahmana Dohe Ka Arth in Hindi) - Bhaktilok

73 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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हिन्दू कहें मोहि राम पियारा तुर्क कहें रहमाना दोहे का अर्थ - Bhaktilok

भक्ति आंदोलन के स्वर्ण युग में जब संतों ने समाज को पाखंड, संकीर्णता और धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठाने का बीड़ा उठाया, तब संत कबीर दास जी जैसे महान विचारकों ने अपनी साखियों और दोहों के माध्यम से समाज की आँखें खोलने का कार्य किया। प्रस्तुत दोहा "हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना" भारतीय संत साहित्य की उस अमूल्य धरोहर का हिस्सा है, जो मनुष्य को जाति, धर्म और संप्रदाय की सीमाओं से परे हटकर आत्मज्ञान और परम सत्य की ओर ले जाता है। यह दोहा केवल दो धर्मों के बीच की वैचारिक खींचतान का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस शाश्वत सत्य को उजागर करता है जहाँ राम और रहीम में कोई भेद नहीं रह जाता। भक्तिलोक के इस विस्तृत आलेख में हम इस महान दोहे के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, संतों की वाणी के मर्म और वर्तमान युग में इसकी प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण करेंगे।

मूल दोहा / साखी

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना

संत कबीर दास जी की यह साखी सन्त-भाषा या सधुक्कड़ी भाषा में रचित है, जिसमें ब्रज, अवधी, राजस्थानी और फारसी के शब्दों का सहज मिश्रण मिलता है। इसका पाठ करते समय शब्दों के सही उच्चारण और आंतरिक भाव (भक्ति, वैराग्य और समभाव) का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'मरम' शब्द का अर्थ रहस्य या मर्म होता है, जिसे केवल अंतःकरण की शुद्धि और सच्चे गुरु के मार्गदर्शन से ही समझा जा सकता है। इस रचना की लयबद्धता इसे कंठस्थ करने और सत्संग में स्मरण करने के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।

कठिन शब्दार्थ

शब्द सरल हिंदी अर्थ संदर्भित प्रसंग
तुर्क मुसलमान / इस्लाम अनुयायी मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त शब्द
पियारा प्रिय, आराध्य, प्रियतम ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत अनुराग
रहमाना रहीम, अल्लाह, दयालु प्रभु इस्लाम धर्म में ईश्वर का बोध
दोउ दोनों पक्ष हिन्दू और मुस्लिम समुदाय
मुए नष्ट हो गए, व्यर्थ में प्राण गंवा दिए अहंकार और द्वेष में जीवन व्यर्थ करना
मरम रहस्य, मूल भेद, परम सत्य ईश्वर का वास्तविक स्वरूप
कोउ कोई भी अज्ञानी मनुष्य

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

पंक्ति 1: हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
इस पंक्ति का अर्थ है कि इस संसार में हिन्दू संप्रदाय के लोग यह दावा करते हैं कि उन्हें अपने आराध्य 'राम' सबसे अधिक प्रिय हैं, जो अयोध्या के राजा और दशरथनंदन हैं। वहीं दूसरी ओर, तुर्क (मुस्लिम) समुदाय के लोग यह कहते हैं कि उन्हें अपने खुदा या 'रहमान' (दयालु ईश्वर) से अगाध प्रेम है। दोनों अपने-अपने आराध्य को सर्वोच्च बताते हैं।

पंक्ति 2: आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना॥
इस पंक्ति का गहरा अर्थ यह है कि अपने-अपने धर्म, नाम और बाह्य आचार-विचार की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के चक्कर में दोनों पक्ष आपस में लड़-झगड़कर नष्ट हो गए (अहंकार की भेंट चढ़ गए)। परंतु, आज तक उनमें से कोई भी ईश्वर के वास्तविक 'मरम' (रहस्य या मूल स्वरूप) को नहीं जान पाया कि घट-घट में वास करने वाला परमात्मा एक ही है।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

संत कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य की विडंबना यह है कि वह ईश्वर के निर्गुण और निराकार स्वरूप को भूलकर केवल नामों और रूपों के पाखंड में उलझ गया है। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ईश्वर को पाने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनके बीच का अहंकार और संकीर्णता उन्हें वास्तविक प्रेम से दूर कर देती है। हिन्दू अपने राम को और मुसलमान अपने रहमान को लेकर व्यर्थ के वाद-विवाद और संघर्ष में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं।

कबीर साहब यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि राम और रहीम, गॉड और अल्लाह, वाहेगुरु और जीवेषु—ये सब एक ही परम ब्रह्म के अलग-अलग नाम हैं। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सब पर समान रूप से पड़ता है, उसी प्रकार चेतना का स्रोत एक ही है। जो व्यक्ति नाम के भेद में उलझकर मनुष्यता को भूल जाता है, वह धर्म के मर्म को कभी नहीं समझ पाता। सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और आत्मबोध सिखाता है, न कि विद्वेष और संघर्ष। इस प्रकार, यह दोहा सार्वभौमिक भाईचारे और अद्वैत वेदांत के उस संदेश की पुष्टि करता है जो समस्त सृष्टी में एक ही चेतना का अनुभव कराता है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार

इस साखी का केंद्रीय विचार साम्प्रदायिक सद्भाव, धार्मिक सहिष्णुता और ईश्वर की एकता (अद्वैत) है। कबीर दास जी ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि ईश्वर एक है और उसे पाने के मार्ग अनेक हो सकते हैं, किंतु घृणा और अहंकार से कभी परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। भक्ति की राह में जाति, पंथ और मजहब की दीवारें मनुष्य द्वारा खुद खड़ी की गई हैं, जिन्हें प्रेम और ज्ञान के हथौड़े से ही तोड़ा जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए आप राम भजन संग्रह और आरती संग्रह के पावन पृष्ठों का अवलोकन कर सकते हैं।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह दोहा जीव और ब्रह्म के उस अद्वैत संबंध को उजागर करता है जहाँ सारे भेद मिट जाते हैं। उपनिषदों का महावाक्य 'अयमात्मा ब्रह्म' और 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इसी बात की पुष्टि करता है कि जो तत्व एक हिन्दू के भीतर है, वही एक मुसलमान और संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान है। जब तक मनुष्य अज्ञान (माया) के आवरण में बंधा रहता है, तब तक वह नाम-रूप के जाल में उलझकर लड़ता रहता है। जिस दिन उसे भीतर के चैतन्य का बोध हो जाता है, उस दिन सारे भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह संदेश हमें पार्वती स्तोत्र और अन्य धार्मिक ग्रंथों की मूल भावना से भी जोड़ता है, जो समग्र कल्याण की कामना करते हैं.

भक्ति परंपरा में महत्व

संत कबीर, गुरु नानक देव, संत रैदास और दादू दयाल जैसे निर्गुण संत कवियों ने भक्ति परंपरा को रूढ़ियों से मुक्त कराने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनकी वाणी ने समाज के शोषित और विभाजित वर्ग को यह विश्वास दिलाया कि भगवान किसी विशेष जाति या मजहब की बपौती नहीं हैं, बल्कि वे तो केवल प्रेम और समर्पण के भूखे हैं। यह दोहा आज भी संत वाणी के रूप में करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आधुनिक युग में जहाँ आज भी जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर वैमनस्य और संघर्ष की खबरें सामने आती हैं, कबीर दास जी का यह दोहा अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें सिखाता है कि:
1. हमें किसी भी धर्म या संप्रदाय के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए।
2. वैचारिक भिन्नता का सम्मान करते हुए मानवता को सर्वोपरि मानना चाहिए।
3. बाहरी आडंबरों और पाखंडों से ऊपर उठकर आंतरिक शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
4. समाज में प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश फैलाना चाहिए।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली

कबीर की भाषा सीधी, दो टूक और चोट करने वाली होती है। 'राम' और 'रहमान' यहाँ क्रमशः हिन्दू और इस्लामिक धार्मिक परंपराओं के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। 'लड़ी-लड़ी मुए' वाक्यांश मानवीय मूर्खता और अहंकार के विनाश का सशक्त रूपक प्रस्तुत करता है। कम शब्दों में गहरी बात कहने की शैली (गागर में सागर भरना) इस दोहे की सबसे बड़ी विशेषता है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • ईश्वर एक है, उसके नाम अनेक हो सकते हैं, अतः नाम को लेकर विवाद व्यर्थ है।
  • सांप्रदायिक विद्वेष और अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
  • धर्म का वास्तविक मर्म प्रेम, करुणा और सेवा है, न कि लड़ाई-झगड़ा।
  • आत्मज्ञान के बिना बाहरी पूजा-पाठ और दावे अधूरे हैं।
  • मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
  • सच्चा भक्त सभी जीवों में परमात्मा के दर्शन करता है।

एक नजर में | Quick Summary

घटक विवरण
रचना हिन्दू कहें मोहि राम पियारा... दोहा
रचनाकार / संत संत कबीर दास जी
भाषा सधुक्कड़ी / संत भाषा
भक्ति परंपरा निर्गुण धारा (संत काव्य)
मुख्य थीम साम्प्रदायिक सद्भाव, ईश्वर की एकता
मुख्य संदेश अहंकार त्याग कर प्रेम और मानवता अपनाना
स्रोत ग्रंथ कबीर ग्रಂಥवली / बीजक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस प्रसिद्ध दोहे के रचयिता महान संत और समाज सुधारक संत कबीर दास जी हैं।

उत्तर: इस दोहे का मुख्य उद्देश्य समाज में फैले धार्मिक पाखंड, साम्प्रदायिक भेदभाव और अहंकार को समाप्त कर सर्वधर्म समभाव और मानवता का संदेश देना है।

उत्तर: इसका अर्थ है कि लड़ाई-झगड़े और अहंकार में डूबे लोग ईश्वर के वास्तविक रहस्य (मरम) को कभी नहीं जान पाए कि परमात्मा एक ही है।

उत्तर: नहीं, कबीर दास जी निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनके लिए राम, रहीम, अल्लाह और केशव एक ही निराकार परमपिता परमेश्वर के विभिन्न नाम थे।

उत्तर: यह दोहा सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा में लिखा गया है, जो आम जनता द्वारा आसानी से समझी जाती थी।

उत्तर: आज के समय में जब विभिन्न धर्मों और जातियों के बीच तनाव की स्थिति देखने को मिलती है, यह दोहा हमें शांति, भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाता है।

उत्तर: मध्यकालीन भारतीय संदर्भ में 'तुर्क' शब्द का प्रयोग सामान्यतः मुस्लिम अनुयायियों या इस्लाम धर्म मानने वालों के लिए किया जाता था।

उत्तर: हाँ, संतों की वाणियों का मनन करने से अहंकार कम होता है, विचारों में स्पष्टता आती है और मन को गहरी आध्यात्मिक शांति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख में संत कबीर दास जी के दोहे के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक महत्व और प्रासंगिकता का प्रामाणिक प्रस्तुतिकरण किया गया है ताकि पाठकों को सनातन एवं संत परंपरा का सटीक और गहन ज्ञान प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ

  • कबीर ग्रन्थवली (संपादक: श्याम सुंदर दास)
  • बीजक - संत कबीर साहेब कृत
  • भारतीय भक्ति आंदोलन और संत साहित्य के ऐतिहासिक दस्तावेज
  • पारंपरिक लोकमानस एवं सत्संग परंपरा

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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