सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में "देना हो तो दे दे सँवारे, कब तक दामन फैलाऊंगा" एक ऐसा कालजयी भजन है, जो प्रत्येक भक्त के हृदय को करुणा, अनन्य शरणागति और परम श्रद्धा से सराबोर कर देता है। यह भजन कलयुग के साक्षात् अवतारी भगवान श्री खाटू श्याम जी (बरबरीक) को समर्पित है। इस भजन में भक्त और भगवान के बीच के अत्यंत निश्छल, आत्मीय और भावुक संबंध को दर्शाया गया है। जब एक साधक संसार की समस्त आशाओं को त्यागकर केवल अपने आराध्य के चरणों में शरण लेता है, तब उसके अंतर्मन से यही पुकार निकलती है। यह भजन न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि साधक के भीतर समर्पण भाव (प्रपत्ति) को जागृत करता है। खाटू श्याम जी के दरबार में गाए जाने वाले इस भजन का श्रवण और कीर्तन विशेष रूप से एकादशी, द्वादशी और फाल्गुन मेले के पावन अवसर पर भक्तों को भाव-विभोर कर देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
देना हो तो दे दे सँवारे लिरिक्स
(कोरस / मुखड़ा)
देना हो तो दे दे सँवारे, कब तक दामन फैलाऊंगा।
देना हो तो दे दे सँवारे, कब तक दामन फैलाऊंगा।
तेरे दर पे ही जी रहा हूँ, तेरे दर पे ही मर जाऊंगा॥
देना हो तो दे दे सँवारे...
(प्रथम अंतरा)
सुना है हमने इस दुनिया में, तूने लाखों पार उतारे हैं।
मेरी बारी क्यों देर करी, क्या हम तुझको प्यारे नहीं हैं?
या तो अपनी शरण में ले ले, या कह दे मैं न आऊंगा॥
देना हो तो दे दे सँवारे...
(द्वितीय अंतरा)
खाली हाथ न लौटाना मुझे, जग हंसाई हो जाएगी।
तेरी दयालुता की गाथा पर, सँवारे आंच आ जाएगी।
लाज बचाना तेरे हाथ है, मैं तो खाली हाथ ही जाऊंगा॥
देना हो तो दे दे सँवारे...
(तृतीय अंतरा)
तू ही मेरा माझी है बाबा, तू ही मेरी पतवार है।
तेरे बिना इस जीवन नैया का, होना न बेड़ा पार है।
मझधार में अटकी नैया को, पार लगा दे, मैं गुण गाऊंगा॥
देना हो तो दे दे सँवारे...
(चतुर्थ अंतरा)
सँवारे तेरी रहमत का, प्यासा हूँ मैं जनम-जनम से।
दूर करो अब इस दूरी को, बांध लो मुझको अपने प्रेम से।
चरणों की सेवा दे दे बाबा, मैं तो निहाल हो जाऊंगा॥
देना हो तो दे दे सँवारे, कब तक दामन फैलाऊंगा।
तेरे दर पे ही जी रहा हूँ, तेरे दर पे ही मर जाऊंगा॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन भक्त की उस चरम अवस्था को दर्शाता है जहां वह संसार के सभी झूठे सहारों को छोड़कर अपने आराध्य के सम्मुख पूर्णतः नतमस्तक हो जाता है। भजन के प्रथम भाग में भक्त कहता है कि "हे सँवारे! यदि आप मुझे अपनी कृपा का दान देना चाहते हैं, तो अब दे दीजिए। मैं कब तक आपके सामने अपनी झोली फैलाता रहूंगा? मेरा तो अस्तित्व ही आपके दर से जुड़ा है; मैं आपके चरणों में ही जिऊंगा और यहीं अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दूंगा।"
आगे के अंतराओं में भक्त भगवान की पतितपावन छवि और उनकी असीम दयालुता को स्मरण कराता है। वह कहता है कि उसने सुना है कि बाबा श्याम ने लाखों दीन-दुखियों का उद्धार किया है, तो फिर उसकी बारी आने पर इतनी देरी क्यों हो रही है? भक्त अपने अधिकार भाव से कहता है कि यदि आप मुझे अपनी शरण में नहीं लेंगे, तो संसार में आपकी दयालुता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। यह भक्त का भगवान के प्रति अनन्य और निश्छल हठ है, जो केवल सच्चे प्रेम में ही संभव है। अंततः, भक्त सांसारिक वस्तुओं की मांग न करके केवल भगवान के चरणों की सेवा और उनके शाश्वत प्रेम की याचना करता है, जो कि भक्ति मार्ग का सर्वोच्च लक्ष्य है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की लोकप्रियता और इसका आध्यात्मिक प्रभाव असाधारण है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति): यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" के सिद्धांत को चरितार्थ करता है। भक्त अपने अहंकार को शून्य कर भगवान की शरण में आता है।
- हारे का सहारा भाव: खाटू श्याम जी को "हारे का सहारा" कहा जाता है। यह भजन उस समय संजीवनी का कार्य करता है जब मनुष्य जीवन के संघर्षों से थककर पूरी तरह टूट चुका होता है।
- करुण रस की प्रधानता: इस भजन के स्वर और शब्द सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं, जिससे भक्त की आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है, जो अंतःकरण की शुद्धि का मार्ग है।
- सामूहिक संकीर्तन के लिए उपयुक्त: इसकी लय और धुन इतनी सरल और सुमधुर है कि कीर्तन में उपस्थित सभी श्रद्धालु एक सुर में झूमने लगते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए प्रत्येक क्षण पवित्र है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों एवं लोक परंपराओं में अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:
- शुभ समय: इस भजन का गायन संध्या आरती के समय अथवा रात्रि जागरण (कीर्तन) के दौरान करना सर्वोत्तम माना जाता है।
- विशेष तिथियां: प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी और द्वादशी तिथि को श्याम बाबा का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन इस भजन को गाने से बाबा श्याम की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- गायन की विधि: भजन गाते समय हाथ में झांझ, मंजीरा या करताल लेकर, शुद्ध मन और एकाग्र चित्त से बाबा श्याम की मूर्ति या चित्र के सम्मुख बैठना चाहिए। आंखों को बंद कर या बाबा के अलौकिक मुखमंडल का दर्शन करते हुए भावपूर्ण स्वर में इसका गायन करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन महाभारत कालीन महान योद्धा और दानवीर बरबरीक को समर्पित है, जिन्हें स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कलयुग में अपने नाम "श्याम" से पूजे जाने का वरदान दिया था।
महाभारत युद्ध के समय, बरबरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि वह युद्ध में केवल हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे। उनकी इस प्रतिज्ञा के कारण और उनके पास मौजूद तीन अमोघ बाणों की शक्ति को देखते हुए, भगवान श्री कृष्ण ने ब्राह्मण का भेष धरकर उनसे उनका शीश दान में मांग लिया। बरबरीक ने बिना किसी संकोच के अपना शीश काट कर श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। उनकी इस महान आहुति और निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में जो भी भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और वे "हारे का सहारा" कहलाएंगे।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
श्याम भजनों की रचना मुख्य रूप से राजस्थान की पावन धरा पर विकसित हुई, जहां खाटू (सीकर जिला) में बाबा श्याम का भव्य और चमत्कारी मंदिर स्थित है। इस भजन के रचयिता आधुनिक युग के परम श्याम भक्त हैं, जिन्होंने बाबा के प्रति अपनी अनन्य प्रीति को इन शब्दों में पिरोया है।
इस भजन की पृष्ठभूमि में वह तड़प और व्याकुलता है जो एक भक्त अपने जीवन के कठिन दौर में महसूस करता है। जब संसार के सभी रिश्ते-नाते और भौतिक साधन निष्प्रभावी हो जाते हैं, तब भक्त खाटू नरेश के दरबार में हाजिरी लगाता है। यह भजन उसी अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति है कि "सँवारा" कभी अपने भक्त को निराश नहीं करेगा।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें राजस्थानी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट देखने को मिलता है।
- काव्य शैली: यह एक गेय पद (गीत) है, जिसे सुगमता से गाया जा सकता है। इसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे: फैलाऊंगा - जाऊंगा, उतारे - प्यारे)।
- बिंब योजना: भजन में "दामन फैलाना", "नैया का मझधार में अटकना", और "खाली हाथ लौटना" जैसे सुंदर बिंबों का प्रयोग किया गया है, जो भक्त की दीनता और भगवान की महानता को सजीव रूप से प्रस्तुत करते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने की अमूल्य सीख देता है:
- अहंकार का त्याग: जब भक्त कहता है "कब तक दामन फैलाऊंगा", तो वह अपने कर्तापन के अहंकार को त्याग देता है और स्वीकार करता है कि वह पूरी तरह से ईश्वर पर आश्रित है।
- धैर्य और विश्वास: जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां क्यों न आएं, हमें अपने आराध्य पर अटूट विश्वास रखना चाहिए। वह हमारी पुकार अवश्य सुनेंगे।
- सच्ची मांग: भजन के अंत में भक्त भौतिक सुखों के बजाय "चरणों की सेवा" मांगता है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर से संसार की नश्वर वस्तुएं मांगने के बजाय स्वयं ईश्वर को और उनकी भक्ति को मांगना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सँवारे (Sanware) | श्याम वर्ण वाले, भगवान श्री कृष्ण / खाटू श्याम | भक्तों के दुखों को हरने वाले सुंदर श्याम सुंदर। |
| दामन (Daman) | आँचल, झोली | ईश्वर के सम्मुख अपनी याचना और प्रार्थना प्रस्तुत करना। |
| दर (Dar) | चौखट, द्वार | भगवान का पावन मंदिर या उनकी शरण। |
| रहमत (Rehmat) | कृपा, दया | ईश्वर की अकारण दया जो भक्तों पर बरसती है। |
| मझधार (Majhdhar) | नदी के बीच की धारा | संसार रूपी सागर में आने वाले संकट और कठिनाइयां। |
| माझी (Majhi) | नाव चलाने वाला, मल्लाह | संसार रूपी सागर से पार उतारने वाले गुरु या भगवान। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति: "देना हो तो दे दे सँवारे, कब तक दामन फैलाऊंगा। तेरे दर पे ही जी रहा हूँ, तेरे दर पे ही मर जाऊंगा॥"
भावार्थ: हे मेरे प्यारे सँवारे! यदि आप मुझ पर अपनी कृपा करना चाहते हैं, तो अब विलंब मत कीजिए। मैं आपके द्वार पर कब से अपनी झोली फैलाए खड़ा हूँ। मेरा जीवन और मृत्यु अब केवल आपके ही चरणों के अधीन है।
पंक्ति: "सुना है हमने इस दुनिया में, तूने लाखों पार उतारे हैं। मेरी बारी क्यों देर करी, क्या हम तुझको प्यारे नहीं हैं?"
भावार्थ: हे प्रभु! मैंने सुना है कि आपने इस संसार के न जाने कितने पापी और दीन-दुखियों का उद्धार किया है। फिर मेरी बारी आने पर यह देरी क्यों? क्या मैं आपका प्रिय बच्चा नहीं हूँ? मुझे भी अपनी दया का पात्र बनाइए।
पंक्ति: "तू ही मेरा माझी है बाबा, तू ही मेरी पतवार है। तेरे बिना इस जीवन नैया का, होना न बेड़ा पार है।"
भावार्थ: हे बाबा श्याम! इस संसार रूपी भवसागर में मेरी जीवन रूपी नौका के खेवनहार आप ही हैं। आपके बिना मेरी इस नैया को किनारा मिलना असंभव है। आप ही इसे सुरक्षित पार लगा सकते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
श्याम बाबा की आराधना करते समय इस पावन मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:
॥ ॐ श्री श्याम देवाय नमः ॥
"हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।"
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक भी इस भजन के शरणागति भाव को पूर्णतः पुष्ट करता है:
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | देना हो तो दे दे सँवारे (Dena Ho To De De Sanware) |
| समर्पित देवी-देवता | भगवान श्री खाटू श्याम जी (श्री कृष्ण स्वरूप) |
| मुख्य भाव | समर्पण, विनय, करुणा, अनन्य भक्ति (शरणागति) |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| गायन का उत्तम समय | एकादशी, द्वादशी, संध्या आरती, श्याम कीर्तन |
| संबंधित तीर्थ स्थल | श्री खाटू श्याम मंदिर, सीकर, राजस्थान |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ, भावार्थ और ऐतिहासिक संदर्भों को सनातन धर्म की प्रामाणिक संकीर्तन परंपराओं, खाटू श्याम मंदिर के इतिहास और भक्तों के अनुभवों के आधार पर संकलित व विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और भावपूर्ण आध्यात्मिक सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना को और अधिक प्रगाढ़ बना सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति योग एवं भक्ति मार्ग के सिद्धांत)
- महाभारत (कथा प्रसंग - वीर बरबरीक का महान बलिदान)
- श्री खाटू श्याम मंदिर बोर्ड, सीकर (राजस्थान) की पारंपरिक संकीर्तन नियमावली
- सनातन भजन संग्रह एवं लोक संकीर्तन परंपराएं
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