Parvati Stotram

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये दोहे का अर्थ(Aesi Vani Boliye Man Ka Aapa Khoy Dohe Ka Arth in Hindi) - Bhaktilok

328 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

शांत वाणी की महिमा: मन का आत्म ज्ञान

इस भजन का गान करें और अपने मन को शांति और स्नेह से भरें।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये’ का अर्थ गहन है। यह वाक्य हमें सिखाता है कि हमें अपनी वाणी में ऐसी मिठास भरनी चाहिए जिससे न केवल हम स्वयं को शीतल बनाएं, बल्कि दूसरों को भी आराम प्रदान करें। इस भजन के पहले भाग में इस बात का संकेत है कि मन की स्थिति बाहरी वाणी पर आधारित होती है। जब हम आत्म के साक्षात रूप में अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं, तब केवल तब ही हम ऐसी वाणी का उपयोग कर सकते हैं जिसमे प्रेम और शांति हो। यह शब्द हमें प्रेरित करते हैं कि हमारी बोलचाल का उद्देश्य केवल संवाद करना नहीं, बल्कि एक दूसरे को सांत्वना प्रदान करना भी होना चाहिए। अतः इस वाणी से न केवल हमारी बातों का अर्थ बदलता है, बल्कि यह हमारे मन की गहराईयों तक भी पहुँचता है।

दूसरे पंक्ति में कहा गया है, ‘औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए’। यहाँ ज़ोर उस विचार पर है कि हम जो बात करते हैं, उसका प्रभाव न केवल हमें, बल्कि हमारे चारों ओर के लोगों पर भी पड़ता है। जब हम प्रेम और शांति से बात करते हैं, तो यह केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन का कारण बनता है। हम देखते हैं कि एक सुखद संवाद सबके मन को शीतल कर सकता है। यह हमें यह सिखाता है कि हमारी वाणी में कितनी शक्ति होती है। इसका भावार्थ यह है कि जब हम अपनी बातों को दीपक की रोशनी के समान उज्ज्वल बनाते हैं, तो वह हमारे मन की शांति के लिए भी सहायक होती है।

इस भजन में भक्ति मार्ग का महत्वपूर्ण तत्व मौजूद है। यह संकेत है कि चाहे हम कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, यदि हमारी वाणी में प्रेम और करुणा नहीं है, तो वह ज्ञान अधुरा है। भक्ति का मार्ग यही है कि हम स्वयं को जानें, और फिर उस ज्ञान को सार्वजनिक करें। यह केवल एक मानसिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह हमारी आत्मिक यात्रा का हिस्सा है। भक्ति का ऐसा स्वरूप हमें इससे भी आगे बढ़ाता है कि हम अपने जीवन में उपदेश नहीं देते, बल्कि जो हम हैं, उसी रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। यह भजन हमें बताता है कि जब हमारा मन सुखी और शांति से भरा हो, तब हमारी वाणी स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए भी सौम्य और सहायक बन जाती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन भारतीय संस्कृति में वाणी के महत्व का संकेत करता है। वेदों और उपनिषदों में वाणी को ब्रह्मा की शक्ति माना गया है। जब हम दूसरों से शब्दों के द्वारा संवाद करते हैं, तब यह केवल बातचीत नहीं, बल्कि सृष्टि का हिस्सा बनता है। महाभारत और रामायण में भी वाणी की शक्ति के कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ शब्दों द्वारा युद्ध भी जीते गए हैं और घृणा को मिटाने के लिए प्रेम और करुणा के शब्दों का उपयोग हुआ है। इससे पता चलता है कि शब्दों का चयन और उनका प्रभाव हमारे जीवन में गहरा होता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित पाठ मानसिक शांति, आत्मानुशासन और करुणा की भावना को बढ़ावा देता है। यह सुनने और कहने के दौरान मन को स्थिर रखने में सहायक होता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। इसके जाप से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सामाजिक संबंधों में सुधार होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का संकीर्तन सुबह या शाम के समय करना चाहिए, जब वातावरण शांत हो। एक दीपक जलाना और इकट्ठे होकर इस भजन का गान करना अधिक फलदायी होता है। सही मुद्रा में बैठकर ध्यान लगाते हुए अपने मन को वाणी की मिठास में डुबोना चाहिए। यह सब मिलकर अवस्था को बढ़ाता है और भक्तिभाव को सशक्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मानव को अपनी वाणी में करुणा और प्रेम का समावेश करना चाहिए। जब हम अपनी बातों से दूसरों को शीतलता और स्नेह का अहसास कराते हैं, तब हमारे भीतर भी एक शांति की अनुभूति होती है।

इस भजन का पाठ कब करना चाहिए?

इस भजन का पाठ सुबह और शाम के समय करना चाहिए, जब मन शांत और एकाग्र हो। इससे हमारी आत्मा को प्रकाश मिलता है और मन के भीतर की अशांति भी दूर होती है।

इस भजन का लाभ क्या है?

इस भजन का लाभ यह है कि यह मानसिक शांति और संतुलन को बढ़ाता है। इसके जाप से व्यक्ति की वाणी शुभ और सकारात्मक बनती है, जिससे समाज में प्रेम और एकता बनी रहती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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