Radha Kriya Kataksh Stotram

श्री गणेश स्तोत्र (Shree Ganesh Stotram Lyrics in Hindi) - Ganesh Mantra Sankat Nashak Ganpati Stotra and Mantra - Bhaktilok

99 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री गणेश स्तोत्र (Shree Ganesh Stotram Lyrics in Hindi) - परिचय एवं महत्व

श्री गणेश स्तोत्र सनातन धर्म में विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत पावन, शक्तिशाली और फलदायी स्तोत्र है। देवर्षि नारद द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के संकट, बाधाएं और मानसिक तनाव दूर हो जाते हैं। सनातन परंपरा में किसी भी नए कार्य, शुभ अवसर, अनुष्ठान या पूजा की शुरुआत से पहले भगवान गणेश का स्मरण अनिवार्य माना गया है। "संकट नाशक गणेश स्तोत्र" (Sankat Nashak Ganesha Stotram) विशेष रूप से उन भक्तों के लिए महामंत्र के समान है जो जीवन में बार-बार आने वाली कठिनाइयों, असफलताओं और कर्ज या शत्रुओं के भय से मुक्ति पाना चाहते हैं। इस लेख में हम श्री गणेश स्तोत्र के संपूर्ण बोल (Lyrics), शुद्ध उच्चारण, पद-विच्छेद, विस्तृत हिंदी अर्थ, स्तोत्र पाठ की विधि और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे, जो आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सिद्धि का संचार करेगा।

श्री गणेश स्तोत्र - संपूर्ण संस्कृत पाठ एवं लिरिक्स

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तास्मरेद्नित्यमायुष्कामार्थसिद्धये॥ १॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदतं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥ २॥

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥ ३॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥ ४॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिप्रदं परम्॥ ५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम्॥ ६॥

जपेत्गणपतिस्तोत्रं षड्भिरमासैः फलं लभेत।
संवत्सरैन सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥ ७॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥

इति श्रीनारदपुराणे संकटविमोचन श्रीगणेशस्तोत्रं संपूर्णम्।

श्री गणेश स्तोत्र का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ

श्री गणेश स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों और उनके पावन नामों का अद्भुत वर्णन किया गया है। प्रथम श्लोक में देवर्षि नारद कहते हैं कि जो व्यक्ति अपनी आयु, स्वास्थ्य, सुख और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि के लिए सिर झुकाकर माता गौरी के नंदन, विघ्नहर्ता विनायक का स्मरण करता है, उसके सभी मार्ग प्रशस्त हो जाते हैं। इसके पश्चात भगवान गणेश के बारह दिव्य नामों (वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लंबोदर, विकट, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन) का स्मरण कराया गया है।

इन बारह नामों का जो नित्य त्रिसंध्या (प्रातः, दोपहर और संध्याकाल) पाठ करता है, उसके जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार का विघ्न या भय नहीं आता। यह स्तोत्र साधक को सर्वोच्च सिद्धियां प्रदान करने वाला है। जो विद्यार्थी इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे उत्तम विद्या की प्राप्ति होती है, धन चाहने वाले को धन, संतान की कामना करने वाले को योग्य संतान और मोक्ष के अभिलाषी को परम गति की प्राप्ति होती है। यदि कोई भक्त निष्ठापूर्वक छह महीने तक इसका नियमित जाप करे, तो उसे अपनी साधना का पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है और एक वर्ष के भीतर उसे गणेश जी की कृपा से सिद्धि प्राप्त हो जाती है, इसमें संशय के लिए कोई स्थान नहीं है।

श्री गणेश स्तोत्र की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व

श्री गणेश स्तोत्र को सनातन ग्रंथों में 'संकट नाशक स्तोत्र' की उपाधि दी गई है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अत्यंत सरल, संक्षिप्त और स्मरण करने में सुगम है, परंतु इसका आध्यात्मिक प्रभाव अत्यंत गहरा है। भगवान गणेश को 'प्रथम पूज्य' होने का वरदान प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, गृह प्रवेश, विवाह या व्यापार आरंभ करने से पूर्व श्री गणेश का स्मरण करने से बाधाओं का नाश होता है। इस स्तोत्र में भगवान गणेश के बारह स्वरूपों का दर्शन कराया गया है, जो साधक के शरीर के विभिन्न चक्रों और ऊर्जा केंद्रों को जाग्रत करने में सहायक माने जाते हैं। इसके नियमित पाठ से बुद्धि का विकास होता है, निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

स्तोत्र पाठ एवं श्रवण का समय एवं विधि

श्री गणेश स्तोत्र का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय का काल सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त संध्याकाल में भी दीपक प्रज्वलित करके इसका पाठ किया जा सकता है। बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, इसलिए बुधवार के दिन विशेष अनुष्ठान के रूप में इस स्तोत्र का पाठ अत्यधिक फलदायी माना जाता है। पाठ करने से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, भगवान गणेश के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक और धूप जलाएं। दूर्वा घास, मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें।

भगवान गणेश से जुड़ी पौराणिक पृष्ठभूमि एवं रचना

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्तोत्र की रचना देवर्षि नारद मुनि ने की थी। जब एक बार सभी देवताओं और ऋषियों ने भगवान गणेश से सभी संकटों के निवारण हेतु सरल उपाय बताने का आग्रह किया, तब देवर्षि नारद ने नारद पुराण के अंतर्गत इस बारह नामों वाले स्तोत्र को प्रकट किया। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गजानन को देवगणों में सबसे पहले पूजे जाने का अधिकार मिला है। विघ्नहर्ता के रूप में उनकी महिमा का गान वेद, पुराण और उपनिषदों में विस्तार से किया गया है। इस स्तोत्र का स्मरण करने मात्र से जीवन के समस्त अमंगल दूर हो जाते हैं और साधक रिद्धि-सिद्धि का स्वामी बनता है।

स्तोत्र के प्रमुख शब्दों का अर्थ

संस्कृत शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / भाव
प्रणम्य शिरसा सिर झुकाकर प्रणाम करना पूर्ण समर्पण और विनय का भाव
गौरीपुत्रम् माता पार्वती के पुत्र वात्सल्य और शक्ति का प्रतीक
वक्रतुण्डम् टेढ़ी सूंड वाले जो संपूर्ण ब्रह्मांड की वक्रता को सीधा करते हैं
एकदन्तम् एक दांत वाले अखंड एकाग्रता और बुद्धि का प्रतीक
लम्बोदरम् बड़े पेट वाले समस्त ब्रह्मांड और चराचर जगत को अपने भीतर धारण करने वाले
विघ्नराजेन्द्रम् समस्त विघ्नों के राजा या स्वामी बाधाओं का शमन करने वाले
भालचन्द्रम् मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले शिवत्व और शीतलता के प्रतीक
त्रिसंध्यम् दिन की तीनों संधियों (प्रातः, दोपहर, संध्या) में नियमित उपासना का नियम

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ

प्रणम्य शिरसा देवं...: सिर झुकाकर गौरीपुत्र विनायक को प्रणाम करता हूं, जिनका स्मरण आयु, स्वास्थ्य और सभी पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि के लिए किया जाता है।

प्रथमं वक्रतुण्डं च...: पहले वक्रतुंड, दूसरे एकदंत, तीसरे कृष्णपिंगाक्ष (काले और पिंगल नेत्र वाले) और चौथे गजवक्त्र (हाथी के मुख वाले) का स्मरण करें।

लम्बोदरं पंचमं च...: पांचवें लंबोदर, छठे विकट, सातवें विघ्नराजेन्द्र और आठवें धूम्रवर्ण का ध्यान करें।

नवमं भालचन्द्रं च...: नौवें भालचंद्र, दसवें विनायक, ग्यारहवें गणपति और बारहवें गजानन का स्मरण करें।

द्वादशैतानि नामानि...: इन बारह नामों का जो व्यक्ति तीनों समय पाठ करता है, उसे किसी भी विघ्न का भय नहीं रहता और उसे समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

श्री गणेश से जुड़े अन्य प्रमुख मंत्र एवं श्लोक

श्री गणेश स्तोत्र के साथ-साथ भक्त निम्नलिखित वैदिक और पौराणिक मंत्रों का भी जाप कर सकते हैं:

1. वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

2. ॐ गं गणपतये नमः।

3. गजाननाय भूताणां गणाधिपाय नमः।

इन मंत्रों का नियमित जाप करने से साधक की वाणी में ओज और कार्यक्षेत्र में सफलता की प्राप्ति होती है। आप अधिक जानकारी के लिए श्री हनुमान चालीसा और अन्य स्तोत्रों का भी अध्ययन कर सकते हैं।

एक नजर में भजन एवं स्तोत्र की जानकारी

विवरण तथ्य
स्तोत्र का नाम श्री गणेश स्तोत्र (संकट नाशक गणेश स्तोत्र)
ाराध्य देवता भगवान श्री गणेश (प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता)
रचियता / स्रोत देवर्षि नारद (नारद पुराण)
भाषा संस्कृत (देवनागरी लिपि)
मुख्य विषय विघ्ननाश, बुद्धि, विद्या, और सर्वसिद्धि प्राप्ति
उपयुक्त समय प्रातःकाल, संध्याकाल, बुधवार का दिन, शुभ कार्य आरंभ से पूर्व
प्रमुख लाभ संकट मुक्ति, विद्या, धन, यश और मानसिक शांति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

श्री गणेश स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्याकाल में करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। बुधवार का दिन गणेश जी की उपासना के लिए विशेष रूप से फलदायी है।

इस स्तोत्र के नियमित पाठ से जीवन की सभी बाधाएं, संकट, कर्ज और शत्रुओं का भय समाप्त होता है। इसके साथ ही विद्यार्थी को विद्या, व्यापारी को धन और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हाँ, बिल्कुल। भगवान गणेश की आराधना सभी के लिए समान रूप से खुली है। महिलाएं और पुरुष दोनों ही पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।

श्री गणेश स्तोत्र के रचयिता देवर्षि नारद मुनि हैं, और यह पावन स्तोत्र 'नारद पुराण' से लिया गया है।

भगवान गणेश को मोक्ष, लड्डू (विशेषकर बेसन या बूंदी के लड्डू) और मोदक अतिप्रिय हैं। इसके साथ ही उन्हें दूर्वा घास अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

निश्चित रूप से। चूंकि श्री गणेश विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य हैं, इसलिए नया व्यवसाय, गृह प्रवेश, परीक्षा या यात्रा शुरू करने से पहले इस स्तोत्र का पाठ समस्त बाधाओं को दूर करता है।

इस स्तोत्र में भगवान गणेश के बारह (12) प्रमुख नामों का संकलन किया गया है, जिनका स्मरण करने से मनुष्य के सभी संकट टल जाते हैं।

पाठ के दौरान शुद्धता, एकाग्रता, स्पष्ट उच्चारण और सात्विक विचारों का पालन करना चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखना आवश्यक है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन ग्रंथों, नारद पुराण और पारंपरिक वैदिक पद्धतियों पर आधारित है। पाठकों की सुविधा के लिए शुद्ध देवनागरी लिपि में स्तोत्र के बोल, पद-विच्छेद, और सरल हिंदी अर्थ प्रस्तुत किए गए हैं ताकि हर आयु वर्ग के लोग इसका सरलता से पाठ कर सकें। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जिसका उद्देश्य पाठकों को authentic और spiritual guidance प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ

  • नारद पुराण - संकटविमोचन श्रीगणेशस्तोत्र अध्याय
  • प्राचीन सनातन वैदिक स्तोत्र संग्रह
  • पारंपरिक गणेश पुराण एवं उपनिषद ग्रंथ

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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