Radha Kriya Kataksh Stotram

श्री हरि स्तोत्रम् लिरिक्स (Shri Hari Stotram Lyrics in Hindi) - Jagajjalapalam Aishwarya Srinivas Hari Stotra - Bhaktilok

126 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

श्री हरि स्तोत्रम् परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

श्री हरि स्तोत्रम् सनातन धर्म के सर्वोच्च आराध्य भगवान श्री विष्णु (जगदीश्वर) की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत पावन, दार्शनिक और ऊर्जावान स्तोत्र है। 'जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं' के रूप में आरंभ होने वाला यह स्तोत्र भगवान विष्णु के अद्भूत स्वरूप, उनके दिव्य आभूषणों, पावन आयुधों और संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार रूप का अत्यंत जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है। आदि शंकराचार्य या परंपरा से प्राप्त इस दिव्य स्तोत्र के पाठ से साधक के मन में अगाध शांति, भक्ति और वैराग्य का संचार होता है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में भगवान श्री हरि की महिमा, उनके अनंत गुणों और शरणागत-वत्सल स्वभाव का गुणगान किया गया है। नित्य नियम के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से सांसारिक तापों, जन्म-मृत्यु के बंधनों और मानसिक संतापों से मुक्ति मिलती है तथा साधक श्री वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति का अधिकारी बनता है। भक्तलोक पर प्रस्तुत इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम श्री हरि स्तोत्रम् के मूल पाठ, शुद्ध उच्चारण, शब्दार्थ, भावार्थ और संपूर्ण आध्यात्मिक रहस्यों को समझेंगे।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं।
नभोनीलकायं दुरावारमायं सुपद्मासहायं भजेऽहं भजेऽहं ॥१॥

सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्सन्निवासं शतादित्यभासं।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं ॥२॥

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं जलान्तर्विहारं धराभारहारं।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं धृतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं ॥३॥

जराजन्महीनं परानन्दपीनं समाधानलीनं सदैवानवीनं।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं ॥४॥

कृताम्नायगानं खगाधीशयानं विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं।
स्वभक्तानुकूलं जगद्व्रुक्षमूलं निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं ॥५॥

समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं जगद्विम्बलेशं ह्रुदाकाशदेशं।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं ॥६॥

सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं ॥७॥

रमावामभागं तलानग्रनागं कृताधीनयागं गतारागरागं।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं ॥८॥

फलश्रुतिः:
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारेः।
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥९॥

श्लोक का उच्चारण एवं पदच्छेद | Pronunciation & Padaccheda

श्री हरि स्तोत्रम् के पाठ में संस्कृत के अनुष्टुप और वृत्त छंदों जैसी लय का आनंद मिलता है। 'भजेऽहं भजेऽहं' की पुनरावृत्ति इस स्तोत्र को अत्यंत संगीतमय और मनमोहक बनाती है। प्रत्येक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करने से मन्त्र की ध्वनि ऊर्जा जागृत होती है। श्लोकों का पाठ करते समय विराम (यति) और गति का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जिससे अंतःकरण में भगवान विष्णु के प्रति सात्विक भाव पुष्ट हो सकें। इसके अतिरिक्त, आप हमारे श्री शनी देव आरती और राम भजन लेखों से भी devotional inspiration प्राप्त कर सकते हैं।

पदच्छेद एवं अन्वय | Padaccheda & Anvaya

अन्वय के माध्यम से संस्कृत श्लोकों के शब्दों को व्याकरण के नियमानुसार व्यवस्थित किया जाता है ताकि उनका सीधा अर्थ समझ में आ सके। इस स्तोत्र में कर्ता 'अहम्' (मैं) भगवान श्री हरि का 'भजे' (भजन करता हूँ) क्रिया के साथ स्मरण करता है। 'जगज्जालपालम्' (संसार के समूह का पालन करने वाले) से लेकर 'सुवैकुण्ठगेहम्' (सुसंस्कृत वैकुण्ठ धाम जिनका निवास है) तक के सभी विशेषण भगवान विष्णु के सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी स्वरूप को प्रकट करते हैं।

विस्तृत शब्दार्थ | Word-by-word Meaning

संस्कृत शब्द पदच्छेद सरल Hindi Meaning Contextual Meaning
जगज्जालपालम् जगत + जाल + पालम् संसार रूपी जाल के पालनकर्ता सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा करने वाले
शरच्चन्द्रभालम् शरद + चन्द्र + भालम् शरद ऋतु के चंद्रमा जैसी कांति वाला मस्तक शीतल और आह्लादकारी मुखमंडल
महादैत्यकालम् महा + दैत्य + कालम् महान दैत्यों के लिए काल (यूम) स्वरूप अधर्म का नाश करने वाले
नभोनीलकायम् नभः + नील + कायम् आकाश के समान नीले शरीर वाले मेघश्यामल भगवान विष्णु
सुपद्मासहायम् सुपद्मा + सहायकम् माता लक्ष्मी जिनके सहायक/सहचर हैं श्री लक्ष्मीपति
श्रुतिव्रातसारम् श्रुति + व्रात + सारम् समस्त वेदों का सार तत्व वैदिक ज्ञान के मर्म
धराभारहारम् धरा + भार + हारम् पृथ्वी का भार उतारने वाले अवतार लेकर पृथ्वी की पीड़ा हरने वाले
खगाधीशयानम् खग + अधिश + यानम् पक्षियों के राजा गरुड़ जिनका वाहन है गगरुडासीन भगवान

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या | Hindi Meaning & Explanation

श्री हरि स्तोत्रम् के आठों छंदों में भगवान विष्णु की अनन्य महिमा का वर्णन किया गया है। प्रथम श्लोक में भगवान को संसार के जाल का पालन करने वाला, गले में पुष्पमाला धारण करने वाला, शरद ऋतु के चंद्रमा जैसा सुंदर मस्तक वाला और महादैत्यों का नाश करने वाला बताया गया है। उनका शरीर आकाश के समान नीला है, वे माया से परे हैं और माता लक्ष्मी उनके साथ हैं—ऐसे श्री हरि का मैं बार-बार भजन करता हूँ।

द्वितीय और तृतीय श्लोक में उनके सदा क्षीरसागर (अम्भोधि) में निवास करने, झड़ते हुए पुष्पों की हँसी जैसी कांति, सैकड़ों सूर्यों के समान प्रकाश, हाथ में गदा और चक्र रूपी शस्त्र धारण करने, पीले वस्त्र पहनने और सुंदर मुख पर मंदहास सुशोभित होने का वर्णन है। वे वेदों के सार हैं, जल के भीतर विहार करने वाले हैं और पृथ्वी का भार हरने वाले चिदानंद रूप हैं।

चौथे से छठे श्लोक में वे जन्म और जरा से रहित, परमानंद से परिपूर्ण, समाधि मेंलीन, सदा नवीन रहने वाले, जगत की उत्पत्ति के हेतु और तीनों लोकों के सेतु हैं। वे सामवेद का गान करने वाले, गरुड़ पर चढ़ने वाले, मुक्ति के निदान और भक्तों के संकटों को हरने वाले हैं। समस्त देवताओं के ईश्वर, भंवरे जैसी काली अलकों वाले, हृदय रूपी आकाश में निवास करने वाले और वैकुण्ठ को अपना घर मानने वाले भगवान की मैं वंदना करता हूँ।

अंतिम श्लोकों में उनकी वीरता, मुनियों द्वारा गाए जाने वाले उनके यश और भक्तों के कल्याणकारी स्वभाव का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है।

श्लोक का मुख्य भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Core Bhava & Spiritual Message

इस स्तोत्र का केंद्रीय भाव 'शरणागति' (प्रपत्ति) है। साधक जब यह स्वीकार करता है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन और पालन करने वाले केवल श्री हरि हैं, तो उसका अहंकार स्वतः गलित हो जाता है। भगवान विष्णु केवल दूर बैठे कोई देवता नहीं हैं, अपितु वे भक्त के हृदय-आकाश में निवास करने वाले चेतना के सर्वोच्च आयाम हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जीवन की हर परिस्थिति में भगवान का स्मरण ही समस्त दुखों की औषधि है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ | Scriptural & Mythological Context

पौराणिक परंपरा में भगवान विष्णु को पालनकर्ता (Preserver) माना गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और विभिन्न स्तोत्र साहित्यों में भगवान के इस रूप का व्यापक वर्णन मिलता है। 'जगज्जालपालम्' स्तोत्र आदि शंकराचार्य या किसी उच्चकोटि के वैष्णव संत की रचना मानी जाती है, जो वेदान्त के अद्वैत दर्शन को भक्ति के रस के साथ जोड़ती है। इस स्तोत्र के माध्यम से साधक सगुण भक्ति से निर्गुण ब्रह्म की अद्वैत चेतना तक की यात्रा तय करता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वेदांत दर्शन के अनुसार, भगवान श्री हरि केवल एक पौराणिक देवता नहीं, बल्कि इस चराचर जगत के मूल आधार हैं। 'नभोनीलकायम्' (आकाश के समान नील शरीर) इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त और असीम है, जिसका कोई अंत नहीं है। 'चिदानन्दरूपम्' का अर्थ है कि उनका स्वरूप सच्चिदानंद (सत् + चित् + आनंद) है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मन की वृत्तियां शांत होती हैं, रज और तम गुण क्षीण होते हैं और सत्त्व गुण की वृद्धि होती है, जिससे मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।

दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं सीख | Daily Life Lessons

भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में मानसिक अशांति और तनाव आम बात हो गई है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात श्री हरि स्तोत्रम् का पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है, निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और नैतिक मूल्यों की स्थापना होती है। यह स्तोत्र विद्यार्थियों, गृहस्थों और आध्यात्मिक साधकों—सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके पाठ से जीवन में संतोष, धैर्य और परोपकार की भावना विकसित होती है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त | Sadhana & Recitation Vidhi

श्री हरि स्तोत्रम् की साधना अत्यंत सरल किंतु फलदायी है। ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में शांत चित्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें। तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पित करें। इसके पश्चात पूर्ण श्रद्धा के साथ इस अष्टक (स्तोत्र) का पाठ करें। एकादशी, गुरुवार, और पुरुषोत्तम मास में इस स्तोत्र का अनुष्ठान विशेष फलदायी माना गया है। आप इस अवसर पर अन्य स्तोत्रों जैसे महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् और राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्रम् का भी स्मरण कर सकते हैं।

Quick Information Table

विवरण तथ्य / जानकारी
स्तोत्र का नाम श्री हरि स्तोत्रम् (जगज्जालपालं स्तोत्र)
आराध्य देवता भगवान श्री विष्णु / हरि / मुरारी
मुख्य भाषा संस्कृत (Devanagari)
प्रमुख भाव भक्ति, शरणागति, स्तुति और वैराग्य
कुल श्लोक ८ मूल श्लोक + १ फलश्रुति
उपयुक्त समय प्रातःकाल, संध्याकाल, एकादशी एवं गुरुवार
मुख्य लाभ मानसिक शांति, शोक-भय मुक्ति और वैकुंठ प्राप्ति

मुख्य सीख | Key Takeaways

  • भगवान श्री हरि संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनकर्ता और रक्षक हैं।
  • नियमित स्तोत्र पाठ से मानसिक तनाव और भय का नाश होता है।
  • शरणागति और विनम्रता ही सच्ची भक्ति की पहचान है।
  • यह स्तोत्र सगुण रूप से निर्गुण ब्रह्म तक पहुँचने का माध्यम है।
  • तुलसी और विष्णु पूजन से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पावन स्तोत्र आदि श्री शंकराचार्य जी अथवा सनातन परंपरा के महान ऋषियों द्वारा रचित माना जाता है, जिसमें भगवान विष्णु के अद्भुत गुणों का वर्णन है।

इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। इसके अलावा एकादशी, गुरुवार और विष्णु पूजन के विशेष अवसरों पर भी इसका पाठ किया जा सकता है।

फलश्रुति के अनुसार, नित्य इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक शोक, भय, जरा (बुढ़ापा) और जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर श्री हरि के परम धाम को प्राप्त करता है।

हाँ, यह स्तोत्र सभी भक्तों के लिए खुला है। गृहस्थ जीवन में शांति, समृद्धि और पारिवारिक सुख-शांति के लिए यह स्तोत्र अत्यंत फलदायी है।

इसका अर्थ है—इस संपूर्ण संसार रूपी जाल (रचना) का पालन-पोषण और संरक्षण करने वाले भगवान विष्णु।

शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता, सात्विक विचार और भगवान विष्णु के प्रति अगाध श्रद्धा इस पाठ की सबसे मुख्य शर्तें हैं।

कंठस्थ करना श्रेष्ठ है, किंतु यदि याद न हो तो पुस्तक या स्क्रीन से देखकर भी शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ किया जा सकता है।

इसके नियमित पाठ से मानसिक संताप, नकारात्मक ऊर्जा, पाप कर्मों के प्रभाव और भाग्य संबंधी बाधाएँ दूर होती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। यह मार्गदर्शिका सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों, वैष्णव परंपराओं और प्रामाणिक स्तोत्र संग्रहों के अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की सुविधा के लिए इसमें शुद्ध देवनागरी पाठ, पदच्छेद, शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत किए गए हैं ताकि हर साधक इसका लाभ उठा सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)
  • विष्णु पुराण एवं संबंधित स्तोत्र ग्रंथ
  • आदि शंकराचार्य कृत स्तोत्र संग्रह
  • पारंपरिक सनातन कर्मकांड एवं स्तोत्र पाठ पद्धतियाँ

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!