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वृन्दावन के ओ बांके बिहारी हमसे पर्दा करो ना मुरारी (Vrindavan Ke Banke Bihari Hamse Parda Na Karo Lyrics in Hindi) - Shyam Bhajan Tara Devi - Bhaktilok

202 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"वृन्दावन के ओ बांके बिहारी हमसे पर्दा करो ना मुरारी" सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन है। यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के 'बांके बिहारी' स्वरूप को समर्पित है, जो अपने भक्तों के साथ अत्यंत मधुर, वात्सल्य और सख्य भाव का संबंध रखते हैं। इस भजन में भक्त और भगवान के बीच के अनन्य प्रेम, विरह, और अधिकार भाव को दर्शाया गया है। वृन्दावन की पावन भूमि पर बांके बिहारी मंदिर में विग्रह के आगे बार-बार पर्दा डालने की जो अनूठी परंपरा है, यह भजन उसी दिव्य लीला पर आधारित है। जब एक भक्त अपने आराध्य के दर्शन के लिए व्याकुल होता है, तो वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि वे अपने और भक्त के बीच से माया और संकोच का पर्दा हटा दें। सुप्रसिद्ध भजन गायिका तारा देवी जी द्वारा गाए गए इस भजन में समर्पण और करुणा का ऐसा अद्भुत मिश्रण है जो हर साधक के हृदय को झंकृत कर देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ वृन्दावन के ओ बांके बिहारी हमसे पर्दा करो ना मुरारी ॥

(कोरस / मुखड़ा)
वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी।
हमसे पर्दा करो ना मुरारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥
वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥

(अंतरा - १)
तुमने पर्दा किया जो हमसे, हम भी पर्दा करेंगे तुमसे।
फिर न कहना कि आये नहीं तुम, हम भी छुप जायेंगे कहीं पे॥
वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥

(अंतरा - २)
तेरी सूरत है प्यारी-प्यारी, तेरी लीला है न्यारी-न्यारी।
हम तो आये हैं शरण तिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥
वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥

(अंतरा - ३)
तुम तो भक्तों के प्राण-प्यारे, दीन-दुखियों के तुम हो सहारे।
हम तो दासी हैं जनम-जनम की, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥
वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥

(अंतरा - ४)
बांके बिहारी लाल की जय हो, कुंज बिहारी लाल की जय हो।
हमसे पर्दा करो ना मुरारी, वृन्दावन के ओ बांके बिहारी॥
हमसे पर्दा करो ना मुरारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस मधुर भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और मर्मस्पर्शी है। यहाँ 'पर्दा' केवल एक भौतिक कपड़ा नहीं है, बल्कि यह जीव (भक्त) और ब्रह्म (ईश्वर) के बीच की दूरी, अज्ञान और माया का प्रतीक है। भक्त अपने आराध्य बांके बिहारी से बड़े ही लाड़ और अधिकार के साथ कहता है कि "हे मुरारी! हम तो आपके अपने हैं, फिर हमसे यह पर्दा कैसा? हमसे यह दूरी मत बनाओ।"

भजन के पहले अंतरे में भक्त की मीठी मनुहार और प्रेममयी धमकी है। भक्त कहता है कि यदि आपने हमसे मुख मोड़ा या पर्दा किया, तो हम भी आपसे विमुख हो जाएंगे और अपनी भक्ति को छुपा लेंगे। यह गोपी-भाव की पराकाष्ठा है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई औपचारिकता नहीं रह जाती। दूसरे और तीसरे अंतरे में प्रभु की अनुपम छवि और उनकी शरणागति का वर्णन है। भक्त स्वीकार करता है कि प्रभु की सूरत अत्यंत मनमोहक है और वे ही इस संसार में दीन-दुखियों के एकमात्र सहारे हैं। अंत में, भक्त स्वयं को जन्म-जन्मांतर की दासी या सेवक घोषित कर पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह ब्रज की रस-उपासना का जीवंत दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • रागात्मक भक्ति का प्रकटीकरण: इसमें शांत या ऐश्वर्य भाव के स्थान पर माधुर्य और सख्य भाव की प्रधानता है, जो वैष्णव संप्रदाय की मुख्य विशेषता है।
  • बांके बिहारी मंदिर की परंपरा से जुड़ाव: वृन्दावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी को लगातार एकटक देखने से बचाने के लिए हर कुछ सेकंड में पर्दा खींचा जाता है। मान्यता है कि यदि कोई भक्त ठाकुर जी की आंखों में लगातार प्रेम से देखे, तो ठाकुर जी उसके प्रेम के वशीभूत होकर उसके साथ ही चल देते हैं। यह भजन इसी दिव्य लीला को रेखांकित करता है।
  • तारा देवी जी का सुमधुर स्वर: इस भजन को अपनी शास्त्रीय और लोक शैली के अनूठे संगम से सजाकर तारा देवी जी ने इसे जन-जन का कंठहार बना दिया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण की एक विशेष विधि और अनुकूल समय है:

  • सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन सुबह की मंगला आरती के समय या संध्या कालीन सत्संग के दौरान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • विशेष अवसर: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली, और विशेष रूप से जब आप वृन्दावन धाम की यात्रा पर हों या घर में राधा कृष्ण भजन संध्या का आयोजन कर रहे हों, तब इसका गायन अवश्य करना चाहिए।
  • गायन की विधि: इसे गाते समय मन में यह भाव होना चाहिए कि हम साक्षात बांके बिहारी के सम्मुख खड़े हैं। हाथों से ताली बजाते हुए और झूमते हुए गाने से मन में सात्विक तरंगों का संचार होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के 'बांके बिहारी' रूप को समर्पित है। बांके बिहारी जी का विग्रह स्वामी हरिदास जी की साधना और संगीत के प्रभाव से निधिवन में प्रकट हुआ था। स्वामी हरिदास जी संगीत सम्राट तानसेन के गुरु थे और सखी भाव से भगवान की उपासना करते थे। इस भजन में उसी सखी भाव और कुंज-बिहारी की लीलाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि ब्रज मंडल की लोक-संस्कृति और रस-परंपरा से प्रेरित है। सदियों से ब्रज के संतों ने भगवान को अपने परिवार का सदस्य, सखा या प्रियतम माना है। जब भक्त मंदिर जाता है और उसे क्षण भर के दर्शन के बाद पर्दे के पीछे छुपा दिया जाता है, तो उसके हृदय में जो तड़प पैदा होती है, उसी तड़प ने इस कालजयी भजन का रूप लिया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और ब्रजभाषा के पुट वाली खड़ी बोली हिंदी है। इसकी काव्य शैली 'संवाद शैली' (Conversational Style) है, जिसमें भक्त सीधे अपने आराध्य से बात कर रहा है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। "प्यारी-प्यारी" और "न्यारी-न्यारी" जैसे शब्दों का दोहराव भजन की गेयता (singability) को अत्यधिक बढ़ा देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सीख देता है:

  1. अहंकार का त्याग: जब तक हमारे भीतर 'मैं' और 'मेरा' का पर्दा रहेगा, तब तक हम परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकते।
  2. अनन्य शरणागति: संसार के सभी रिश्तों से ऊपर उठकर भगवान को अपना सर्वस्व मानना ही सच्ची भक्ति है।
  3. धैर्य और व्याकुलता: ईश्वर प्राप्ति के लिए मन में तड़प और व्याकुलता का होना अनिवार्य है, जैसे भक्त पर्दे के हटने का इंतजार करता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बांके बिहारी तीन जगह से टेढ़े (त्रिभंग ललित) और आनंद देने वाले श्रीकृष्ण का वह रूप जो भक्तों के प्रेम में झुका रहता है।
मुरारी मुर नामक दैत्य के शत्रु अज्ञान और अंधकार रूपी असुर का संहार करने वाले प्रभु।
पर्दा ओट, आवरण या घूंघट माया, अज्ञान और जीव-ब्रह्म के बीच का अंतर।
शरण तिहारी आपकी शरण में आना पूर्ण आत्मसमर्पण (प्रपत्ति)।
दासी सेविका या अनन्य भक्त अहंकार शून्य होकर प्रभु की सेवा में समर्पित होना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "वृन्दावन के ओ बांके बिहारी, हमसे पर्दा करो ना मुरारी।"
भावार्थ: हे वृन्दावन के कुंजों में विहार करने वाले नटखट बांके बिहारी! आप तो घट-घट वासी हैं, फिर आप हमसे अपने स्वरूप को क्यों छुपा रहे हैं? हमसे यह दूरी मत बनाइए।

पंक्ति: "तुमने पर्दा किया जो हमसे, हम भी पर्दा करेंगे तुमसे।"
भावार्थ: यहाँ भक्त का मान-भाव प्रकट होता है। भक्त कहता है कि यदि आप हमसे दूर भागेंगे, तो हम भी अपनी भक्ति को समेट लेंगे। यह भक्त का भगवान पर अनोखा अधिकार है।

पंक्ति: "तेरी सूरत है प्यारी-प्यारी, तेरी लीला है न्यारी-न्यारी।"
भावार्थ: आपकी यह त्रिभंग ललित मुद्रा और मनमोहक मुस्कान इतनी सुंदर है कि इसे देखे बिना भक्त का मन नहीं भरता। आपकी लीलाएं बुद्धि से परे और अद्भुत हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

बांके बिहारी जी की आराधना करते समय इस प्रसिद्ध श्लोक का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं,
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम वृन्दावन के ओ बांके बिहारी हमसे पर्दा करो ना मुरारी
मुख्य आराध्य भगवान श्री बांके बिहारी जी (श्रीकृष्ण)
मुख्य गायिका तारा देवी (Shyam Bhajan Tara Devi)
भाषा सरल हिंदी एवं ब्रजभाषा का मिश्रण
भक्ति भाव माधुर्य भाव, सख्य भाव, समर्पण
उपयुक्त अवसर दैनिक संध्या आरती, जन्माष्टमी, ब्रज यात्रा, सत्संग
श्रेणी श्याम भजन, राधा कृष्ण भजन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन पारंपरिक रूप से कई कलाकारों द्वारा गाया गया है, लेकिन तारा देवी (Tara Devi) जी के स्वर में गाया गया संस्करण भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, बांके बिहारी जी के नयन अत्यंत कटीले और सम्मोहक हैं। यदि कोई भक्त उनकी आंखों में लगातार एकटक देखता है, तो ठाकुर जी उसके प्रेम के वशीभूत होकर मंदिर छोड़कर उसके साथ चले जाते हैं। इसी अनिष्ट से बचने और ठाकुर जी को विश्राम देने के लिए बार-बार पर्दा डाला जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से 'पर्दा' मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, अज्ञान, वासना और माया का प्रतीक है जो उसे ईश्वर के वास्तविक दर्शन करने से रोकता है।

यह भजन मुख्य रूप से श्याम भजन और राधा कृष्ण भजन की श्रेणी में आता है।

हाँ, इस भजन को आप अपने घर के मंदिर में लड्डू गोपाल या राधा-कृष्ण के विग्रह के सामने अत्यंत श्रद्धापूर्वक गा सकते हैं। इससे घर का वातावरण भक्तिमय और सकारात्मक बनता है।

बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपनी संगीत साधना से वृन्दावन के पावन 'निधिवन' में किया था।

इस भजन के श्रवण से मानसिक शांति मिलती है, मन का तनाव दूर होता है और साधक के भीतर भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण का भाव जाग्रत होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के बोल, भावार्थ और ऐतिहासिक संदर्भों को वैष्णव ग्रंथों, ब्रज की लोक-परंपराओं और प्रामाणिक संकीर्तन संग्रहों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक सामग्री पहुंचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (रासपंचाध्यायी प्रसंग)
  • स्वामी हरिदास जी का जीवन चरित्र और अष्टछाप साहित्य
  • श्री बांके बिहारी मंदिर, वृन्दावन की आधिकारिक दर्शन नियमावली एवं परंपराएं

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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