Parvati Stotram

मैया भवन में कैसे आऊ तेरा शेर खड़ा पेहरे पे भजन इन हिंदी लिरिक्स

123 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में देवी भगवती की आराधना के लिए गाए जाने वाले भजनों का एक विशिष्ट स्थान है। "मैया भवन में कैसे आऊ तेरा शेर खड़ा पेहरे पे" एक ऐसा ही अत्यंत लोकप्रिय, मधुर और भावपूर्ण भजन है, जो मुख्य रूप से देवी दुर्गा (आदि शक्ति) के प्रति समर्पित है। इस भजन में एक भक्त की बाल-सुलभ सरलता, निश्छल प्रेम और वात्सल्य भाव का जीवंत चित्रण मिलता है। भक्त अपनी असमर्थता और कोमलता को प्रकट करते हुए माता से पुकार करता है कि वह स्वयं आगे बढ़कर उसे अपनी शरण में ले लें, क्योंकि माता का वाहन सिंह (शेर) द्वार पर रक्षक के रूप में खड़ा है। यह भजन न केवल सुर और ताल की दृष्टि से कर्णप्रिय है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन में आने वाली बाधाओं (जैसे अहंकार और भय) को दूर करने की प्रार्थना भी है। नवरात्र, माता की चौकी, और जगराता जैसे पावन अवसरों पर इस भजन का गायन भक्तों को भाव-विभोर कर देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे।

मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे।
शेर खड़ा पहरे पे, मैया शेर खड़ा पहरे पे...
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥

छोटी छोटी पिंडलियां मैया, कैसे चढ़ी जाऊँ।
मैया गोदी में उठा ले, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे...

छोटे छोटे हाथ मैया, कैसे ताली बजाऊँ।
मैया ताली बजवा ले, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे...

छोटी छोटी आँखें मैया, कैसे दर्शन पाऊँ।
मैया नैनन में समा जा, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे...

छोटे छोटे पाँव मैया, कैसे चलकर आऊँ।
मैया राह दिखा दे, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे...

छोटे छोटे होंठ मैया, कैसे महिमा गाऊँ।
मैया कंठ में समा जा, तेरा शेर खड़ा पहरे पे॥
मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक और साध्य के बीच के मधुर संबंध को दर्शाता है। यहाँ भक्त स्वयं को एक अबोध बालक के रूप में प्रस्तुत करता है, जो अपनी माता के पास जाने के लिए व्याकुल है। आध्यात्मिक दृष्टि से, "भवन" मोक्ष या भगवद्-धाम का प्रतीक है, और "शेर" उस माया, भय या सांसारिक विघ्नों का प्रतीक है जो साधक को ईश्वर की ओर बढ़ने से रोकते हैं।

भक्त कहता है कि हे माता! मैं अत्यंत दुर्बल और अज्ञानी हूँ। मेरे पास न तो इतनी शक्ति है कि मैं इस कठिन मार्ग पर चल सकूँ, और न ही मेरे पास वह ज्ञान है जिससे मैं तुम्हारे सिंह रूपी पहरेदार (जो कि काल, कर्म और माया का प्रतीक है) को पार कर सकूँ। इसलिए, हे करुणामयी माँ! तुम स्वयं ही आगे बढ़कर मुझे अपनी गोदी में उठा लो। जब माँ स्वयं अपने बच्चे को गोद में ले लेती है, तो संसार का कोई भी भय या विघ्न उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता। यह पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) का उच्चतम शिखर है, जहाँ भक्त अपने सारे प्रयास छोड़कर केवल और केवल भगवद्-कृपा पर आश्रित हो जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की लोकप्रियता और आध्यात्मिक गहराई के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं:

  • बाल-भाव (वात्सल्य रस): इस भजन में भक्त का भगवान के साथ 'पुत्र-माता' का संबंध स्थापित होता है। यह भाव साधक के भीतर से अहंकार को पूर्णतः समाप्त कर देता है।
  • सिंह का प्रतीकात्मक अर्थ: माँ दुर्गा का वाहन सिंह शौर्य, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक है। परंतु एक साधारण जीव के लिए यह सिंह संसार के भय और प्रारब्ध कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है। भजन में सिंह का पहरा इस बात को दर्शाता है कि बिना माँ की इच्छा के कोई भी उनके दिव्य धाम में प्रवेश नहीं कर सकता।
  • कृपा की याचना: भजन के प्रत्येक अंतरे में भक्त अपनी इंद्रियों (हाथ, पैर, आँखें, कंठ) की सीमाओं को स्वीकार करता है और प्रार्थना करता है कि माता स्वयं उसकी इंद्रियों को अपनी सेवा में नियुक्त करें।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए प्रत्येक क्षण शुभ है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • नवरात्रि महोत्सव: आश्विन और चैत्र मास के नवरात्रों के दौरान इस भजन का गायन विशेष रूप से किया जाता है। इस समय वातावरण में देवी शक्ति का संचार होता है।
  • माता की चौकी और जगराता: पारिवारिक मंगल कार्यों, गृह प्रवेश या मन्नत पूरी होने पर आयोजित होने वाले देवी जागरणों में इस भजन को सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  • दैनिक संध्या आरती: घर के मंदिर में संध्या काल की पूजा के समय इस भजन को गाकर माता के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की जा सकती है।
  • गायन की विधि: इसे ढोलक, मंजीरे और चिमटे की थाप पर ऊंचे स्वर और आनंदमयी मुद्रा में गाना चाहिए। सामूहिक गायन के समय जब सभी भक्त एक स्वर में "मैया भवन में कैसे आऊँ" गाते हैं, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन आदि शक्ति माँ दुर्गा को समर्पित है। सनातन परंपरा में माँ दुर्गा को संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी, दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों को अभय वरदान देने वाली माना गया है। इस भजन में माँ के ममतामयी रूप की आराधना की गई है।

यद्यपि इस भजन के मूल रचयिता का नाम अज्ञात है और यह लोक-परंपरा (Folk Tradition) के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम तक पहुँचा है, परंतु इसकी रचना शैली उत्तर भारत के महान संत-कवियों की भक्ति-धारा से अत्यधिक प्रभावित है। संतों ने हमेशा ईश्वर को माता के रूप में पूजने पर बल दिया है, क्योंकि माता का हृदय अपने बच्चों के प्रति सदैव क्षमाशील और करुणामयी होता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन उत्तर भारतीय लोक संगीत और सुगम संगीत की अमूल्य धरोहर है। इसकी पृष्ठभूमि जम्मू स्थित सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री माता वैष्णो देवी के भवन से प्रेरित प्रतीत होती है। वैष्णो देवी की कठिन चढ़ाई और वहाँ की प्राकृतिक गुफा के द्वार पर पहरा देते हुए लांगुर (सिंह) की लोक-मान्यताओं को इस भजन में बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है। सदियों से भक्त जब जम्मू की पहाड़ियों पर चढ़ते थे, तो वे अपनी थकान मिटाने और माता के प्रति अपनी व्याकुलता को व्यक्त करने के लिए ऐसे सरल गीतों की रचना करते थे। समय के साथ यह गीत संपूर्ण भारत में देवी भक्तों का कंठहार बन गया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा और पंजाबी लोक-शैली का प्रभाव भी दिखाई देता है। इसकी काव्य शैली में निम्नलिखित विशेषताएं द्रष्टव्य हैं:

  • पुनरावृत्ति (Refrain): "तेरा शेर खड़ा पहरे पे" पंक्ति की बार-बार पुनरावृत्ति भजन में एक सुंदर लय और प्रवाह उत्पन्न करती है, जिससे श्रोता सहज ही मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
  • संवादात्मक शैली: भजन ऐसा प्रतीत होता है मानो भक्त सीधे अपनी मैया से बात कर रहा हो। यह आत्मीयता भक्ति को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है।
  • बिंब विधान: "छोटी-छोटी पिंडलियां", "छोटे-छोटे हाथ" जैसे शब्दों के प्रयोग से एक छोटे बालक का अत्यंत सजीव बिंब (Image) आँखों के सामने उपस्थित हो जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक पारंपरिक गीत नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश देता है:

  1. अहंकार का त्याग: जब तक मनुष्य के भीतर यह अहंकार रहता है कि "मैं अपने बल पर ईश्वर को पा सकता हूँ", तब तक वह ईश्वर से दूर रहता है। अपनी सीमाओं को स्वीकार करना ही समर्पण की पहली सीढ़ी है।
  2. भय पर विजय: शेर का भय तभी तक है जब तक हम माँ की शरण से दूर हैं। जैसे ही हम माँ की ओर कदम बढ़ाते हैं, वह शेर भी हमारे लिए मार्ग प्रशस्त कर देता है।
  3. इंद्रियों का दिव्यीकरण: भजन हमें सिखाता है कि हमें अपनी आँखों से केवल ईश्वर के दर्शन करने चाहिए, कंठ से उनकी महिमा गानी चाहिए और हाथों से उनकी सेवा (ताली बजाना) करनी चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
भवन माता का मंदिर / धाम मोक्ष या परमपद की अवस्था
शेर सिंह (माता का वाहन) संसार की बाधाएं, अहंकार और काल का भय
पिंडलियां पैर के पीछे का हिस्सा (जंघा) साधक की शारीरिक और मानसिक सीमाएं
नैनन आँखें / नेत्र अंतर्दृष्टि या दिव्य चक्षु
कंठ गला / आवाज वाणी की शुद्धता और नाम-स्मरण
पहरे पे द्वार की रक्षा करना ईश्वरीय विधान और मर्यादा का पालन

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "मैया भवन में कैसे आऊँ, तेरा शेर खड़ा पहरे पे..."
भावार्थ: हे माँ! मैं तुम्हारे परम पावन धाम में आने के लिए लालायित हूँ, परंतु तुम्हारे द्वार पर जो महाबली सिंह पहरा दे रहा है, उसे देखकर मेरा मन भयभीत हो जाता है। मैं इस मायावी संसार के बंधनों को पार करके तुम्हारे पास कैसे पहुँचूँ?

पंक्ति: "छोटी छोटी पिंडलियां मैया, कैसे चढ़ी जाऊँ। मैया गोदी में उठा ले..."
भावार्थ: हे जननी! मेरे पैर बहुत छोटे और कमजोर हैं, और तुम्हारे भवन का मार्ग अत्यंत दुर्गम और चढ़ाई वाला है। मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है। इसलिए तुम स्वयं ही अपनी असीम करुणा से मुझे अपनी गोदी में उठा लो ताकि मैं सहज ही तुम्हारे पास पहुँच सकूँ।

पंक्ति: "छोटे छोटे हाथ मैया, कैसे ताली बजाऊँ। मैया ताली बजवा ले..."
भावार्थ: मेरे हाथ बहुत छोटे हैं, मैं तुम्हारी प्रसन्नता के लिए कैसे संकीर्तन करूँ? तुम स्वयं ही मेरे हाथों को हिलाकर मुझसे ताली बजवा लो, अर्थात मेरी क्रियाओं को अपनी सेवा में समर्पित करवा लो।

पंक्ति: "छोटी छोटी आँखें मैया, कैसे दर्शन पाऊँ। मैया नैनन में समा जा..."
भावार्थ: मेरी इन चर्म-चक्षुओं की सीमाएं हैं, इनसे मैं तुम्हारे विराट और दिव्य रूप के दर्शन कैसे करूँ? हे माँ! तुम स्वयं ही मेरी आँखों की ज्योति बनकर मेरे हृदय और नैनों में समा जाओ ताकि मैं जहाँ भी देखूँ, मुझे केवल तुम ही दिखाई दो।

पंक्ति: "छोटे छोटे पाँव मैया, कैसे चलकर आऊँ। मैया राह दिखा दे..."
भावार्थ: इस संसार रूपी अंधकारमय मार्ग पर चलने के लिए मेरे पैर बहुत छोटे हैं और मुझे सही दिशा का ज्ञान नहीं है। हे माँ! तुम स्वयं ज्ञान का प्रकाश फैलाकर मुझे सन्मार्ग (सही राह) दिखाओ।

पंक्ति: "छोटे छोटे होंठ मैया, कैसे महिमा गाऊँ। मैया कंठ में समा जा..."
भावार्थ: मेरी वाणी अपवित्र और सीमित है, मैं तुम्हारी अनंत महिमा का गान करने में असमर्थ हूँ। हे माँ सरस्वती रूपी दुर्गे! तुम स्वयं मेरे कंठ में विराजमान हो जाओ ताकि मेरी वाणी से निकलने वाला प्रत्येक शब्द तुम्हारी स्तुति बन जाए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए माता दुर्गा के इस परम कल्याणकारी मंत्र का जाप करना चाहिए, जो शरणागति के महत्व को दर्शाता है:

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। तुम कल्याणदायिनी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरण देने योग्य, तीन नेत्रों वाली गौरी हो, तुम्हें नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम मैया भवन में कैसे आऊँ तेरा शेर खड़ा पहरे पे
मुख्य देवी-देवता माँ दुर्गा / आदि शक्ति / वैष्णो देवी
भजन का भाव वात्सल्य भाव, आत्म-समर्पण, बाल-भाव
भाषा सरल हिंदी (लोक शैली)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता का जगराता, चौकी, दैनिक पूजा
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम, चिमटा
आध्यात्मिक संदेश अहंकार का त्याग और पूर्ण शरणागति से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से माँ दुर्गा (आदि शक्ति) को समर्पित है। भक्त इसे विशेष रूप से माँ वैष्णो देवी और शेरावाली माता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए गाते हैं।

आध्यात्मिक रूप से, "शेर" सांसारिक बाधाओं, मनुष्य के भीतर के अहंकार, भय और प्रारब्ध कर्मों का प्रतीक है जो जीवात्मा को परमात्मा (माँ दुर्गा) के पास जाने से रोकते हैं।

इस भजन को गाने के लिए नवरात्रि का समय, माता की चौकी, जगराता या दैनिक संध्या आरती का समय अत्यंत उत्तम और फलदायी माना जाता है।

इसका मुख्य संदेश यह है कि जब मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार कर पूरी तरह से भगवान की शरण में चला जाता है (शरणागति), तो भगवान स्वयं आगे बढ़कर उसकी रक्षा करते हैं और उसे अपनी गोद में स्थान देते हैं।

हाँ, यह भजन अपनी सरल भाषा और बाल-भाव के कारण बच्चों के लिए अत्यंत उपयोगी है। इससे बच्चों में ईश्वर के प्रति प्रेम, आदर और अच्छे संस्कारों का विकास होता है।

यह एक पारंपरिक लोक भजन है, जिसके मूल रचयिता का नाम अज्ञात है। यह मौखिक परंपरा और विभिन्न संकीर्तन मंडलियों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा है।

इसका अर्थ है कि जब भक्त सांसारिक कठिनाइयों से थक जाता है, तो वह माता से प्रार्थना करता है कि वे अपनी असीम कृपा (गोदी) प्रदान कर उसे भवसागर से पार उतार दें।

इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण निष्छलता, दीनता (नम्रता) और एक छोटे बच्चे जैसा निश्छल प्रेम भाव रखना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म की प्रामाणिक व्याख्याओं, लोक-परंपराओं और संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को न केवल भजन के शब्द प्रदान करना है, बल्कि उनके पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थों से भी अवगत कराना है ताकि उनकी साधना और भक्ति अधिक फलदायी हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - देवी महिमा और शरणागति प्रसंग।
  • पारंपरिक उत्तर भारतीय लोक भजन संग्रह एवं संकीर्तन परंपरा।
  • श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की आधिकारिक लोक-कथाएं और मान्यताएं।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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