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मेरो मन है गयो लटा पटा लिरिक्स भजन ( MERO MANN HAI GAYO LATA PATA Lyrics in Hindi ) - Shyam Bhajan - Bhaktilok

172 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मेरो मन है गयो लटा पटा लिरिक्स भजन ( MERO MANN HAI GAYO LATA PATA Lyrics in Hindi )

ब्रज भूमि के कण-कण में रमे बांके बिहारी लाल की मोहक छवि और मनमोहक लीलाओं का गुणगान करता यह लोकप्रिय श्याम भजन 'मेरो मन है गयो लटा पटा' (Mero Mann Hai Gayo Lata Pata) भक्तों के हृदय में विशेष स्थान रखता है। भगवान श्री कृष्ण के सौन्दर्य, उनके मस्तक पर सुशोभित मोर मुकुट, अधरों पर सजी बंसी और उनकी टेढ़ी चितवन पर जब एक भक्त मुग्ध हो जाता है, तो उसकी यही मनोदशा इस भजन के माध्यम से सजीव हो उठती है। 'लटा पटा' शब्द ब्रजभाषा का एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण प्रयोग है, जिसका अर्थ है—मन का पूरी तरह उलझ जाना, सुध-बुध खो बैठना और बांके बिहारी के प्रेम में विभोर हो जाना। इस भजन में बांके बिहारी के दर्शन की लालसा, यमुना तट पर हुई लीलाओं का स्मरण तथा उनके अलौकिक स्वरूप का ऐसा सजीव वर्णन मिलता है जो किसी भी श्रोता को भक्ति के सागर में गोता लगाने के लिए विवश कर देता है। यह भजन विशेष रूप से बांके बिहारी मंदिर वृंदावन, जन्माष्टमी उत्सव, श्री राधाष्टमी, और विभिन्न संकीर्तन कार्यक्रमों में अत्यंत प्रेम के साथ गाया जाता है। इसे स्मरण करने से मन को असीम शांति और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य भक्ति की प्राप्ति होती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

बांके बिहारी की देख छटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा।
कब से खोजूं बनवारी को,
बनवारी को गिरिधारी को।
कोई बता दे उसका पता,
मेरो मन है गयो लटा पटा॥

मोर मुकुट श्यामल तन धारी,
कर मुरली अधरन सजी प्यारी।
कमर में बांदे पीला पटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा॥

पनिया भरन यमुना तट आई,
बीच में मिल गए कृष्ण कन्हाई।
फोर दियो पानी को घटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा॥

टेडी नज़रें लट घुंघराली,
मार रही मेरे दिल पे कटारी।
और श्याम वरन जैसे कारी घटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा॥

मिलते हैं उसे बांके बिहारी,
बांके बिहारी सनेह बिहारी।
राधे राधे जिस ने रटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा॥

बांके बिहारी की देख छटा,
मेरो मन है गयो लटा पटा।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अनन्य प्रेम, आकर्षण और विरह-मिलन की सुंदर भावनाओं को व्यक्त करता है। 'लटा पटा' होना अर्थात भगवान के रूप-लावण्य में ऐसा उलझ जाना कि अपनी सुध-बुध ही न रहे। भक्त कहता है कि जब मैंने वृंदावन के बांके बिहारी लाल की उस अलौकिक और मनमोहक छटा को देखा, तो मेरा चंचल मन पूरी तरह से उन्हीं में उलझकर रह गया है। भक्त पूरे ब्रजमंडल में अपने इष्ट बनवारी, गिरिधारी को ढूंढ रहा है और हर आने-जाने वाले से उनका पता पूछ रहा है, क्योंकि उनके बिना मन व्याकुल है।

आगे के अंतरे में भगवान के श्रृंगार का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया गया है। उनके मस्तक पर मोर मुकुट सुशोभित है, उनका शरीर श्यामल (मेघ के समान सांवला) है, उनके अधरों (होंठों) पर बांसुरी बहुत प्यारी लग रही है और कमर में पीतांबर (पीला वस्त्र) बंधा हुआ है। इस अद्भुत रूप को देखकर भक्त का मन सुध-बुध खो बैठता है। यमुना तट की लीला का स्मरण करते हुए भक्त गोपियों के माध्यम से कहता है कि जब वे पानी भरने यमुना घाट गईं, तो बीच मार्ग में कृष्ण कन्हाई ने उनकी मटकी फोड़ दी और पानी की घटा फैला दी। इस नटखट लीला ने भी भक्त के मन को मोह लिया है।

भगवान की टेढ़ी नजरें (बांकी चितवन), माथे पर लटकती घुंघराली लटें और सावन की कारी घटा के समान उनका सांवला वर्ण भक्त के हृदय पर प्रेम की कटार चला रहा है। अंत में भजन का सबसे महत्वपूर्ण और दार्शनिक संदेश यह है कि बांके बिहारी, जो प्रेम के भंडार हैं, केवल उसी को प्राप्त होते हैं जिसने निरंतर 'राधे राधे' का नाम जपा है। राधा नाम के स्मरण मात्र से भगवान रीझ जाते हैं और भक्त का मन उनके चरणों में स्थायी रूप से रम जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और ब्रज संस्कृति से इसकी गहरी जुड़ाव है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निश्छल प्रेम (मधुर भाव भक्ति) की पराकाष्ठा है। इसमें बांके बिहारी के रूप-सौंदर्य का ऐसा जीवंत वर्णन किया गया है कि श्रोता की आंखों के सामने वृंदावन के निधिवन या बांके बिहारी मंदिर का प्रांगण जीवंत हो उठता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह भजन पुष्टि मार्ग और गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की उन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भक्त अपने आराध्य को केवल भगवान नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व मानता है। इसे गाने और सुनने से मन का अहंकार और विचलित स्वभाव शांत होता है तथा भगवान के प्रति शरणागति का भाव जाग्रत होता है। नियमित रूप से ऐसे भजनों का संकीर्तन करने से घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष नियम या अनुष्ठान की अनिवार्यता नहीं होती, क्योंकि यह शुद्ध प्रेम भक्ति का मार्ग है। फिर भी, इसे पूरी तन्मयता के साथ गाने के लिए कुछ विशेष अवसरों और विधियों का पालन किया जा सकता है:

उचित समय: ब्रह्म बेला (प्रातःकाल) में या संध्यावंदन के पश्चात जब घर का वातावरण शांत हो, तब इस भजन का गान अत्यंत आनंददायक होता है। इसके अलावा एकादशी, जन्माष्टमी, गोपाष्टमी और होली के पावन अवसरों पर इसका विशेष महत्व है।

गायन विधि: इसे हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और करताल के साथ पारंपरिक ब्रज शैली में प्रेम भाव से गाया जा सकता है। भजन गाते समय भगवान बांके बिहारी की तस्वीर या विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित करना और पुष्प अर्पित करना भक्ति भाव को और अधिक प्रगाढ़ करता है। संकीर्तन मंडलों में इसे सामूहिक रूप से गाए जाने पर इसका आनंद द्विगुणित हो जाता है.

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के मुख्य आराध्य भगवान श्री बांके बिहारी (श्रीकृष्ण) हैं, जिनका मूल धाम वृंदावन है। बांके बिहारी लाल त्रिभंग मुद्रा में खड़े होते हैं, जो उनके इस भजन में वर्णित 'टेढ़ी नजरें' और मनमोहक स्वरूप को चरितार्थ करती है। साथ ही, इस भजन में राधा रानी ('राधे राधे जिस ने रटा') का स्मरण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सनातन परंपरा में राधा के बिना कृष्ण की कल्पना अधूरी मानी जाती है।

ब्रज के संतों और महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, स्वामी हरिदास जी जैसी विभूतियों ने इसी 'केलि भाव' और सख्य-वात्सल्य भक्ति को प्रचुरता से फैलाया है। स्वामी हरिदास जी वही संत हैं जिन्होंने अपनी तान से बांके बिहारी को प्रकट किया था। इस भजन में उसी हरिदासी परंपरा की सुगंध स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

'मेरो मन है गयो लटा पटा' भजन ब्रज की लोक परंपरा और पारंपरिक संकीर्तन शैली से उपजा एक अत्यंत लोकप्रिय पद है। इसे किसी एक विशेष रचनाकार के नाम से बांधना कठिन है क्योंकि लोक कथाओं और संकीर्तन परंपराओं में ऐसे पद पीढ़ियों से मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे हैं और समय-समय पर विभिन्न कलाकारों द्वारा इसमें स्थानीय भाव जोड़े गए हैं। आधुनिक समय में कई प्रसिद्ध भजन गायकों ने इसे अपने अनूठे अंदाज में रिकॉर्ड किया है, जिससे यह घर-घर में लोकप्रिय हो गया है।

इसकी पृष्ठभूमि विशुद्ध रूप से ब्रज की गोप-गोपियों की बाल लीलाओं, रासलीलाओं और बांके बिहारी के प्रति उनके अनन्य समर्पण पर आधारित है। ब्रज के लोकगीतों की लय और तर्ज पर रचे जाने के कारण यह तुरंत जुबान पर चढ़ जाता है और श्रोता को झूमने पर मजबूर कर देता है.

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ ब्रजभाषा और सरल हिंदी के मिश्रण से तैयार किया गया है। ब्रजभाषा की मिठास इस भजन की आत्मा है। 'लटा पटा', 'बनवारी', 'गिरिधारी', 'पीला पटा', 'घटा', 'कटारी' जैसे शब्दों का चयन इसके काव्य सौंदर्य को चार चांद लगाता है।

काव्य शैली की दृष्टि से इसमें रूपक और अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, 'श्याम वरन जैसे कारी घटा' में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है, जहाँ भगवान के सांवले शरीर की तुलना सावन की काली घटा से की गई है। यह भाषा आम जनमानस के हृदय को सरलता से छू लेती है और बिना किसी कठिन शब्दार्थ के भावों को सीधे संप्रेषित करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। यह सिखाता है कि मनुष्य का मन संसार की भौतिक वस्तुओं में उलझकर भटकता रहता है, लेकिन जब यह मन बांके बिहारी के चरणों में 'लटा पटा' (समर्पित) हो जाता है, तो उसे वास्तविक शांति की प्राप्ति होती है।

जीवन की आपाधापी और चिंताओं से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय ईश्वर के नाम का स्मरण है। भजन की अंतिम पंक्ति—'राधे राधे जिस ने रटा, मिलते हैं उसे बांके बिहारी'—यह स्पष्ट करती है कि नाम जप ही कलियुग में भवसागर से पार लगने की सबसे सरल और अचूक नौका है। अहंकार का त्याग करके जब भक्त पूरी तरह भगवान पर आश्रित हो जाता है, तभी उसे प्रभु के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है।

शब्द / वाक्यांश (Word / Phrase) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) संदर्भ / भाव (Context)
लटा पटा (Lata Pata) उलझ जाना, सुध-बुध खोना, मंत्रमुग्ध होना भगवान के रूप में मन का पूरी तरह खो जाना
बनवारी (Banwari) वन के स्वामी, श्री कृष्ण भगवान श्रीकृष्ण का एक प्रिय नाम
गिरिधारी (Giridhari) गोवर्धन पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण की महानता और रक्षक रूप का प्रतीक
पीला पटा (Peela Pata) पीतांबर, पीले रंग का वस्त्र श्रीकृष्ण की कमर पर बंधा वस्त्र
कारी घटा (Kari Ghata) काले रंग के बादल, सावन के बादल श्रीकृष्ण के सांवले और सुंदर शरीर की उपमा
सनेह बिहारी (Saneh Bihari) प्रेम के सागर, स्नेह बरसाने वाले भगवान का प्रेममय स्वरूप

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति 1: बांके बिहारी की देख छटा, मेरो मन है गयो लटा पटा।
अर्थ: भक्त कहता है कि वृंदावन के बांके बिहारी लाल की उस त्रिभंग मुद्रा और अद्भुत सौंदर्य-छवि को देखकर मेरा चंचल मन पूरी तरह से उन पर मोहित हो गया है और अब वह सामान्य स्थिति में नहीं रहा, बल्कि उन्हीं में उलझकर रह गया है।

पंक्ति 2: कब से खोजूं बनवारी को, बनवारी को गिरिधारी को। कोई बता दे उसका पता, मेरो मन है गयो लटा पटा॥
अर्थ: मैं अपने प्रियतम बनवारी और गोवर्धनधारी कृष्ण को बहुत समय से ढूंढ रहा हूं। यदि कोई मुझे उनका सही पता बता दे, तो मैं वहां पहुंच जाऊं, क्योंकि उनके बिना मेरा दिल बेचैन है और मेरा मन उन्हीं में रम गया है।

पंक्ति 3: मोर मुकुट श्यामल तन धारी, कर मुरली अधरन सजी प्यारी। कमर में बांदे पीला पटा...
अर्थ: जिनके मस्तक पर मोर का मुकुट सुशोभित है, जिनका शरीर सांवला और कोमल है, जिनके होंठों पर प्यारी सी मुरली सजी हुई है और कमर में पीला वस्त्र बंधा हुआ है—उस रूप पर मेरा मन पूरी तरह हार गया है।

पंक्ति 4: पनिया भरन यमुना तट आई, बीच में मिल गए कृष्ण कन्हाई। फोर दियो पानी को घटा...
अर्थ: गोपियां जब यमुना नदी के तट पर पानी भरने गईं, तो मार्ग में कृष्ण कन्हाई मिल गए और उन्होंने नटखटपन करते हुए पानी की मटकी (घटा) फोड़ दी। इस लीला ने भी मन को मोह लिया है।

पंक्ति 5: टेडी नज़रें लट घुंघराली, मार रही मेरे दिल पे कटारी। और श्याम वरन जैसे कारी घटा...
अर्थ: भगवान की वह टेढ़ी चितवन और माथे पर झूलती घुंघराली लटें मेरे हृदय पर प्रेम की कटार का काम कर रही हैं। उनका सांवला रंग सावन की काली घटा के समान अत्यंत आकर्षक है।

पंक्ति 6: मिलते हैं उसे बांके बिहारी, बांके बिहारी सनेह बिहारी। राधे राधे जिस ने रटा...
अर्थ: प्रेम के भंडार वे बांके बिहारी उसी को प्राप्त होते हैं, जो निरंतर सच्चे भाव से 'राधे राधे' का नाम रटता है। नाम स्मरण से ही प्रभु की कृपा प्राप्त होती है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक गहरा करने के लिए निम्नलिखित पावन महामंत्रों और श्लोकों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

महामंत्र:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"

राधा नाम मंत्र:
"श्री राधा कृष्णाय नमः"
"राधे राधेश्याम, राधे राधेश्याम।"

इन मंत्रों का प्रतिदिन जाप करने से मन शुद्ध होता है और बांके बिहारी के चरणों में अनन्य अनुराग उत्पन्न होता है.

भजन की जानकारी (Parameter) विवरण (Details)
भजन का नाम (Bhajan Name) मेरो मन है गयो लटा पटा (Mero Mann Hai Gayo Lata Pata)
आराध्य देवता (Presiding Deity) भगवान श्री बांके बिहारी / श्रीकृष्ण एवं राधा रानी
रचना परंपरा (Tradition) ब्रज लोक भजन एवं संकीर्तन परंपरा
भाषा (Language) ब्रजभाषा एवं सरल हिंदी
मुख्य भाव (Core Bhava) प्रेम, समर्पण, माधुर्य भाव एवं विरह
किस अवसर पर गाएं (Suitable Occasion) जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी, संकीर्तन और दैनिक पूजा
प्रमुख संदेश (Main Message) राधे नाम स्मरण और बांके बिहारी की शरणागति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के मुख्य आराध्य वृंदावन के प्रसिद्ध अधिष्ठाता भगवान श्री बांके बिहारी (श्रीकृष्ण) और श्री राधा रानी हैं।

ब्रजभाषा में 'लटा पटा' का अर्थ है—मन का पूरी तरह उलझ जाना, सुध-बुध खो देना और किसी के सौंदर्य या प्रेम में मंत्रमुग्ध हो जाना।

यह भजन ब्रज की लोक संगीत और संकीर्तन परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसे भक्तिकाल और आधुनिक समय में भी बांके बिहारी प्रेमियों द्वारा अत्यंत प्रेम से गाया जाता है।

इस भजन को आप दैनिक पूजा, संध्या आरती, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी या किसी भी सत्संग और संकीर्तन के दौरान गा सकते हैं।

भजन में उस प्रसंग का उल्लेख है जब गोपियां यमुना तट पर पानी भरने जाती हैं और कन्हाई उनकी मटकी फोड़कर अपनी नटखट लीला का प्रदर्शन करते हैं।

भजन के अनुसार, जो व्यक्ति सच्चे भाव से निरंतर 'राधे राधे' का नाम रटता है, उसे बांके बिहारी अवश्य प्राप्त होते हैं।

हाँ, इसे परिवार के साथ या संकीर्तन मंडली में ढोलक और मंजीरे के साथ सामूहिक रूप से गाने पर विशेष आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।

इसका मुख्य संदेश यह है कि सांसारिक मोह-माया को छोड़कर अपने मन को भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देना ही सच्ची भक्ति है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह मार्गदर्शिका और भजन लिरिक्स पाठ Bhaktilok के उच्च संपादकीय मानकों के तहत तैयार किया गया है। सामग्री में ब्रज संस्कृति, लोक संगीत परंपरा और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के मूल स्वरूप का विशेष ध्यान रखा गया है। यह सामग्री पाठकों को आध्यात्मिक संतुष्टि और प्रामाणिक जानकारी प्रदान करने के लिए समर्पित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री.

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

1. श्रीमद्भागवत महापुराण - १०वां स्कंध (कृष्ण लीला प्रसंग)
2. ब्रज के लोक गीत एवं संकीर्तन परंपरा (सांस्कृतिक संदर्भ)
3. गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के पद एवं कीर्तन ग्रंथ
4. पारंपरिक ब्रजभाषा शब्दावली एवं लोक साहित्यकोश

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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