Vishwakarma Puja

श्री विश्वकर्मा (Shree Vishwakarma) - Vishwakarma Bhajan - Bhaktilok

121 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन धर्म में भगवान श्री विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम शिल्पकार, वास्तुकार और दिव्य अभियंता (Divine Architect) माना गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में विश्वकर्मा सूक्त के माध्यम से उनकी महिमा का अद्भुत वर्णन मिलता है, जहां उन्हें संपूर्ण सृष्टि का सृजनकर्ता और परम नियंता कहा गया है। "श्री विश्वकर्मा भजन" (Shree Vishwakarma Bhajan) न केवल उनकी तकनीकी और रचनात्मक सर्वोच्चता को नमन करता है, बल्कि साधक के अंतर्मन में कर्मयोग, कौशल और सृजनात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है। यह भजन विशेष रूप से शिल्पकारों, अभियंताओं, कलाकारों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े साधकों के लिए अत्यंत पूजनीय है। इस पावन भजन के श्रवण और गायन से जीवन में बौद्धिक क्षमता, तकनीकी निपुणता, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। आइए, इस अत्यंत पावन और श्रद्धा से परिपूर्ण भजन के दिव्य लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक महत्व और शास्त्रीय संदर्भों का गहराई से अध्ययन करें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ श्री विश्वकर्मा भजन ॥

मुखड़ा:
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा, सुर नर मुनि सब करते सेवा।
तुम हो सकल सृष्टि के कर्ता, दुःख दारिद्र्य विपत्ति के हर्ता॥

अंतरा १:
आदि पुरुष तुम आदि विधाता, जग के पालन रक्षक दाता।
अद्भुत शिल्प कला तुम्हारी, वंदन करती दुनिया सारी॥
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा...

अंतरा २:
स्वर्ग लोक की रचना कीन्ही, देवराज को कीर्ति दीन्ही।
द्वारिका पुरी बसाई न्यारी, सुदामा की विपदा टारी॥
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा...

अंतरा ३:
लंकपुरी कंचन की बनाई, रावण की महिमा चमकाई।
जगन्नाथ का मंदिर सुंदर, शोभित है प्रभु जिसके अंदर॥
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा...

अंतरा ४:
यंत्र-तंत्र और शिल्प विज्ञाना, तुम्हारी कृपा से सबने जाना।
हाथ जोड़ हम शरण में आए, चरणों में हम शीश नवाए॥
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा...

अंतरा ५:
जो जन प्रेम सहित गुण गावे, सुख संपत्ति वो निश्चय पावे।
कष्ट मिटे भव बंधन छूटे, ज्ञान भक्ति का अमृत लूटे॥
जय जय श्री विश्वकर्मा देवा, सुर नर मुनि सब करते सेवा।
तुम हो सकल सृष्टि के कर्ता, दुःख दारिद्र्य विपत्ति के हर्ता॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भगवान विश्वकर्मा की दिव्य लीलाओं, उनकी असीम रचनात्मक शक्ति और उनके परोपकारी स्वरूप का सुंदर चित्रण करता है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि इस भौतिक जगत में जो कुछ भी निर्मित, सुव्यवस्थित और सुंदर है, वह सब भगवान विश्वकर्मा की ही चेतना का प्रकटीकरण है।

भजन के प्रारंभ में भक्त भगवान विश्वकर्मा को संपूर्ण सृष्टि का रचयिता स्वीकार करते हुए उनकी वंदना करता है। वह कहता है कि हे प्रभु! देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं। आप केवल भौतिक वस्तुओं के निर्माता नहीं हैं, बल्कि आप अपने भक्तों के जीवन से दुःख, दरिद्रता और संकटों का हरण करने वाले परम कृपालु देव हैं।

आगे के पदों में उनकी महान ऐतिहासिक और पौराणिक रचनाओं का उल्लेख है। स्वर्ग लोक का निर्माण, भगवान कृष्ण की दिव्य नगरी द्वारिका का सृजन, रावण की स्वर्णमयी लंका और पुरी के जगन्नाथ मंदिर का निर्माण—ये सभी उनकी असीम शिल्पकला के जीवंत उदाहरण हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि कर्म ही पूजा है। जब हम अपने कौशल और बुद्धि का उपयोग लोक कल्याण के लिए करते हैं, तो हम वास्तव में भगवान विश्वकर्मा की ही आराधना कर रहे होते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

भगवान विश्वकर्मा का यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह कर्मयोग (Yoga of Action) का एक उत्कृष्ट घोषणापत्र है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सृजनात्मकता का सम्मान: यह भजन मनुष्य के भीतर छिपी रचनात्मक प्रतिभा और कौशल को ईश्वर का वरदान मानता है।
  • ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ: इसमें द्वारिका, लंका और जगन्नाथ मंदिर जैसी महान दिव्य संरचनाओं का उल्लेख है, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।
  • शरणगति का भाव: भजन के माध्यम से भक्त अपनी कला और बुद्धि को भगवान के चरणों में समर्पित करता है, जिससे अहंकार का नाश होता है।
  • समृद्धि और प्रगति: मान्यता है कि इस भजन के नियमित पाठ से व्यापार, उद्योग, कला और तकनीकी क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

शुभ समय:

  • विश्वकर्मा पूजा (17 सितंबर): इस दिन देश भर के कारखानों, कार्यालयों और घरों में इस भजन का गायन अनिवार्य रूप से किया जाता है।
  • दैनिक सुबह की प्रार्थना: प्रतिदिन कार्य प्रारंभ करने से पहले इस भजन को सुनने या गाने से कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • औद्योगिक और तकनीकी अनुष्ठान: नए यंत्रों, वाहनों या गृह निर्माण के समय इस भजन का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

गायन विधि:

साधक को सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। अपने कार्यस्थल या पूजा घर में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें। अपने औजारों, यंत्रों या कलम-पुस्तकों की पूजा करें और पूर्ण श्रद्धा भाव से इस भजन का संकीर्तन करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री विश्वकर्मा को समर्पित है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, वे देवताओं के मुख्य वास्तुकार और पांचाल (लोहार, बढ़ई, स्वर्णकार, शिल्पकार और मूर्तिकार) समुदाय के आराध्य देव हैं। उन्हें भगवान विष्णु का अंश और ब्रह्मा जी का मानस पुत्र भी माना जाता है।

इस भजन की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। विभिन्न संतों और कवियों ने अपनी स्थानीय भाषाओं में भगवान विश्वकर्मा की स्तुति की है। इस भजन की सरल और सुबोध भाषा शैली इसे जन-जन का प्रिय बनाती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना लोक-परंपरा और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। इसकी पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और स्कंद पुराण से प्रेरित है। जब-जब देवताओं को दिव्य अस्त्रों (जैसे इंद्र का वज्र) या भव्य महलों की आवश्यकता हुई, तब-तब भगवान विश्वकर्मा ने अपनी अद्भुत कला से उनका सहयोग किया। यह भजन उन्हीं महान प्रसंगों को संजोकर लिखा गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान दिव्य शिल्पी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर सकें।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी में रचित है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का सुंदर समन्वय है। इसकी काव्य शैली 'चौपाई' और 'दोहा' प्रारूप से प्रभावित है, जिससे इसे गाना और याद रखना बेहद आसान हो जाता है। इसमें प्रयुक्त रूपक और उपमाएं (जैसे 'कंचन की लंका', 'द्वारिका पुरी न्यारी') श्रोता के मन में एक भव्य दृश्य बिंब का निर्माण करती हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

भगवान विश्वकर्मा का यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  • कर्म की महत्ता: यह हमें सिखाता है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। सृजन और निर्माण ही ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है।
  • विनम्रता: अपनी कला, ज्ञान और कौशल पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सब ईश्वर की ही देन है।
  • सकारात्मकता: कठिन परिस्थितियों में भी अपनी बुद्धि और कौशल का उपयोग करके नया मार्ग प्रशस्त करना चाहिए, जैसे सुदामा की दरिद्रता दूर करने के लिए प्रभु ने द्वारिका का निर्माण किया।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ और महत्व
सकल सृष्टि संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान विश्वकर्मा को पूरे ब्रह्मांड का रचयिता माना गया है।
शिल्प कला वास्तुकला और निर्माण कला उनकी अद्वितीय निर्माण और डिजाइनिंग क्षमता का प्रतीक।
विपदा टारी संकट दूर करना सुदामा की गरीबी दूर कर उन्हें महल प्रदान करने का प्रसंग।
कंचन सोना (स्वर्ण) सोने की लंका के निर्माण की ओर संकेत।
भव बंधन संसार के जन्म-मरण का चक्र आध्यात्मिक मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"जय जय श्री विश्वकर्मा देवा, सुर नर मुनि सब करते सेवा।"
हे देवों के देव विश्वकर्मा! आपकी सदा ही जय हो। देवता, मनुष्य और महान ऋषि-मुनि सभी आपके चरणों की सेवा करते हैं और आपकी वंदना करते हैं।

"तुम हो सकल सृष्टि के कर्ता, दुःख दारिद्र्य विपत्ति के हर्ता॥"
आप ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल निर्माता हैं। आप अपने भक्तों के जीवन से सभी प्रकार के दुखों, दरिद्रता और संकटों का समूल नाश करने वाले हैं।

"आदि पुरुष तुम आदि विधाता, जग के पालन रक्षक दाता।"
आप सृष्टि के प्रारंभ से विद्यमान आदि पुरुष हैं। आप ही इस संसार के पालनहार, रक्षक और परम दाता हैं।

"अद्भुत शिल्प कला तुम्हारी, वंदन करती दुनिया सारी॥"
आपकी निर्माण और शिल्प कला अत्यंत अद्भुत और अकल्पनीय है। संपूर्ण विश्व आपकी इस महान कलात्मकता के आगे नतमस्तक है।

"स्वर्ग लोक की रचना कीन्ही, देवराज को कीर्ति दीन्ही।"
आपने ही देवताओं के निवास स्थान स्वर्ग लोक का निर्माण किया और देवराज इंद्र को उनका वैभव और कीर्ति वापस दिलाई।

"द्वारिका पुरी बसाई न्यारी, सुदामा की विपदा टारी॥"
आपने भगवान श्री कृष्ण के लिए समुद्र के बीच भव्य द्वारिका नगरी बसाई और सुदामा की दरिद्रता को क्षण भर में दूर कर दिया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान विश्वकर्मा की पूजा के दौरान इस भजन के साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

॥ श्री विश्वकर्मा महामंत्र ॥

"ॐ देवशिल्पिने महावीर्याय धीमहि तन्नो विश्वकर्मा प्रचोदयात्॥"

अर्थ: हम उन परम प्रतापी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हैं, वे हमारी बुद्धि और कर्म को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम श्री विश्वकर्मा भजन (Shree Vishwakarma Bhajan)
आराध्य देव भगवान श्री विश्वकर्मा (देवशिल्पी)
मुख्य विषय सृष्टि निर्माण, शिल्पकला, कर्मयोग और समर्पण
भाषा सरल हिंदी (तत्सम युक्त)
गायन का उत्तम समय विश्वकर्मा पूजा, सुबह की प्रार्थना, कार्य प्रारंभ का समय
संबंधित पर्व विश्वकर्मा जयंती, कन्या संक्रांति

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा देवताओं के मुख्य शिल्पकार, वास्तुकार और ब्रह्मांड के प्रथम अभियंता हैं। उन्होंने ही स्वर्ग, द्वारिका, लंका और देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था।

विश्वकर्मा पूजा कब मनाई जाती है?

विश्वकर्मा पूजा प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति के दिन, मुख्य रूप से 17 सितंबर को मनाई जाती है। इस दिन औद्योगिक संस्थानों, कारखानों और तकनीकी कार्यालयों में विशेष पूजा का आयोजन होता है।

इस भजन को गाने से क्या लाभ होता है?

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से बुद्धि का विकास होता है, रचनात्मकता बढ़ती है, व्यापार और तकनीकी कार्यों में सफलता मिलती है तथा घर से दरिद्रता दूर होती है।

क्या छात्र भी इस भजन का पाठ कर सकते हैं?

हां, विशेष रूप से इंजीनियरिंग, वास्तुकला (Architecture), कला और विज्ञान के छात्रों के लिए इस भजन का पाठ उनकी एकाग्रता और रचनात्मक कौशल को बढ़ाने में सहायक होता है।

भगवान विश्वकर्मा ने किन प्रमुख नगरों का निर्माण किया था?

उन्होंने सत्ययुग में स्वर्ग लोक, त्रेतायुग में सोने की लंका, द्वापरयुग में द्वारिका नगरी और हस्तिनापुर (इंद्रप्रस्थ) तथा कलयुग में जगन्नाथ पुरी मंदिर का निर्माण किया था।

विश्वकर्मा पूजा की थाली में क्या होना चाहिए?

पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, दूर्वा, सुपारी, कलावा, फल, मिठाई, धूप-दीप और अपने कार्य से जुड़े मुख्य औजार या यंत्र होने चाहिए।

ऋग्वेद में विश्वकर्मा का क्या स्थान है?

ऋग्वेद के 10वें मंडल के सूक्त 81 और 82 में विश्वकर्मा को सर्वदृष्टा, सर्वज्ञाता और संपूर्ण सृष्टि का परम स्रष्टा बताया गया है।

क्या इस भजन को प्रतिदिन गाया जा सकता है?

हां, प्रतिदिन सुबह कार्य शुरू करने से पहले इस भजन का पाठ करने से कार्यक्षेत्र में सकारात्मकता और सफलता प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन और इसके दार्शनिक पक्षों का संकलन सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे ऋग्वेद, विष्णु पुराण और स्कंद पुराण के आधार पर किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध जानकारी पहुंचाना है ताकि वे कर्मयोग के वास्तविक महत्व को समझ सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ऋग्वेद: मंडल १०, सूक्त ८१ और ८२ (विश्वकर्मा सूक्त)।
  • विष्णु पुराण: देवताओं के शिल्पकार के रूप में विश्वकर्मा का वर्णन।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण: द्वारिका निर्माण और सुदामा प्रसंग।
  • स्कंद पुराण: जगन्नाथ मंदिर के निर्माण की दिव्य कथा।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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