"रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने" भजन सनातन धर्म की उस गौरवशाली परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारक के रूप में स्वीकार करता है। पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज द्वारा स्वरबद्ध यह भजन न केवल कानों को प्रिय लगता है, बल्कि यह जीवात्मा को परमात्मा के प्रति पूर्ण शरणागति का मार्ग भी दिखाता है। कलयुग में नाम-संकीर्तन को मोक्ष का सुगम साधन माना गया है, और यह भजन उसी भक्ति रस की एक पावन धारा है। इसमें निहित भाव मनुष्य को यह स्मरण कराते हैं कि यह संसार क्षणभंगुर है और केवल प्रभु के चरण ही शाश्वत सत्य हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने,
सजाया है जिसने ये सारा जहां।
उसी के चरणों में झुक के देखो,
मिलेगा तुम्हें हर जगह वो वहां॥
नदी और नाले, ये पर्वत ये झरने,
उसी की कला की है सुंदर निशानी।
हवाओं में देखो, फिजाओं में देखो,
उसी की ही गाथा है कहती कहानी॥
जो कण-कण में व्यापे, जो घट-घट में वासे,
उसे ढूंढने तुम कहाँ जा रहे हो।
वो तो तुम्हारे ही भीतर समाया,
जिसे तुम बाहर ही ढूँढ रहे हो॥
भरोसा जो कर ले, जो मन से पुकारे,
उसे वो कभी भी न तजता है प्रभु।
देवेन्द्र गाए, सब मिलके गाओ,
वही तो है अपना, वही है विभु॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा है। कवि कहता है कि जिस ईश्वर ने इस विशाल ब्रह्मांड की रचना की है और इसे अपनी माया से सजाया है, वही एकमात्र सत्य है। भक्त को सलाह दी जाती है कि वह अहंकार त्यागकर प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो। प्रकृति का प्रत्येक तत्व—नदियाँ, पर्वत, झरने—ईश्वर की सृजन शक्ति का प्रमाण हैं। भजन का मुख्य संदेश 'अहं ब्रह्मास्मि' और 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' के दर्शन से प्रेरित है, जो यह सिखाता है कि ईश्वर कहीं दूर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। बाहर की दुनिया में उन्हें खोजने के बजाय, हमें अपने अंतर्मन में झांकने की आवश्यकता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- भक्ति भाव: यह भजन शरणागति (Surrender) और कृतज्ञता (Gratitude) के भाव को जागृत करता है।
- प्रकृति प्रेम: इसमें ईश्वर को प्रकृति के माध्यम से देखने की दृष्टि प्रदान की गई है।
- आध्यात्मिक जागृति: यह भजन मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) की ओर प्रेरित करता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को नित्य प्रातः काल की पूजा या संध्या आरती के समय गाया जा सकता है। सत्संग के दौरान सामूहिक गायन से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसे शांत चित्त होकर, आँखें बंद करके और प्रभु के स्वरूप का ध्यान करते हुए सुनना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| सृष्टि | ब्रह्मांड / संसार | ईश्वर द्वारा रचित जगत |
| घट-घट | प्रत्येक हृदय | ईश्वर का सर्वव्यापी होना |
| विभु | सर्वशक्तिमान / व्यापक | परमात्मा का स्वरूप |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने |
| गायक | पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज |
| विषय | ईश्वर की महिमा एवं शरणागति |
| भाषा | हिंदी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
यह भजन किस देवता को समर्पित है?
यह भजन निराकार परमात्मा और भगवान श्री कृष्ण के प्रति समर्पित है, जो सृष्टि के रचयिता हैं।
क्या इसे घर पर अकेले गाया जा सकता है?
हाँ, इसे एकांत में या परिवार के साथ भक्ति भाव से कभी भी गाया जा सकता है।
पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज कौन हैं?
वे एक प्रख्यात भजन गायक और कथावाचक हैं, जो अपनी मधुर वाणी से भक्ति का प्रचार करते हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री विभिन्न भक्ति ग्रंथों और संकीर्तन परंपराओं के आधार पर संकलित की गई है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
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