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जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी - आरती (Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri Lyrics in Hindi) - Ambe Maa Aarti - Bhaktilok

87 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी - आरती | Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri Aarti

"जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी" माँ दुर्गा जी की सर्वाधिक प्रचलित और भावपूर्ण आरती है, जो विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, और शक्ति उपासना के अवसरों पर की जाती है। यह आरती माँ अम्बे की महिमा, उनके दिव्य स्वरूप, और भक्तों पर उनकी कृपा का सुंदर वर्णन करती है। इस आरती में माँ को गौरी, श्यामा, जगदम्बे, और भवानी जैसे अनेक नामों से संबोधित किया गया है, जो उनके विभिन्न स्वरूपों और गुणों को दर्शाते हैं। यह आरती भक्तों के हृदय में श्रद्धा, भक्ति, और माँ के प्रति गहन प्रेम का संचार करती है। माना जाता है कि इस आरती को शुद्ध मन और भक्ति भाव से गाने पर माँ अम्बे की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन के सभी दुःख, कष्ट, और बाधाएं दूर होती हैं। यह आरती न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और माँ के साथ एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का साधन भी है।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर मारे।
धूम्र विलोचन निहारे, निशिदिन मारे।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

चौंसठ योगिनी मंगल गावैं, बाजैं मृदंग डमरू।
भक्तजन आरती गावैं, जय जय जगदम्बे।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्पर धारी।
माँ अम्बे की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै।।
ॐ जय अम्बे गौरी...

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

इस आरती का प्रत्येक पद माँ अम्बे के दिव्य स्वरूप और उनकी महिमा का वर्णन करता है। आइए इसके प्रत्येक भाग का सरल हिंदी अर्थ समझें:

प्रथम पद: "जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी"

भक्त माँ अम्बे की जय-जयकार करते हुए उन्हें गौरी (गौर वर्ण वाली, पार्वती) और श्यामा (श्याम वर्ण वाली, काली) कहकर संबोधित करते हैं। यह दर्शाता है कि माँ एक ही हैं, परन्तु अपने भक्तों की भावना के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होती हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवता दिन-रात उनका ध्यान करते हैं।

द्वितीय पद: "माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को"

माँ के मस्तक पर सिंदूर और कस्तूरी का टीका सुशोभित है। उनके नेत्र अत्यंत उज्ज्वल हैं और उनका मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। यह पद माँ के सौंदर्य और मंगलमय स्वरूप का वर्णन करता है।

तृतीय पद: "कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै"

माँ का शरीर स्वर्ण के समान चमकीला है और वे लाल वस्त्र धारण करती हैं। उनके गले में लाल पुष्पों की माला सुशोभित है। लाल रंग शक्ति, साहस और मंगल का प्रतीक है।

चतुर्थ पद: "केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी"

माँ सिंह की सवारी करती हैं और अपने हाथों में खड्ग (तलवार) तथा खप्पर (खोपड़ी) धारण करती हैं। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उनकी सेवा करते हैं, और वे अपने भक्तों के दुःख हरती हैं।

पंचम पद: "कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती"

माँ के कानों में कुंडल और नाक में मोती शोभा पाते हैं। उनकी ज्योति करोड़ों चंद्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान है।

षष्ठम पद: "शुम्भ निशुम्भ बिदारे, महिषासुर मारे"

माँ ने शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों का संहार किया और महिषासुर का वध किया। धूम्रविलोचन जैसे राक्षसों को भी उन्होंने दिन-रात मार भगाया। यह पद माँ के शक्ति स्वरूप को दर्शाता है।

सप्तम पद: "चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे"

माँ ने चंड और मुंड का संहार किया तथा रक्तबीज का वध किया। मधु और कैटभ नामक असुरों को भी मारकर देवताओं का भय दूर किया।

अष्टम पद: "ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी"

माँ ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) रानी हैं। वेद और शास्त्र उनका बखान करते हैं, और वे शिव की पटरानी हैं।

नवम पद: "चौंसठ योगिनी मंगल गावैं"

चौंसठ योगिनियाँ मंगल गाती हैं, मृदंग और डमरू बजते हैं। भक्तजन आरती गाते हैं और जगदम्बे की जय-जयकार करते हैं।

दशम पद: "भुजा चार अति शोभित"

माँ की चार भुजाएँ अत्यंत सुशोभित हैं, जिनमें खड्ग और खप्पर धारण किए हुए हैं। शिवानन्द स्वामी कहते हैं कि जो कोई इस आरती को गाता है, वह सुख और सम्पत्ति प्राप्त करता है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Significance & Benefits

माँ अम्बे की यह आरती शक्ति उपासना का एक अभिन्न अंग है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस आरती को नियमित रूप से गाने और सुनने से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: आरती की दिव्य ध्वनि और भक्ति भाव वातावरण को शुद्ध करते हैं और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाते हैं।
  • मानसिक शांति: इस आरती को गाने से मन को गहरी शांति और संतोष मिलता है।
  • भय का निवारण: माँ अम्बे की आरती करने से सभी प्रकार के भय, चिंता और तनाव दूर होते हैं।
  • सुख-समृद्धि की प्राप्ति: आरती में कहा गया है कि जो इस आरती को गाता है, वह सुख और सम्पत्ति पाता है।
  • आत्मिक उन्नति: यह आरती आत्मा को शुद्ध करती है और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होती है।

यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान, दुर्गा पूजा, और शक्ति उपासना के अन्य अवसरों पर की जाती है। माना जाता है कि नवरात्रि के नौ दिनों में इस आरती को नियमित रूप से गाने से माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

माँ अम्बे की आरती करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करें:

आरती थाली सज्जा:

  • एक साफ तांबे या पीतल की थाली लें।
  • थाली में घी या तेल का दीपक रखें।
  • कपूर, धूप, और अगरबत्ती रखें।
  • लाल फूल, विशेषकर गुड़हल और गेंदा के फूल चढ़ाएं।
  • सिंदूर, कुमकुम, और चावल रखें।
  • मिठाई या प्रसाद रखें।

आरती विधि:

  1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. माँ अम्बे की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
  3. थाली को दोनों हाथों से पकड़कर माँ के सामने घुमाएं।
  4. आरती गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव रखें।
  5. आरती के बाद प्रसाद वितरित करें।

आरती का समय विशेष रूप से प्रातःकाल और सायंकाल को उत्तम माना जाता है। नवरात्रि के दौरान तो यह आरती प्रतिदिन की जाती है।

संबंधित मंत्र एवं स्तुति | Associated Mantra

माँ अम्बे की आरती के साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप भी किया जाता है:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

यह माँ दुर्गा का बीज मंत्र है, जो शक्ति और साहस प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त, दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ भी माँ अम्बे की उपासना में किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, और शक्ति उपासना के अवसरों पर गाई जाती है। इसके अतिरिक्त, प्रातःकाल और सायंकाल की पूजा में भी इसे नियमित रूप से गाया जा सकता है।

हाँ, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि इस आरती को शुद्ध मन और भक्ति भाव से गाया जाए, तो माँ अम्बे अवश्य प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

आरती करते समय मन को एकाग्र रखें, शुद्ध वस्त्र धारण करें, और पूर्ण श्रद्धा भाव से माँ का ध्यान करें। आरती के दौरान बातचीत या अन्य कार्य न करें।

हाँ, इस आरती का पाठ घर पर भी किया जा सकता है। घर के मंदिर या पूजा स्थल पर दीपक जलाकर, फूल चढ़ाकर, और भक्ति भाव से आरती गाई जा सकती है।

इस आरती के अंतिम पद में "कहत शिवानन्द स्वामी" का उल्लेख मिलता है, जिससे यह माना जाता है कि इस आरती की रचना शिवानन्द स्वामी द्वारा की गई होगी। यह आरती परंपरागत रूप से शक्ति उपासना में प्रचलित है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे शास्त्रीय ग्रंथों, पारंपरिक आरती संग्रहों, और शक्ति उपासना की प्रामाणिक परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। "जय अम्बे गौरी" आरती हिंदू धर्म की सबसे प्रचलित आरतियों में से एक है, जो माँ दुर्गा की स्तुति में गाई जाती है। इस आरती का प्रत्येक पद माँ के दिव्य स्वरूप, उनकी शक्ति, और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है।

इस लेख में दी गई जानकारी पारंपरिक मान्यताओं और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस आरती को श्रद्धा और भक्ति भाव से गाएं और माँ अम्बे की कृपा प्राप्त करें।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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