Parvati Stotram

भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना भजन लिरिक्स (Bhagwan Meri Naiya Lyrics in Hindi )

161 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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हिंदू एवं जैन भक्ति परंपरा में "भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना" एक अत्यंत लोकप्रिय, हृदयस्पर्शी और करुण रस से ओतप्रोत प्रार्थना भजन है। यह भजन जीवात्मा की परमात्मा के प्रति पूर्ण शरणागति (समर्पण भाव) को दर्शाता है। जब मनुष्य सांसारिक कष्टों, मोह-माया और भवसागर के थपेड़ों से व्याकुल हो उठता है, तब वह ईश्वर को अपना एकमात्र खेवैया मानकर पुकारता है। इस भजन में विनय, करुणा, अटूट विश्वास और भक्ति का ऐसा अद्भुत समन्वय है जो गायक और श्रोता दोनों के अंतःकरण को शांत और पवित्र कर देता है। चाहे सुबह की प्रार्थना हो, संध्याकालीन सत्संग हो या कोई विशेष धार्मिक उत्सव, इस भजन का गायन मन को असीम शांति प्रदान करता है और ईश्वर के प्रति श्रद्धा को सुदृढ़ करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना

भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना।
अब तक तो निभाया है आगे भी निभा देना॥

हम दीन दुखी निर्बल नित नाम रहे प्रति पल।
यह सोच दरश दोगे प्रभु आज नहीं तो कल॥
जो बाग लगाया है फूलों से सजा देना।
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना॥

तुम शांति सुधाकर हो तुम ज्ञान दिवाकर हो।
मम हंस चुगे मोती तुम मान सरोवर हो॥
दो बूंद सुधा रस की हमको भी पिला देना।
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना॥

रोकोगे भला कब तक दर्शन को मुझे तुमसे।
चरणों से लिपट जाऊं वृक्षों से लता जैसे॥
अब द्वार खड़ी तेरे मुझे राह दिखा देना।
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना॥

मजधार पड़ी नैया डगमग डोले भव में।
आओ त्रिशला नंदन हम ध्यान धरे मन में॥
अब तनवर करे विनती मुझे अपना बना लेना।
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना॥

अब तक तो निभाया है आगे भी निभा देना।
भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन जीवात्मा की परमात्मा से की गई एक अत्यंत मार्मिक और आर्त पुकार है। यहाँ मानव जीवन की तुलना एक 'नैया' (नाव) से की गई है और इस संसार को एक विशाल 'भवसागर' (समुद्र) माना गया है। भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मेरी यह जीवन रूपी नैया इस संसार रूपी समुद्र के बीच फंसी हुई है, आप कृपा करके इसे सुरक्षित रूप से उस पार (मोक्ष या परमधाम) लगा दीजिए।

भक्त कहता है कि हे दयामय! आपने मेरे जीवन के सफर में अब तक मेरा साथ दिया है, मेरे हर सुख-दुख में मेरा निर्वाह किया है, तो आगे भी अपनी इस कृपा को बनाए रखना और मेरा साथ मत छोड़ना। हम सांसारिक जीव अत्यंत दीन, दुखी और निर्बल हैं। हमारे पास न तो कोई विशेष शक्ति है और न ही कोई साधन, परंतु हम प्रतिपल आपके पावन नाम का स्मरण करते रहते हैं। हमारे मन में यह दृढ़ विश्वास है कि आज नहीं तो कल, आप हमें दर्शन अवश्य देंगे। आपने जो यह जीवन रूपी सुंदर बाग लगाया है, इसे अपनी कृपा के फूलों से महका दीजिए और हमारे जीवन को सार्थक बना दीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से विशिष्ट और सर्वप्रिय बनाती हैं:

  • पूर्ण शरणागति का भाव: यह भजन वैष्णव और जैन दोनों ही परंपराओं में 'प्रपत्ति' या शरणागति के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, जहाँ भक्त अपने सारे अहंकार को त्यागकर ईश्वर की शरण में आ जाता है।
  • अलंकारिक सौंदर्य: भजन में रूपक अलंकार का प्रचुर प्रयोग किया गया है। जीवन को 'नैया', संसार को 'मजधार', ईश्वर को 'सुधाकर' (चंद्रमा), 'दिवाकर' (सूर्य) और 'मान सरोवर' के रूप में चित्रित किया गया है।
  • सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक: इस भजन की एक अद्भुत विशेषता यह है कि इसके अंतिम अंतरे में "त्रिशला नंदन" (भगवान महावीर) का उल्लेख आता है, जिससे यह जैन समाज में भी अत्यंत पूजनीय है, वहीं हिंदू समाज में इसे भगवान कृष्ण, राम या विष्णु के प्रति समर्पित मानकर गाया जाता है। यह भजन विभिन्न संप्रदायों को भक्ति के एक सूत्र में पिरोता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए हर समय शुभ होता है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी गई है:

  • प्रातःकाल की प्रार्थना: सुबह के समय शांत मन से इस भजन का गायन करने से दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा और ईश्वर पर विश्वास के साथ होती है।
  • संध्या आरती और सत्संग: शाम के समय मंदिर या घर के पूजा स्थल पर दीया जलाकर परिवार के साथ सामूहिक रूप से इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी होता है।
  • मानसिक अशांति के समय: जब भी मन विचलित हो, तनाव में हो या जीवन में कोई मार्ग न सूझ रहा हो, तब एकांत में बैठकर इस भजन को सुनने से अद्भुत मानसिक शांति और संबल प्राप्त होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन बहु-आराध्य देवों को समर्पित माना जाता है। हिंदू धर्म में भक्त इसे भगवान श्री कृष्ण या श्री हरि विष्णु के चरणों में समर्पित करते हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के पालनहार और संकटमोचक हैं। वहीं, जैन धर्म के अनुयायी इसे २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (त्रिशला नंदन) की स्तुति में गाते हैं। इस भजन के रचयिता के रूप में "तनवर" कवि का नाम आता है, जिन्होंने अत्यंत सरल और सुबोध भाषा में आत्मा की परमात्मा से मिलन की तड़प को अभिव्यक्त किया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना मध्यकाल या आधुनिक काल के प्रारंभिक चरण की भक्ति काव्यधारा से प्रभावित जान पड़ती है। कवि 'तनवर' ने अपनी इस रचना में लोकभाषा और शास्त्रीय उपमाओं का सुंदर मिश्रण किया है। इस भजन की पृष्ठभूमि मानव जीवन के संघर्षों और उनसे मुक्ति पाने की आध्यात्मिक इच्छा पर आधारित है। जब कोई साधक अपनी साधना के मार्ग में डगमगाने लगता है, तब वह इस प्रकार के भजनों के माध्यम से अपने आराध्य से शक्ति और मार्गदर्शन की याचना करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और राजस्थानी के पुट भी देखने को मिलते हैं। इसकी काव्य शैली गेय (गाने योग्य) है। इसकी लय और धुन इतनी सरल है कि कोई भी सामान्य व्यक्ति इसे आसानी से सीख और गा सकता है। इसमें प्रयुक्त उपमाएं जैसे "वृक्षों से लता जैसे" भक्त और भगवान के अटूट संबंध को दर्शाती हैं, जो अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल भक्ति ही नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने के महत्वपूर्ण संदेश भी देता है:

  1. धैर्य और विश्वास: "आज नहीं तो कल" प्रभु दर्शन देंगे, यह पंक्ति हमें जीवन में धैर्य रखने और ईश्वर की न्यायप्रियता पर अटूट विश्वास बनाए रखने की सीख देती है।
  2. विनम्रता और निरहंकारिता: स्वयं को "दीन दुखी निर्बल" कहना इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर के सामने हमें अपने धन, बल या ज्ञान का अहंकार नहीं करना चाहिए।
  3. समर्पण का सुख: जब हम अपनी जीवन रूपी नैया की पतवार भगवान के हाथों में सौंप देते हैं, तो हम सभी प्रकार की चिंताओं और भयों से मुक्त हो जाते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
नैया नाव (Boat) मानव जीवन या जीवात्मा
भवसागर / भव संसार रूपी समुद्र जन्म-मरण का चक्र और सांसारिक माया
सुधाकर चंद्रमा (अमृत बरसाने वाला) शांति और शीतलता प्रदान करने वाले ईश्वर
दिवाकर सूर्य (प्रकाश देने वाला) ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले परमात्मा
मान सरोवर पवित्र झील / मन रूपी सरोवर ईश्वर का पावन सानिध्य जहाँ हंस रूपी आत्माएं मोती चुगती हैं
त्रिशला नंदन माता त्रिशला के पुत्र भगवान महावीर स्वामी (जैन तीर्थंकर)
मजधार नदी या समुद्र के बीच की धारा जीवन के संकट और असमंजस की स्थिति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. "भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना..."
हे परमेश्वर! मेरी जीवन रूपी नाव इस संसार के थपेड़ों से डगमगा रही है, आप इसे मोक्ष के किनारे लगा दीजिए। आपने अब तक मेरा पालन-पोषण किया है, आगे भी मेरी रक्षा करना।

२. "हम दीन दुखी निर्बल नित नाम रहे प्रति पल..."
हम सांसारिक जीव कमजोर और दुखों से घिरे हैं, लेकिन हम हर पल आपका नाम जपते हैं। हमें विश्वास है कि आप कभी न कभी हमें दर्शन अवश्य देंगे। हमारे इस जीवन रूपी उपवन को खुशियों से भर दीजिए।

३. "तुम शांति सुधाकर हो तुम ज्ञान दिवाकर हो..."
आप शांति के चंद्रमा और ज्ञान के सूर्य हैं। आप उस मानसरोवर के समान हैं जहाँ हमारी आत्मा रूपी हंस भक्ति के मोती चुगती है। हमें भी अपने प्रेम और ज्ञान के अमृत की कुछ बूंदें प्रदान करें।

४. "रोकोगे भला कब तक दर्शन को मुझे तुमसे..."
हे प्रभु! आप मुझे अपने दर्शन देने से कब तक रोक पाएंगे? मैं आपके चरणों से इस तरह लिपट जाना चाहता हूँ जैसे कोई बेल किसी वृक्ष से लिपट जाती है। मैं आपके द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे सही मार्ग दिखाइए।

५. "मजधार पड़ी नैया डगमग डोले भव में..."
मेरी नाव संसार के बीच फंसी डोल रही है। हे त्रिशला नंदन (भगवान महावीर/प्रभु)! हम मन में आपका ध्यान धरते हैं। कवि तनवर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु, मुझे अपना बना लीजिए और मेरा उद्धार कीजिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति के भाव को पुष्ट करने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

(अर्थात: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों और कष्टों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।)

इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण की शरण में जाने के लिए भक्त श्री कृष्ण शरणम् ममः महामंत्र का भी जाप करते हैं, जो इस भजन के मूल भाव से मेल खाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना
मुख्य विषय शरणागति, भवसागर से मुक्ति की प्रार्थना, ईश्वर भक्ति
आराध्य देव भगवान विष्णु/कृष्ण (हिंदू परंपरा) एवं भगवान महावीर (जैन परंपरा)
रचयिता / कवि कवि तनवर (पारंपरिक)
काव्य रस भक्ति रस, शांत रस, करुण रस
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर दैनिक प्रार्थना, सत्संग, संध्या आरती, महावीर जयंती, जन्माष्टमी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण समर्पण (शरणागति) है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर को अपने जीवन का मार्गदर्शक और रक्षक मान लेता है, तो ईश्वर अवश्य ही उसका उद्धार करते हैं।

"त्रिशला नंदन" का अर्थ है माता त्रिशला के पुत्र, जो कि जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। यह दर्शाता है कि यह भजन जैन आराधना में भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह भजन दोनों ही धर्मों में समान रूप से लोकप्रिय है। हिंदू धर्म में इसे भगवान कृष्ण या विष्णु के लिए गाया जाता है, जबकि जैन धर्म में इसे भगवान महावीर के लिए गाया जाता है। यह भजन धार्मिक एकता का एक सुंदर उदाहरण है।

इस भजन के अंतिम अंतरे में "तनवर" नाम आता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसके रचयिता कवि तनवर हैं, जिन्होंने इस सुंदर प्रार्थना की रचना की है।

"शांति सुधाकर" का अर्थ है शांति रूपी अमृत बरसाने वाला चंद्रमा, और "ज्ञान दिवाकर" का अर्थ है अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला सूर्य। ये दोनों विशेषण ईश्वर की महिमा को दर्शाते हैं।

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है, और साधक के भीतर ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का भाव जाग्रत होता है।

यह भजन सामान्यतः बहुत ही सरल और सुगम संगीत धुन में गाया जाता है, जो शांत रस के अनुकूल होती है। इसे कोई भी सामान्य ढोलक, मंजीरे या हारमोनियम के साथ आसानी से गा सकता है।

इसका अर्थ है कि हे प्रभु! आप उस पवित्र मानसरोवर के समान हैं जहाँ मेरी आत्मा रूपी हंस सांसारिक गंदगी को छोड़कर आपकी भक्ति और ज्ञान रूपी सच्चे मोतियों को चुगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और अर्थ की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न पारंपरिक भजनावलियों, संतों के प्रवचनों और प्रामाणिक भक्ति ग्रंथों का संदर्भ लिया गया है। इस भजन का मुख्य उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और त्रुटिहीन लिरिक्स प्रदान करने के साथ-साथ इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ से अवगत कराना है ताकि उनकी पूजा और साधना अधिक फलदायी हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति योग संदर्भ)
  • पारंपरिक जैन एवं हिंदू भजनावली संग्रह
  • भक्ति काव्य परंपरा और लोक साहित्य समीक्षा

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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