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म्हारा बाबा शीश का दानी | Mahara Baba Sheesh Ka Daani Lyrics in Hindi | Khatu Shyam Latest Bhajan by Nisha Dwivedi - BhaktiLok

208 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सनातन धर्म की पावन संकीर्तन परंपरा में खाटू श्याम जी के भजनों का एक अत्यंत विशिष्ट और भावपूर्ण स्थान है। "म्हारा बाबा शीश का दानी" (Mahara Baba Sheesh Ka Daani) एक ऐसा ही कालजयी और हृदय को स्पर्श करने वाला श्याम भजन है, जिसे सुप्रसिद्ध भजन गायिका निशा द्विवेदी (Nisha Dwivedi) ने अपने मधुर और भक्तिपूर्ण स्वरों से सजाया है। यह भजन महाभारत कालीन महान योद्धा वीर बर्बरीक (जिन्हें कलयुग में भगवान श्री कृष्ण के वरदान स्वरूप 'खाटू श्याम' के नाम से पूजा जाता है) के परम त्याग, अद्वितीय दानवीरता और उनके अलौकिक स्वरूप को समर्पित है। इस भजन का मुख्य भाव पूर्ण शरणागति, अगाध श्रद्धा और 'हारे के सहारे' के प्रति अटूट विश्वास है। जब कोई भक्त इस भजन का श्रवण या गायन करता है, तो उसका अंतर्मन खाटू नरेश के चरणों में स्वतः ही लीन हो जाता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके गायन के महत्व का सांगोपांग अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मुखड़ा):

म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे।
खाटू की पावन धरती पर, म्हारो श्याम बिहारी राजै रे॥
म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे।
खाटू की पावन धरती पर, म्हारो श्याम बिहारी राजै रे॥

अंतरा - 1:

भीम का पौत्र, घटोत्कच का लाला,
तीन बाण धारी यो जग से निराला।
कृष्ण ने जब शीश था मांगा, हंसकर दान दिया रे।
म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे॥

अंतरा - 2:

हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा,
डूबती नैया को देता किनारा।
जो भी आए शरण तुम्हारी, बिगड़े काम बनावै रे।
म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे॥

अंतरा - 3:

निशा गावे महिमा थारी, चरणों में शीश झुकावे रे,
भक्तों की टोली बाबा, खाटू दौड़ी आवे रे।
लीले चढ़कर बाबा म्हारो, भक्तों के कष्ट मिटावै रे।
म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन "म्हारा बाबा शीश का दानी" खाटू श्याम जी की महिमा का एक अत्यंत सुंदर और भावुक चित्रण है। भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार में जो भी मनुष्य पूरी तरह से हार चुका है, निराश हो चुका है, उसके लिए केवल श्याम बाबा ही एकमात्र सहारा हैं।

भजन के मुखड़े में भक्त बड़े ही गर्व और आनंद के साथ गाता है कि मेरे श्याम बाबा 'शीश के दानी' हैं, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने मस्तक का दान कर दिया। आज संपूर्ण संसार में उनकी कीर्ति का डंका बज रहा है। राजस्थान की पावन धरा खाटू धाम में स्वयं साक्षात श्री कृष्ण स्वरूप श्याम बिहारी विराजमान हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसा रहे हैं।

प्रथम अंतरे में वीर बर्बरीक के वंश और उनकी असीम शक्ति का वर्णन है। वे महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र हैं। उनके पास तीन अमोघ बाण थे, जिससे वे क्षण भर में पूरी सृष्टि का अंत या रक्षा कर सकते थे। परंतु जब धर्म की स्थापना के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उनसे दान में उनका शीश मांगा, तो उन्होंने बिना किसी संकोच या मोह के हंसते-हंसते अपना मस्तक काट कर प्रभु के चरणों में अर्पित कर दिया। यह इतिहास का सबसे बड़ा और अद्वितीय दान माना जाता है।

द्वितीय अंतरे में बाबा श्याम के दयालु स्वभाव का वर्णन है। उन्हें 'हारे का सहारा' कहा गया है। जब मनुष्य संसार के थपेड़ों से थक जाता है और उसकी जीवन रूपी नैया डूबने लगती है, तब बाबा श्याम उसे थाम लेते हैं। जो भी भक्त निष्काम भाव से उनकी शरण में आता है, उसके सभी बिगड़े काम स्वतः ही बन जाते हैं।

तृतीय अंतरे में गायिका निशा द्विवेदी अपनी अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि वे निरंतर बाबा की महिमा का गुणगान कर रही हैं और उनके चरणों में अपना शीश झुका रही हैं। देश-विदेश से भक्तों की टोलियां बाबा के दर्शन के लिए खाटू धाम दौड़ी चली आ रही हैं। बाबा अपने नीले घोड़े पर सवार होकर आते हैं और पलक झपकते ही अपने भक्तों के सारे कष्ट और संताप हर लेते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह केवल एक गीत नहीं है, बल्कि एक भक्त की अपने आराध्य के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की अभिव्यक्ति है।

  • अहंकार का विसर्जन: 'शीश दान' का आध्यात्मिक अर्थ केवल भौतिक मस्तक का दान नहीं है, बल्कि अपने अहंकार (Ahamkara) का पूर्ण विसर्जन है। जब भक्त इस भजन को गाता है, तो वह अपने अहंकार को बाबा के चरणों में समर्पित करने की प्रेरणा पाता है।
  • शरणागति का संदेश: यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है। जब भक्त स्वयं को असहाय मानकर बाबा की शरण में जाता है, तो बाबा उसका हाथ थाम लेते हैं।
  • भक्ति रस का संचार: निशा द्विवेदी की सुमधुर आवाज और राजस्थानी लोक संगीत के पुट ने इस भजन को अत्यंत कर्णप्रिय और ध्यानमग्न करने वाला बना दिया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि प्रभु की भक्ति के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • एकादशी तिथि: खाटू श्याम जी की पूजा में एकादशी (विशेषकर देवउठनी एकादशी और फाल्गुन शुक्ल एकादशी) का विशेष महत्व है। इस दिन इस भजन का कीर्तन करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • संध्या आरती के समय: घर में या मंदिर में संध्या काल की पूजा के समय इस भजन को गाने से घर का वातावरण सकारात्मक और भक्तिमय बनता है।
  • निशान यात्रा के दौरान: खाटू धाम की प्रसिद्ध निशान यात्रा के समय भक्त इस भजन को गाते हुए झूमते-नाचते आगे बढ़ते हैं, जिससे मार्ग की थकान का अनुभव नहीं होता।
  • गायन विधि: इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण विश्वास और आंखों में प्रेम के आंसू होने चाहिए। करताल, ढोलक और मंजीरे की थाप पर सामूहिक संकीर्तन के रूप में इसे गाना अत्यंत प्रभावशाली होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान खाटू श्याम जी (वीर बर्बरीक) को समर्पित है, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण का ही कलयुगी अवतार माना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, बर्बरीक के महान त्याग से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि कलयुग में तुम मेरे 'श्याम' नाम से पूजे जाओगे और जो भी तुम्हारी शरण में आएगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। इस भजन के माध्यम से भक्त श्री कृष्ण भजन और श्याम साधना का एक साथ रसास्वादन करते हैं। गायिका निशा द्विवेदी ने अपनी सुमधुर प्रस्तुति से इस भजन को जन-जन तक पहुंचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि महाभारत काल से जुड़ी हुई है। जब महाभारत का युद्ध निश्चित हुआ, तो वीर बर्बरीक ने भी युद्ध देखने और उसमें भाग लेने की इच्छा जताई। उन्होंने अपनी माता अहिलावती को वचन दिया कि वे युद्ध में उसी पक्ष से लड़ेंगे जो पक्ष हार रहा होगा (हारे का पक्ष)।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि यदि बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़े, तो पांडवों की पराजय निश्चित है क्योंकि उनके पास तीन ऐसे बाण थे जो संपूर्ण सेना का विनाश कर वापस उनके तरकश में आ सकते थे। इसलिए, श्री कृष्ण ने एक ब्राह्मण का भेष धारण कर बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश काट कर दान कर दिया, परंतु युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की। तब श्री कृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से उन्होंने संपूर्ण महाभारत युद्ध देखा। युद्ध की समाप्ति पर बर्बरीक ने निर्णय दिया कि यह युद्ध केवल श्री कृष्ण की नीति और सुदर्शन चक्र के कारण जीता गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-संस्कृति से ओतप्रोत है:

  • राजस्थानी और हिंदी का समन्वय: भजन में 'म्हारा', 'म्हारो', 'राजै', 'बनावै', 'गावै' जैसे राजस्थानी (मारवाड़ी) शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो इसे खाटू धाम की मिट्टी की सोंधी खुशबू प्रदान करता है।
  • काव्य शैली: यह एक पारंपरिक 'पद' या 'गीत' शैली में लिखा गया है। इसमें अंत्यानुप्रास (Rhyme) का सुंदर प्रयोग है, जिससे इसे याद रखना और गाना अत्यंत सरल हो जाता है।
  • प्रतीकात्मकता: 'शीश का दानी' और 'लीले चढ़कर' जैसे शब्द प्रतीकात्मक हैं, जो सीधे भक्त के हृदय में श्रद्धा का भाव जागृत करते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. वचनबद्धता (Commitment): वीर बर्बरीक ने अपनी माता को दिए वचन 'हारे का सहारा' बनने का पालन करने के लिए अपने प्राणों की भी चिंता नहीं की। हमें भी अपने जीवन में सत्य और वचनों के प्रति निष्ठावान होना चाहिए।
  2. परम त्याग (Sacrifice): धर्म की स्थापना के लिए अपने सबसे प्रिय और मूल्यवान वस्तु (स्वयं के जीवन/शीश) का दान कर देना यह सिखाता है कि समाज और धर्म के कल्याण के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करना आवश्यक है।
  3. अटूट विश्वास (Faith): कलयुग के इस कठिन समय में जब चारों ओर निराशा हो, तब ईश्वर पर अटूट विश्वास ही हमें जीवित रखता है। बाबा श्याम पर भरोसा रखने वाला कभी निराश नहीं होता।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
शीश का दानी मस्तक का दान करने वाला वीर बर्बरीक, जिन्होंने श्री कृष्ण को अपना सिर दान कर दिया।
डंका बाजै प्रसिद्धि या कीर्ति होना संसार भर में श्याम बाबा की महिमा का यश फैलना।
राजै रे सुशोभित होना या विराजमान होना खाटू धाम के मंदिर में श्याम बाबा का दिव्य विग्रह स्थापित होना।
तीन बाण धारी तीन अचूक बाणों को धारण करने वाला बर्बरीक की असीम युद्ध क्षमता और दैवीय शक्ति का प्रतीक।
हारे का सहारा पराजित और निराश व्यक्ति का संबल कलयुग में दुखी और असहाय भक्तों की रक्षा करने वाले देव।
लीले नीला घोड़ा (लीला घोड़ा) श्याम बाबा का दिव्य वाहन, जो उनके तीव्र आगमन का प्रतीक है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

आइए, इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति के गहरे अर्थ को समझें:

"म्हारा बाबा शीश का दानी, जगत में डंका बाजै रे।"
भावार्थ: मेरे प्यारे बाबा श्याम इस संसार के सबसे बड़े दानी हैं जिन्होंने अपना मस्तक दान कर दिया। उनकी इस महानता और दयालुता की कीर्ति आज पूरे ब्रह्मांड में गूंज रही है।

"खाटू की पावन धरती पर, म्हारो श्याम बिहारी राजै रे।"
भावार्थ: राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू की पवित्र भूमि पर स्वयं श्री कृष्ण स्वरूप श्याम बिहारी राजा के रूप में सिंहासन पर विराजमान हैं और भक्तों का कल्याण कर रहे हैं।

"भीम का पौत्र, घटोत्कच का लाला, तीन बाण धारी यो जग से निराला।"
भावार्थ: वे पांडव पुत्र भीम के पोते और वीर घटोत्कच के पुत्र हैं। उनके पास तीन ऐसे दिव्य बाण हैं जो संपूर्ण सृष्टि में अद्वितीय हैं, इसलिए वे इस संसार में सबसे निराले और शक्तिशाली योद्धा हैं।

"कृष्ण ने जब शीश था मांगा, हंसकर दान दिया रे।"
भावार्थ: जब लीलाधर श्री कृष्ण ने उनकी परीक्षा लेने और धर्म की रक्षा के लिए उनका मस्तक मांगा, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के मुस्कुराते हुए अपना शीश काट कर प्रभु के चरणों में रख दिया।

"हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा, डूबती नैया को देता किनारा।"
भावार्थ: जो मनुष्य हर तरफ से हार चुका है, जिसके जीवन में केवल अंधकार बचा है, उसके लिए बाबा श्याम ही एकमात्र आशा की किरण हैं। वे संसार रूपी सागर में डूबते हुए भक्त के जीवन को पार लगाते हैं।

"जो भी आए शरण तुम्हारी, बिगड़े काम बनावै रे।"
भावार्थ: जो भी व्याकुल हृदय से बाबा के चरणों की शरण लेता है, बाबा उसके जीवन की सभी बाधाओं को दूर कर उसके बिगड़े हुए कार्यों को सिद्ध कर देते हैं।

"निशा गावे महिमा थारी, चरणों में शीश झुकावे रे।"
भावार्थ: भजन गायिका निशा द्विवेदी कहती हैं कि हे प्रभु! मैं निरंतर आपकी महिमा का गान कर रही हूं और आपके श्री चरणों में अत्यंत नम्रतापूर्वक अपना मस्तक झुकाती हूं।

"भक्तों की टोली बाबा, खाटू दौड़ी आवे रे।"
भावार्थ: आपके दर्शन की प्यास लेकर देश के कोने-कोने से भक्तों के समूह नाचते-गाते हुए अत्यंत उत्साह के साथ खाटू धाम की ओर खिंचे चले आते हैं।

"लीले चढ़कर बाबा म्हारो, भक्तों के कष्ट मिटावै रे।"
भावार्थ: जब भी कोई भक्त संकट में होता है, तो बाबा अपने नीले घोड़े पर सवार होकर तुरंत उसकी सहायता के लिए आते हैं और उसके सभी दुखों का अंत कर देते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

श्याम बाबा की पूजा के दौरान इस भजन के साथ-साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

॥ श्री श्याम मंत्र ॥

ॐ श्री श्याम देवाय नमः।

ॐ मोर्वये नमः।

इस मंत्र का नियमित जाप करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और जीवन के सभी भय दूर हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक जो शरणागति को दर्शाता है, इस भजन के मूल भाव से मेल खाता है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम म्हारा बाबा शीश का दानी (Mahara Baba Sheesh Ka Daani)
मुख्य आराध्य देव श्री खाटू श्याम जी (भगवान श्री कृष्ण / वीर बर्बरीक)
स्वर / गायिका निशा द्विवेदी (Nisha Dwivedi)
भाषा हिंदी (राजस्थानी / मारवाड़ी पुट के साथ)
मुख्य भाव भक्ति रस, पूर्ण शरणागति, कृतज्ञता
उपयुक्त अवसर एकादशी, श्याम संकीर्तन, फाल्गुन मेला, दैनिक पूजा
श्रेणी श्री कृष्ण भजन, श्याम भजन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

महाभारत युद्ध के समय, वीर बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण के मांगने पर बिना किसी संकोच के अपने मस्तक (शीश) का दान दे दिया था। उनके इस परम त्याग के कारण ही उन्हें "शीश का दानी" कहा जाता है।

यह सुप्रसिद्ध भजन सुश्री निशा द्विवेदी (Nisha Dwivedi) द्वारा गाया गया है। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति के कारण यह भजन श्याम भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

खाटू श्याम जी पूर्व जन्म में वीर बर्बरीक थे। वे पांडव पुत्र महाबली भीम के पौत्र (पोते) और घटोत्कच व नागकन्या अहिलावती के पुत्र थे।

बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि वे युद्ध में कमजोर और हारने वाले पक्ष का साथ देंगे। इसी वचन के कारण और कलयुग में निराश व हारे हुए लोगों का कल्याण करने के कारण उन्हें "हारे का सहारा" कहा जाता है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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