Parvati Stotram

चला छठी माई के घाट

64 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"चला छठी माई के घाट" बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन और महापर्व छठ पूजा के अवसर पर गाया जाने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी लोक भजन है। यह गीत न केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह हमारी समृद्ध लोक संस्कृति, पारिवारिक एकजुटता और प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा को भी दर्शाता है। छठ पूजा के पावन अवसर पर जब घाटों को सजाया जाता है और पूरा वातावरण "कांच ही बांस के बहंगिया" और "चला छठी माई के घाट" जैसे सुमधुर भजनों से गुंजायमान होता है, तब हर भक्त का हृदय भक्ति रस से सराबोर हो उठता है। इस लेख में हम इस प्रसिद्ध छठ गीत के बोल, इसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

चला छठी माई के घाट (छठ विशेष भजन)

कोरस (मुखड़ा):
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।
बहंगी लचकत जाए, माथे पर दौरा उठाईं हो,
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।

अंतरा १:
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
बात जे पुछेले बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहंगी छठी माई के जाए।
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।

अंतरा २:
केला के पात पर उगेलन सुरुज देव, झांकेलन सुरुज देव हो।
कर जोड़ी ठाढ़ बाड़े बरतिया, अरघ देवे के बेर भइल हो।
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।

अंतरा ३:
गंगा जी के पावन तीरे, घाट सजल बा अनूप हो।
दीपक जले चहुंओर, चमके सुरुज देव के रूप हो।
मन में श्रद्धा अपार, छठी माई करीं बेड़ा पार हो।
चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत छठ पूजा की पावन यात्रा और उसकी तैयारी का सजीव चित्रण करता है। गीत के मुखड़े और अंतरे के माध्यम से भक्त एक-दूसरे को गंगा या नदी के घाट पर चलने का आह्वान कर रहे हैं।

मुखड़े का भावार्थ

गीत की शुरुआत में कहा गया है कि "चला छठी माई के घाट, सजल बाड़े देवलोक सारा हो।" इसका अर्थ है कि हे भक्तों! चलो, हम सब मिलकर छठी मैया के घाट की ओर प्रस्थान करें। आज का दिन इतना पवित्र और भव्य है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो स्वयं देवलोक धरती पर उतर आया हो और देवताओं ने घाट को सजाया हो। माथे पर पूजा की सामग्रियों से भरा "दौरा" (बांस की टोकरी) उठाकर और लचकती हुई बहंगी लेकर भक्त अत्यंत उत्साह के साथ घाट की ओर बढ़ रहे हैं।

अंतरों का गहन विश्लेषण

गीत के पहले अंतरे में पारंपरिक "कांच ही बांस के बहंगिया" का उल्लेख है, जो छठ पूजा की सबसे प्रसिद्ध पहचान है। जब कोई राहगीर पूछता है कि यह सुंदर बहंगी किसके लिए जा रही है, तो भक्त गर्व और भक्ति भाव से कहते हैं कि यह बहंगी हमारी आराध्य छठी मैया के लिए जा रही है।

दूसरे अंतरे में भगवान सूर्यदेव के उदय होने और केले के पत्तों के बीच से उनकी सुनहरी किरणों के बिखरने का सुंदर वर्णन है। व्रती (व्रत रखने वाले) हाथ जोड़कर पानी में खड़े हैं और सूर्यदेव को अर्घ्य देने का समय हो गया है। यह दृश्य प्रकृति और मानव के सीधे संबंध को दर्शाता है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना पूर्ण समर्पण, सादगी और प्रकृति पूजा है। छठ पूजा सनातन धर्म का एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनकी शक्ति षष्ठी देवी (छठी मैया) की आराधना की जाती है। यह गीत संदेश देता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है; बांस की टोकरी, मिट्टी के दीये, घर के बने पकवान (ठेकुआ) और शुद्ध अंतःकरण ही सच्ची पूजा के साधन हैं।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण (Parameter) जानकारी (Details)
गीत का नाम (Song Name) चला छठी माई के घाट (Chala Chhathi Mai Ke Ghat)
मुख्य गायक (Singer) गुंजन सिंह (नया संस्करण) एवं पारंपरिक लोक कलाकार
विधा (Genre) छठ लोकगीत / भक्ति भजन (Devotional Folk Song)
भाषा (Language) भोजपुरी / मगही (Bhojpuri / Magahi)
मुख्य विषय (Theme) छठ पूजा, सूर्य देव आराधना, घाट प्रस्थान
मुख्य वाद्य यंत्र (Instruments) ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

यद्यपि "चला छठी माई के घाट" और "कांच ही बांस के बहंगिया" जैसे गीत मूल रूप से पारंपरिक लोकगीत हैं, जिनकी रचना सदियों पहले अज्ञात लोक कवियों द्वारा की गई थी, लेकिन आधुनिक समय में इसे गुंजन सिंह, शारदा सिन्हा, और पवन सिंह जैसे प्रसिद्ध कलाकारों ने नए संगीत संयोजन के साथ गाकर पुनः जीवंत किया है। गुंजन सिंह के नए संस्करण ने युवा पीढ़ी के बीच इस पारंपरिक गीत को अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया है, जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Word) सरल अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
बहंगिया / बहंगी बांस का बना हुआ कांवर जिस पर दौरा और पूजा सामग्री रखकर घाट तक ले जाया जाता है।
दौरा बांस की बड़ी टोकरी इसमें ठेकुआ, फल और अन्य पूजा सामग्रियां रखी जाती हैं।
बटोहिया राहगीर / मुसाफिर मार्ग में चलने वाला व्यक्ति जो बहंगी के बारे में पूछता है।
अरघ (अर्घ्य) जल या दूध अर्पित करना उगते और डूबते सूर्य को दिया जाने वाला पवित्र अर्पण।
बरतिया व्रत रखने वाले श्रद्धालु जो ३६ घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का यह गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करता है। जब हम छठ पूजा व्रत कथा और इसके गीतों का श्रवण करते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि यह पर्व सामाजिक समरसता का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस पर्व में अमीर हो या गरीब, सभी एक ही मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते हैं और एक ही नदी के घाट पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं।

यह गीत हमें सिखाता है कि प्रकृति ही हमारी जीवनदाता है। सूर्य देव की रश्मियां और गंगा मैया का जल ही हमारे जीवन का आधार हैं। इसलिए, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा परम कर्तव्य है। इस पावन अवसर पर सूर्य देव की आरती और छठी मैया के गीतों का गायन करने से घर में सुख, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • सादगी और पवित्रता: छठ पूजा में उपयोग होने वाली सामग्रियां अत्यंत साधारण और प्राकृतिक होती हैं, जो हमें सादा जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
  • सामूहिकता: पूरा परिवार और समाज मिलकर घाट की सफाई करता है और एक साथ पर्व मनाता है, जिससे आपसी प्रेम बढ़ता है।
  • धैर्य और अनुशासन: ३६ घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखना मानसिक और शारीरिक अनुशासन की पराकाष्ठा है।
  • समानता का संदेश: घाट पर कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, सभी भक्त एक समान श्रद्धा से आराधना करते हैं।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय महापर्व छठ के दौरान गाया और सुना जाता है। विशेष रूप से:

  • खरना के दिन: जब व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और पर्व की मुख्य शुरुआत होती है।
  • संध्या अर्घ्य के समय: जब सभी श्रद्धालु माथे पर दौरा उठाकर घाट की ओर प्रस्थान करते हैं।
  • उषा अर्घ्य के समय: सुबह के समय जब उगते सूर्य की प्रतीक्षा की जाती है।

इस दौरान घरों और मंदिरों में ॐ जय जगदीश हरे आरती और देवी आराधना के लिए पार्वती स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है, जो वातावरण को और अधिक दिव्य बनाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक चला छठी माई के घाट
संबंधित पर्व महापर्व छठ पूजा (कार्तिक शुक्ल षष्ठी)
आराध्य देव भगवान सूर्य देव एवं छठी मैया (उषा और प्रत्यूषा)
मुख्य भाव भक्ति, समर्पण, लोक संस्कृति, प्रकृति प्रेम
प्रयुक्त सामग्रियां सूप, दौरा, नारियल, ठेकुआ, गन्ना, केला

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह गीत सभी भक्तों को एकजुट होकर पवित्र नदी के घाट पर चलने और भगवान सूर्य व छठी मैया की सामूहिक आराधना करने का संदेश देता है। यह सादगी और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।

बहंगी बांस से बनी एक संरचना होती है, जिसके दोनों सिरों पर टोकरियां (दौरा) लटकाई जाती हैं। इसमें पूजा का पवित्र प्रसाद और फल रखकर पुरुष श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं। यह सेवा और समर्पण का प्रतीक है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मैया भगवान सूर्य की बहन हैं और इन्हें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री 'देवसेना' या 'षष्ठी देवी' माना जाता है। ये बच्चों की रक्षा करने वाली और संतान सुख प्रदान करने वाली देवी हैं।

सनातन संस्कृति में उदय और अस्त दोनों का समान महत्व है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने दिनभर हमें ऊर्जा दी, और यह विश्वास जताते हैं कि वे कल पुनः उदित होंगे।

नहीं, अब छठ पूजा वैश्विक पर्व बन चुका है। यह गीत भारत के कोने-कोने के साथ-साथ विदेशों (जैसे नेपाल, मॉरीशस, अमेरिका) में भी जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं, अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

छठ पूजा चार दिनों का महापर्व है: १. नहाय-खाय, २. खरना, ३. संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को), और ४. उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को)।

इस गीत के नए और आधुनिक संस्करण को सुप्रसिद्ध लोक गायक गुंजन सिंह ने अपनी मधुर आवाज में गाया है, जो इंटरनेट और सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय है।

छठ पूजा में मुख्य रूप से मिट्टी के बर्तनों, पीतल के बर्तनों और बांस से बने सूप तथा दौरों का उपयोग किया जाता है, जो पूर्णतः पर्यावरण के अनुकूल होते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस लेख में प्रस्तुत गीत के बोल, भावार्थ और सांस्कृतिक तथ्यों को पारंपरिक लोक मान्यताओं, प्रामाणिक छठ पूजा पद्धतियों और क्षेत्रीय लोकगीत संकलनों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक हमारी समृद्ध लोक विरासत की सही और प्रेरणादायक जानकारी पहुंचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बिहार और पूर्वांचल की पारंपरिक लोक संस्कृति एवं मौखिक लोकगीत परंपरा।
  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - षष्ठी देवी (छठी मैया) की कथा एवं महात्म्य।
  • विभिन्न प्रतिष्ठित लोक कलाकारों द्वारा गाए गए पारंपरिक छठ गीतों का संग्रह।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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