Parvati Stotram

छठ घाट सुहावन लागे

70 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन और महापर्व छठ पूजा के पावन अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों का अपना एक विशेष और अमूल्य महत्व है। इन्हीं मधुर और भक्तिमय गीतों में से एक अत्यंत लोकप्रिय गीत है "छठ घाट सुहावन लागे" (Chhath Ghat Suhawan Lage)। इस गीत को प्रसिद्ध लोक गायक अंकुश राजा और आनंद मोहन ने अपनी सुरीली आवाज और अनन्य भक्ति भाव से सजाया है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, श्रद्धा और छठ मैया के प्रति उनके अटूट समर्पण का जीवंत प्रतीक है। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन गीत के बोल, इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, सांस्कृतिक महत्व और छठ महापर्व की महिमा का सविस्तार विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

छठ घाट सुहावन लागे

(मुखड़ा)
छठ घाट सुहावन लागे, हो छठ घाट सुहावन लागे।
सजल बाड़े घाट सब, दीया टिमटिम बाले,
छठ घाट सुहावन लागे, हो छठ घाट सुहावन लागे।

(अंतरा 1)
कांच ही बांस के बहंगिया, बहँगी लचकत जाए,
बहँगी लचकत जाए।
होईहे ना बलम जी कहँरिया, बहँगी घाटे पहुँचाए,
छठ घाट सुहावन लागे, हो छठ घाट सुहावन लागे।

(अंतरा 2)
केलवा के पात पर उगेलन सुरुज देव,
झाँकेलन झुकेलन देव।
करेलू बरतिया पुकार, अरघ के बेर भईल,
छठ घाट सुहावन लागे, हो छठ घाट सुहावन लागे।

(अंतरा 3)
दउरा सजल बा फल-फूल से, ठेकुआ पकवान बनल,
छठ माई के महिमा अपार, जगमग सारा जहान भईल।
अंकुश राजा गावेले भजन, आनंद मोहन सुर सजावेले,
छठ घाट सुहावन लागे, हो छठ घाट सुहावन लागे।

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह पावन लोकगीत "छठ घाट सुहावन लागे" छठ महापर्व के दौरान नदी और तालाबों के किनारे बने घाटों की अलौकिक सुंदरता और वहां के भक्तिमय वातावरण का सजीव चित्रण करता है। आइए इसके प्रत्येक भाग के गहरे अर्थ को समझते हैं:

मुखड़े का भावार्थ (घाट की सुंदरता और दीयों की रोशनी)

गीत की शुरुआत में गायक कहते हैं कि छठ माता के पावन घाट अत्यंत सुंदर और मनमोहक लग रहे हैं। सभी घाटों को फूलों, केलों के पत्तों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया गया है। शाम और सुबह के समय जब व्रती महिलाएं वहां एकत्रित होती हैं, तो मिट्टी के अनगिनत दीये टिमटिमाते हुए जलते हैं। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वर्ग से देवता स्वयं धरती पर उतर आए हों।

प्रथम अंतरे का भावार्थ (बहँगी और समर्पण का भाव)

इस अंतरे में पारंपरिक छठ गीतों की आत्मा बसी है। "कांच ही बांस के बहंगिया" का अर्थ है कि नए और पवित्र बांस से बनी बहँगी (दउरा ले जाने वाला ढांचा) अत्यंत कोमल है और भार के कारण लचक रही है। पत्नी अपने पति (बलम) से आग्रह करती है कि वे कहँरिया (बहँगी उठाने वाले) बनें और इस पवित्र दउरा को आदरपूर्वक छठ घाट तक पहुँचाएं। यह परिवार के सामूहिक सहयोग और सेवा भाव को दर्शाता है।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ (सूर्य देव की आराधना और अरघ)

यहाँ सूर्य देव (सुरुज देव) की महिमा का वर्णन है। केले के पत्तों के पीछे से जब भगवान सूर्य अपनी लालिमा बिखेरते हुए उदित होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए झाँक रहे हों। व्रती महिलाएं और पुरुष पानी में खड़े होकर सूर्य देव से प्रार्थना करते हैं कि "हे देव! अब अर्घ्य (अरघ) देने का समय हो गया है, आप प्रकट होकर हमारी पूजा स्वीकार करें।"

तृतीय अंतरे का भावार्थ (प्रसाद की शुद्धता और कलाकारों की श्रद्धा)

अंतिम अंतरे में पूजा की सामग्री जैसे दउरा, फल-फूल और पारंपरिक पकवान 'ठेकुआ' का वर्णन है। ठेकुआ को अत्यंत शुद्धता के साथ मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता है। गायक अंकुश राजा और आनंद मोहन अपनी कला के माध्यम से छठ मैया के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और कहते हैं कि माता की कृपा से संपूर्ण संसार प्रकाशमान और सुखी है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना पूर्ण समर्पण, पवित्रता और प्रकृति प्रेम है। छठ पूजा एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनकी शक्ति षष्ठी देवी (छठ मैया) की आराधना की जाती है। यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है; केवल मन की शुद्धता, सादगी और श्रद्धा ही पर्याप्त है। यह गीत समाज के सभी वर्गों को एक साथ मिलकर काम करने और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
गीत का नाम छठ घाट सुहावन लागे (Chhath Ghat Suhawan Lage)
मुख्य गायक अंकुश राजा एवं आनंद मोहन (Ankush Raja & Anand Mohan)
गीत की भाषा भोजपुरी (मैथिली और मगही पुट के साथ पारंपरिक लोक भाषा)
संगीत श्रेणी छठ देवी गीत / पारंपरिक लोक भजन
मुख्य विषय छठ घाट की सुंदरता, सूर्य देव को अर्घ्य और लोक आस्था
रिलीज वर्ष 2021

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत को भोजपुरी संगीत जगत के जाने-माने कलाकार अंकुश राजा ने गाया है, जो अपनी सुरीली और भावुक आवाज के लिए युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनके साथ वरिष्ठ कलाकार आनंद मोहन ने अपने सुरों का जादू बिखेरा है। आनंद मोहन के अभिनय और गायन में मिट्टी की सोंधी खुशबू और पारंपरिक लोक कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इन दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ने इस गीत को हर घर की पसंद बना दिया है। संगीत संयोजन में पारंपरिक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा, बांसुरी और शहनाई का सुंदर प्रयोग किया गया है जो मन को शांति प्रदान करता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
सुहावन अत्यंत सुंदर और मनमोहक घाटों की प्राकृतिक और आध्यात्मिक सुंदरता के लिए प्रयुक्त।
बहंगिया / बहँगी बांस का बना हुआ ढांचा जिस पर पूजा की सामग्री (दउरा) रखकर कंधे पर ढोया जाता है।
कहँरिया कंधे पर भार उठाने वाला छठ पूजा में दउरा उठाने वाले श्रद्धालु को आदर से कहा जाता है।
अरघ / अर्घ्य जल या दूध अर्पित करना अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को दिया जाने वाला पवित्र अर्पण।
बरतिया व्रत रखने वाले श्रद्धालु जो कठिन 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं।
दउरा बांस की बड़ी टोकरी जिसमें फल, ठेकुआ और पूजा की अन्य सामग्रियां सजाई जाती हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ महापर्व का आध्यात्मिक महत्व वेदों और पुराणों से जुड़ा हुआ है। ऋग्वेद में सूर्य देव की स्तुति के अनेक मंत्र हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सूर्य की किरणें आरोग्य प्रदान करने वाली मानी गई हैं। "छठ घाट सुहावन लागे" गीत इस वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को लोक संस्कृति के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाता है।

सांस्कृतिक रूप से, यह गीत पूर्वी भारत की समृद्ध विरासत को दर्शाता है। जब यह गीत बजता है, तो विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय भी अपनी मिट्टी की ओर खिंचे चले आते हैं। यह गीत सामाजिक समरसता का संदेश देता है, क्योंकि छठ घाट पर अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता। सभी एक साथ मिट्टी के घाटों पर बैठकर सूर्य देव की आराधना करते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • सादगी और पवित्रता: यह गीत हमें सिखाता है कि जीवन में सादगी और विचारों की शुद्धता सबसे महत्वपूर्ण है।
  • पारिवारिक एकता: बहँगी उठाने और घाट सजाने में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग आवश्यक होता है, जो एकता को बढ़ावा देता है।
  • प्रकृति के प्रति आभार: सूर्य, जल, बांस और मिट्टी के बर्तनों का उपयोग हमें प्रकृति के करीब लाता है और उसके प्रति कृतज्ञता सिखाता है।
  • कठिन साधना और अनुशासन: छठ का व्रत अत्यंत कठिन होता है, जो हमें मानसिक और शारीरिक रूप से अनुशासित बनाता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत विशेष रूप से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय महापर्व के दौरान सुना जाता है।

  1. नहाय-खाय (प्रथम दिन): इस दिन से ही घरों में भक्तिमय माहौल बन जाता है और यह गीत गूंजने लगता है।
  2. खरना (द्वितीय दिन): शाम को प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का निर्जला व्रत शुरू होता है, तब यह गीत मन को शांति देता है।
  3. संध्या अर्घ्य (तृतीय दिन): जब पूरा परिवार दउरा लेकर घाट की ओर प्रस्थान करता है, तब यह गीत हर गली-मोहल्ले में बजता है।
  4. उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिन): उगते सूर्य को अर्घ्य देते समय इस गीत का गायन अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

विषय संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक छठ घाट सुहावन लागे
मुख्य देव/देवी भगवान सूर्य देव एवं छठी मैया (षष्ठी देवी)
गायक कलाकार अंकुश राजा और आनंद मोहन
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, बांसुरी, शहनाई, मंजीरा
काव्य रस भक्ति रस, शांत रस, वात्सल्य रस
मुख्य संदेश प्रकृति पूजा, सामाजिक समरसता और अटूट श्रद्धा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय छठ गीत को सुप्रसिद्ध भोजपुरी गायक अंकुश राजा और वरिष्ठ कलाकार आनंद मोहन ने मिलकर गाया है।

'बहंगिया' या बहँगी बांस से बना एक लचीला ढांचा होता है, जिसके दोनों सिरों पर टोकरियां (दउरा) लटकाई जाती हैं। इसमें छठ पूजा का पवित्र प्रसाद रखकर पुरुष श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं।

सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो पूरी सृष्टि को ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। उन्हें अर्घ्य देकर श्रद्धालु उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और अच्छे स्वास्थ्य व समृद्धि की कामना करते हैं।

छठ पूजा का महापर्व पूरे चार दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, उसके बाद खरना, फिर संध्या अर्घ्य और अंत में उषा अर्घ्य के साथ व्रत का पारण होता है।

हाँ, यह एक अत्यंत पवित्र और सात्विक भजन है। इसे घर की सफाई करते समय, पूजा के दौरान या शाम की आरती के समय बजाने से घर का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

ठेकुआ गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बना एक पारंपरिक और अत्यंत शुद्ध पकवान है। इसे मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी की आंच पर बनाया जाता है। यह छठ मैया का सबसे प्रिय प्रसाद माना जाता है।

यह गीत मुख्य रूप से भोजपुरी भाषा में है, जो अपनी मिठास और लोक संस्कृति के जीवंत चित्रण के लिए जानी जाती है।

छठ पूजा में भगवान सूर्य देव की मानस बहन 'षष्ठी देवी' जिन्हें स्थानीय भाषा में 'छठी मैया' कहा जाता है, की पूजा की जाती है। वे बच्चों की रक्षा करने वाली और संतान सुख देने वाली देवी हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "छठ घाट सुहावन लागे" गीत के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लोकगीत हमारी संस्कृति की धरोहर हैं और यह गीत आधुनिक पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सराहनीय प्रयास है। इस सामग्री का संपादन और संकलन सनातन धर्म के ग्रंथों, लोक परंपराओं और संगीत विशेषज्ञों के परामर्श के आधार पर किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री — सर्वाधिकार सुरक्षित।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण: सूर्य देव की स्तुति और उनके रथ का वर्णन।
  • ऋग्वेद: उषा और सविता (सूर्य) देव की आराधना के प्राचीन मंत्र।
  • लोक परंपराएं: बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में गाए जाने वाले पारंपरिक छठ गीत।
  • संगीत संदर्भ: अंकुश राजा ऑफिशियल एल्बम (2021)।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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