"लेके माथे पे दउरिया" (Leke Mathe Pe Dauriya) एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भोजपुरी छठ गीत है, जिसे प्रसिद्ध लोक गायक अंकुश राजा ने अपने सुरीले स्वर से सजाया है। यह गीत लोक आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' के पावन अवसर पर गाया जाने वाला एक ऐसा भजन है जो हर श्रद्धालु के हृदय में भक्ति, समर्पण और श्रद्धा का संचार करता है। सनातन धर्म में छठ पूजा का स्थान अत्यंत विशिष्ट है, जहां प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य देव और छठी मैया की आराधना की जाती है। इस गीत में एक भक्त की उस पावन यात्रा का वर्णन है, जिसमें वह अपने सिर पर 'दउरिया' (बांस की टोकरी जिसमें पूजा की सामग्री, ठेकुआ और फल होते हैं) रखकर नदी के घाट की ओर प्रस्थान करता है। यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत (विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश) की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक एकजुटता और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम का जीवंत प्रतीक है। इस लेख में हम इस पावन गीत के बोल, इसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
(कोरस / मुखड़ा)
लेके माथे पे दउरिया, चलली बहिनिया हो,
घाटवा पे भीड़ भारी बा...
करेलू पुकार छठी माई से बहिनिया हो,
गोदी में बालक दे दीहीं ना...
लेके माथे पे दउरिया, चलली बहिनिया हो,
घाटवा पे भीड़ भारी बा...
(अंतरा 1)
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए हो,
बहंगी लचकत जाए...
उहे पर सुगा मँडराए, जे सुगा मारबो धनुष से,
सुगा गिरे मुरझाय हो...
लेके माथे पे दउरिया, चलली बहिनिया हो,
घाटवा पे भीड़ भारी बा...
(अंतरा 2)
केरवा के पात पर उगेलन सुरुज देव हो,
झाँकेलन-झाँकेलन सुरुज देव...
अँखिया के सोझा उगेलन सुरुज देव हो,
अरघ के बेर भइले ना...
लेके माथे पे दउरिया, चलली बहिनिया हो,
घाटवा पे भीड़ भारी बा...
(अंतरा 3)
सजल बा घाट सब पावन भइल बा हो,
गंगा जी के पावन तीर...
अंकुश राजा गावेले भजनिया हो,
मैया हरलीं सभकर पीर...
लेके माथे पे दउरिया, चलली बहिनिया हो,
घाटवा पे भीड़ भारी बा...
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह पावन छठ गीत "लेके माथे पे दउरिया" अत्यंत सरल शब्दों में गहरी भक्ति संवेदनाओं को व्यक्त करता है। इसका विस्तृत भावार्थ निम्नलिखित है:
मुखड़ा: गीत की शुरुआत में वर्णन है कि एक व्रती महिला (बहिनिया) अपने सिर पर पूजा की पवित्र दउरिया (बांस की टोकरी) लेकर नदी के घाट की ओर बढ़ रही है। घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई है। वह छठी मैया से प्रार्थना करती है कि हे माता! मेरी सूनी गोद को भर दीजिए और मुझे संतान का सुख प्रदान कीजिए। यह पंक्ति मातृत्व की लालसा और छठी मैया के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाती है।
प्रथम अंतरा: इस अंतरे में पारंपरिक छठ गीतों के प्रसिद्ध बिंब "कांच ही बांस के बहंगिया" का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है कि कच्चे बांस से बनी बहंगी (कांवर) भार के कारण लचक रही है। उस बहंगी पर पवित्र फल रखे हैं, जिन पर एक तोता (सुगा) मंडरा रहा है। व्रती कहती है कि यदि तोता इन फलों को जूठा करेगा, तो उसे धनुष से मार दिया जाएगा। यह पंक्ति पूजा की शुद्धता, पवित्रता और सतर्कता को रेखांकित करती है, क्योंकि छठ पूजा में स्वच्छता और पवित्रता का अत्यधिक महत्व है।
द्वितीय अंतरा: यहाँ भगवान सूर्य देव के उदय होने का सुंदर चित्रण है। केले के पत्तों के पीछे से भगवान भास्कर धीरे-धीरे उदित हो रहे हैं। अब अर्घ्य देने का समय हो गया है। भक्त व्याकुलता और श्रद्धा से सूर्य देव के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे उन्हें जल और दूध का अर्घ्य समर्पित कर सकें।
तृतीय अंतरा: अंतिम पंक्तियों में गंगा नदी के पावन किनारे और सजे हुए घाटों की सुंदरता का वर्णन है। गायक अंकुश राजा कहते हैं कि जो भी भक्त सच्चे मन से छठी मैया की आराधना करता है और उनके भजन गाता है, माता उसके जीवन के सभी कष्टों और दुखों (पीर) को हर लेती हैं।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस गीत की मुख्य भावना 'पूर्ण समर्पण' (Total Surrender) और 'श्रद्धा' (Faith) है। छठ महापर्व में किसी पुरोहित या मंत्रोच्चार की आवश्यकता नहीं होती; यह सीधे भक्त और भगवान के बीच का संवाद है। गीत का संदेश है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है। एक साधारण बांस की टोकरी (दउरिया), घर में बने शुद्ध पकवान (ठेकुआ) और सच्चे मन की पुकार से ही भगवान सूर्य और छठी मैया प्रसन्न हो जाते हैं। यह गीत सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है, जहाँ समाज के सभी वर्ग एक साथ मिलकर नदी के घाट पर बिना किसी भेदभाव के खड़े होते हैं और अर्घ्य देते हैं।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण बिंदु (Parameter) | जानकारी (Details) |
|---|---|
| गीत का नाम (Song Name) | लेके माथे पे दउरिया (Leke Mathe Pe Dauriya) |
| मुख्य गायक (Singer) | अंकुश राजा (Ankush Raja) |
| गीत की भाषा (Language) | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| विधा (Genre) | छठ लोकगीत / भजन (Chhath Geet / Devotional) |
| मुख्य विषय (Theme) | छठ पूजा, सूर्य उपासना, छठी मैया की महिमा |
| संबद्ध त्योहार (Festival) | छठ महापर्व (Chhath Puja) |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
इस गीत को भोजपुरी संगीत जगत के प्रसिद्ध युवा कलाकार जोड़ी अंकुश राजा ने गाया है। अंकुश राजा अपनी सुरीली आवाज और पारंपरिक गायन शैली के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने इस गीत में आधुनिक संगीत के साथ-साथ पारंपरिक लोक धुनों का ऐसा अद्भुत मिश्रण किया है कि यह सुनते ही श्रोताओं को भक्ति के सागर में सराबोर कर देता है। इस गीत के माध्यम से कलाकारों ने छठ पर्व की उस पारंपरिक भावना को सहेजने का प्रयास किया है, जो सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द (Word) | सरल अर्थ (Simple Meaning) | सांस्कृतिक संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| दउरिया (Dauriya) | बांस की बनी टोकरी | इसमें छठ पूजा का प्रसाद और फल रखकर घाट पर ले जाया जाता है। |
| बहंगिया (Bahangiya) | कांवर या बहंगी | बांस का बना ढांचा जिससे दोनों ओर टोकरियां लटकाकर कंधे पर ले जाया जाता है। |
| अरघ (Arghya) | अर्घ्य (जल या दूध का अर्पण) | उगते और डूबते सूर्य को दिया जाने वाला पवित्र अर्पण। |
| सुगा (Suga) | तोता | छठ गीतों में पवित्रता के प्रतीक और फलों की सुरक्षा के संदर्भ में प्रयुक्त। |
| पीर (Peer) | कष्ट, दुख या दर्द | भक्तों के जीवन की कठिनाइयां जिन्हें माता दूर करती हैं। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ पूजा का त्योहार वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। "लेके माथे पे दउरिया" गीत इस पर्व के व्यावहारिक और भावनात्मक पक्ष को उजागर करता है।
- प्रकृति की पूजा: इस गीत में बांस, केला, नारियल और सूर्य देव का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि सनातन धर्म में प्रकृति को ही ईश्वर का रूप माना गया है।
- कठिन साधना: छठ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। इसमें 36 घंटों का निर्जला उपवास रखा जाता है। गीत में "माथे पे दउरिया" लेकर पैदल घाट तक जाने का दृश्य इस कठिन साधना और शारीरिक-मानसिक तपस्या को दर्शाता है।
- समानता का संदेश: घाट पर अमीर-गरीब सभी एक समान मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनाते हैं और एक ही नदी के पानी में खड़े होकर पूजा करते हैं। यह गीत इसी सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है।
इस पावन अवसर पर भक्त अक्सर कृष्ण स्तोत्र और पार्वती स्तोत्र का भी स्मरण करते हैं, जो सनातन परंपरा में शक्ति और भक्ति के समन्वय को दर्शाता है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
यह गीत हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:
- शुद्धता और अनुशासन: जैसे गीत में प्रसाद की शुद्धता के लिए तोते को भी दूर रखने की बात कही गई है, वैसे ही हमें अपने विचारों और कर्मों में भी शुद्धता रखनी चाहिए।
- धैर्य और प्रतीक्षा: "अरघ के बेर भइले ना" की प्रतीक्षा हमें सिखाती है कि जीवन में सही समय आने पर ही फल मिलता है, तब तक हमें धैर्यपूर्वक अपनी साधना जारी रखनी चाहिए।
- पारिवारिक सहयोग: छठ पूजा में पूरा परिवार एक साथ मिलकर काम करता है। कोई दउरिया उठाता है, कोई घाट सजाता है। यह गीत हमें एकजुटता और पारिवारिक प्रेम की सीख देता है।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह गीत विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय छठ महापर्व के दौरान सुना और गाया जाता है। विशेषकर:
- खरना के दिन: जब व्रती प्रसाद तैयार करते हैं।
- संध्या अर्घ्य के समय: जब सभी श्रद्धालु अपने सिर पर दउरिया रखकर घाट की ओर प्रस्थान करते हैं। इस समय यह गीत हर गली-मोहल्ले और घाट पर गूंजता है।
- उषा अर्घ्य के समय: सुबह के समय जब सूर्य देव के उदित होने की प्रतीक्षा की जाती है।
इसके अतिरिक्त, घरों में होने वाले मांगलिक कार्यों या पारिवारिक सत्संगों में भी लोग भक्ति भाव से इसे सुनते हैं। इस दौरान भगवान की आरती जैसे ओम जय जगदीश हरे आरती का गान भी घर के वातावरण को अत्यंत पवित्र बना देता है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| विषय (Topic) | संक्षिप्त विवरण (Quick Info) |
|---|---|
| गीत का शीर्षक | लेके माथे पे दउरिया |
| मुख्य देव/देवी | सूर्य देव, छठी मैया |
| गायक | अंकुश राजा |
| मुख्य वाद्य यंत्र | ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, सिंथेसाइज़र |
| काव्य रस | भक्ति रस, वात्सल्य रस |
| मुख्य संदेश | पवित्रता, समर्पण, प्रकृति प्रेम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की समीक्षा करते हुए हमारे संपादकीय बोर्ड ने पाया कि यह गीत न केवल संगीत की दृष्टि से मधुर है, बल्कि यह सनातन धर्म की उस महान परंपरा को भी जीवित रखता है जिसमें प्रकृति और मानव का अटूट संबंध दिखाया गया है। लोकगीतों के माध्यम से नई पीढ़ी तक अपनी संस्कृति को पहुँचाने का यह एक अत्यंत सराहनीय प्रयास है। इस गीत के बोल और भावार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है ताकि भक्तगण इसके गहरे अर्थ को समझ सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता - सूर्य उपासना और प्रकृति पूजा के संदर्भ।
- पारंपरिक भोजपुरी लोक साहित्य एवं छठ पूजा पद्धति।
- अंकुश राजा आधिकारिक संगीत एल्बम और प्रस्तुतियां।
- सनातन धर्म के प्रमुख व्रत एवं त्योहार संकलन।
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