ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि हे नटराजन नमोः नमो - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि
देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित यह पावन भजन "ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि हे नटराजन नमोः नमो (Om Namah Shivaya Damru Paani Shool Lyrics in Hindi)" सनातन devotional परंपरा का एक अत्यंत ऊर्जावान, मनमोहक और वैराग्यपूर्ण संकीर्तन है। शिव का शाब्दिक अर्थ ही 'कल्याणकारी' है, और उनके विभिन्न स्वरूप इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार के अनंत चक्र को दर्शाते हैं। इस स्तुति के माध्यम से साधक शिव के उस विराट स्वरूप का ध्यान करता है, जिसके एक हाथ में सृष्टि के नाद का प्रतीक 'डमरू' और दूसरे हाथ में अधर्म का नाश करने वाला 'शूल' (त्रिशूल) सुशोभित है, तथा जो ब्रह्मांडीय नृत्य (लास्य और तांडव) के अधिपति 'नटराज' के रूप में संपूर्ण चराचर जगत में रमे हुए हैं। शिव भक्ति का यह मार्ग साधक को सांसारिक मोह-माया, राग-द्वेष और अज्ञानता के बंधनों से मुक्त कर परम चेतना की ओर अग्रसर करता है। महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, प्रदोष व्रत तथा दैनिक संध्या वंदन के अवसर पर इस भजन का गान और स्मरण करने से चित्त को असीम शांति, मानसिक स्थिरता और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि हे नटराजन नमोः नमो
(मुखड़ा)
ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि,
हे नटराजन नमोः नमो।
गंगा धारी जटाधारी सोमेश तुम्हारा ध्यान धरे,
भक्त तुम्हारे चरणों में शीश झुकाएं, भव से तरे।
(प्रथम अंतरा)
डमरू बाजे तो गूंजे गगन सारा,
तुम्ही हो पालनहार जगत का, तुम्ही हो रखवाला।
शूल उठाए जो पाप का करे संहार,
तुम्हारी शरण में आए जो, पावे भवपार।
(द्वितीय अंतरा)
नटराज रूप धरे जब तांडव तुम मचाते,
सृष्टि के प्रलय का संदेश सुनाते।
भस्म रमाने वाले भोले भंडारी,
त्रिपुरारी हे महेश्वर, महिमा तुम्हारी न्यारी।
(तृतीय अंतरा)
विष का पान किया तूने नीलकंठ कहलाए,
देव और दानव सब तेरी शरण में आए।
मृत्युंजय महाकाल तेरी जय जयकार,
तुझमें ही लीन हो जाए यह संसार।
(अन्त्य / समापन)
ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि,
हे नटराजन नमोः नमो।
हर हर महादेव शंभू, काशी विश्वनाथ गंगे!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति भगवान शिव के महान गुणों, उनके दिव्य स्वरूप और उनके स्वभाव का अत्यंत सुंदर वर्णन करती है। 'डमरू पाणि' का अर्थ है जिसके हाथ में डमरू है, और 'शूल पाणि' का अर्थ है जिसके हाथ में त्रिशूल सुशोभित है। डमरू की ध्वनि (नाद) से ही इस ब्रह्मांड में प्रथम कंपन उत्पन्न हुआ था, जिसे संगीत शास्त्र और वेदों में 'प्रणव ध्वनि' या 'नादब्रह्म' कहा गया है। वहीं, त्रिशूल इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति का प्रतीक है, जो साधक के भीतर के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) तथा विकारों का नाश करता है।
भजन के दूसरे भाग में भगवान शिव को 'नटराज' के रूप में संबोधित किया गया है। नटराज का तांडव नृत्य केवल विनाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह पुरानी, जीर्ण-शीर्ण व्यवस्था को समाप्त कर नई और शुद्ध सृष्टि के सृजन का मार्ग प्रशस्त करता है। 'भस्म रमाने वाले भोले भंडारी' यह दर्शाते हैं कि भौतिक शरीर की अंतिम सच्चाई केवल राख (भस्म) है, अतः मनुष्य को अहंकार का त्याग कर भगवान की शरण में आना चाहिए। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान कर 'नीलकंठ' कहलाने वाले महादेव संपूर्ण सृष्टि के रक्षक हैं, जो अपने भक्तों के सभी संकटों को स्वयं हर लेते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन शिव भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है क्योंकि यह संक्षिप्त रूप में शिव पुराण और वेद-पुराणों के सार को प्रस्तुत करता है। इस भजन के गान से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ और अनुभूतियों की प्राप्ति होती है:
- मानसिक शांति: डमरू की लय और शिव के नाम का स्मरण चित्त के विकारों और तनाव को दूर करता है।
- वैराग्य भाव: भस्म और शूल पाणि के स्वरूप का स्मरण मनुष्य को भौतिकता से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है।
- भय मुक्ति: महाकाल और मृत्युंजय स्वरूप के स्मरण से अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है।
- समर्पण की भावना: यह भजन साधक को अहंकार त्याग कर महादेव के चरणों में पूर्ण शरणागति की प्रेरणा देता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भगवान शिव की आराधना और इस भजन का गायन किसी भी पवित्र समय किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका फल कई गुना बढ़ जाता है:
- नित्य पूजा: प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्या बेला में स्नान उपरांत शिव मंदिर या घर के पूजा गृह में।
- प्रदोष व्रत: त्रयोदशी तिथि (प्रदोष काल) के समय भगवान शिव के अभिषेक के पश्चात।
- सावन मास: सावन के प्रत्येक सोमवार को देवादिदेव महादेव का जलाभिषेक करते समय।
- महाशिवरात्रि: रात्रि के चारों प्रहर की पूजा और जागरण के दौरान इस संकीर्तन का विशेष महत्व है।
- सत्संग एवं अनुष्ठान: शिव कथा, रुद्राभिषेक या धार्मिक अनुष्ठानों के प्रारंभ में सामूहिक संकीर्तन के रूप में।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में देवादिदेव महादेव भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और भगवान गणेश विराजमान हैं। शैव परंपरा के अनुसार, भगवान शिव आदिगुरु हैं, जिन्होंने संपूर्ण योग, संगीत, नृत्य (नटराज) और तंत्र विद्या का इस संसार को ज्ञान दिया है। आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और तमाम महान संतों ने शिव तत्व को 'सत्-चित्-आनंद' का साकार रूप माना है। शिव जी के साथ जुड़े अन्य स्तोत्रों जैसे शिव तांडव स्तोत्र और शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करने से साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा में तीव्र वृद्धि होती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन सरल, प्रवाहमयी और आम जनमानस की समझ में आने वाली हिंदी-अवधी मिश्रित शैली में रचित है। इसमें संस्कृत के पावन शब्दों जैसे 'डमरू पाणि', 'शूल पाणि', 'नटराजन', 'सोमेश', 'त्रिपुरारी' और 'मृत्युंजय' का अत्यंत सुंदर और सटीक प्रयोग किया गया है। काव्यात्मक दृष्टि से इसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की छटा देखने को मिलती है, जो इसे गाने में अत्यंत संगीतमय और कर्णप्रिय बनाती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक गहन दार्शनिक संदेश है:
- अहंकार का त्याग: जैसे शिव भस्म लगाते हैं, वैसे ही मनुष्य को अपने भीतर के मैं (अहंकार) को समाप्त करना चाहिए।
- धैर्य और सहनशीलता: विषपान करने के पश्चात भी शांत रहने वाले नीलकंठ की तरह जीवन की कठिनाइयों में धैर्य रखना चाहिए।
- कर्तव्य और न्याय: शूल पाणि का अर्थ है अन्याय और अधर्म का नाश करना; अतः जीवन में हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| डमरू पाणि | जिसके हाथ में डमरू हो | सृष्टि के नाद और ब्रह्मांडीय कंपन के नियंत्रक |
| शूल पाणि | जिसके हाथ में त्रिशूल हो | समस्त दुखों और अधर्म का संहारक |
| नटराजन | नृत्यों के देवता (नटराज) | ब्रह्मांडीय गति, लास्य और तांडव के अधिपति |
| सोमेश | चंद्रमा को धारण करने वाले | मन के नियंत्रणकर्ता और शीतलता प्रदान करने वाले |
| त्रिपुरारी | त्रिपुर का वध करने वाले | अहंकार और त्रिगुणात्मक माया के विजेता |
| मृत्युंजय | मृत्यु को जीतने वाले | काल के भी महाकाल, मोक्ष प्रदाता |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि, हे नटराजन नमोः नमो।"
भावार्थ: हम उन भगवान शिव को बारंबार नमन करते हैं जिनके हाथों में सृष्टि का नाद जगाने वाला डमरू और दुखों का नाश करने वाला त्रिशूल सुशोभित है, तथा जो ब्रह्मांडीय नृत्य के देवता नटराज के रूप में पूजनीय हैं।
"गंगा धारी जटाधारी सोमेश तुम्हारा ध्यान धरे, भक्त तुम्हारे चरणों में शीश झुकाएं, भव से तरे।"
भावार्थ: मस्तक पर पावन गंगा को धारण करने वाले और जटाओं में चंद्रमा को सजाने वाले सोमेश्वर का जो भक्त ध्यान करते हैं, वे इस भवसागर से आसानी से तर जाते हैं।
"विष का पान किया तूने नीलकंठ कहलाए, देव और दानव सब तेरी शरण में आए।"
भावार्थ: समुद्र मंथन के समय हलाहल विष को अपने कंठ में रोककर संसार की रक्षा करने वाले नीलकंठ की शरण में देवता और असुर दोनों ही कल्याण की कामना से आते हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के साथ साधक को भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय तथा निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र का जप भी अवश्य करना चाहिए:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| भजन का नाम | ॐ नमः शिवाय डमरू पाणि शूल पाणि हे नटराजन नमोः नमो |
| आराध्य देव | देवादिदेव महादेव भगवान शिव |
| भाषा | हिंदी एवं संस्कृत निष्ठ पदावली |
| मुख्य थीम | शिव स्तुति, वैराग्य, भक्ति और शरणागति |
| प्रमुख भाव | भक्ति, समर्पण, आदर और शांति |
| उपयुक्त अवसर | महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन ग्रंथों, शिव पुराण, पौराणिक परंपराओं और लोक-भक्ति के स्रोतों का अध्ययन करके तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और उच्च कोटि की भक्ति सामग्री पहुँचाना है। यह सामग्री पूरी तरह से लोक-कल्याण और आध्यात्मिक प्रेरणा के उद्देश्य से "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत प्रकाशित की गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव महापुराण - गीता प्रेस गोरखपुर
- वैदिक स्तोत्र एवं भजन संग्रह - सनातन धर्म प्रकाशन
- शिव तांडव एवं स्तोत्र परंपरा - भारतीय दार्शनिक ग्रंथ
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