Parvati Stotram

क्यों कंगन को तरसे गौरा भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

68 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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क्यों कंगन को तरसे गौरा भक्ति इन हिंदी लिरिक्स - भगवान शिव और माता पार्वती का पावन प्रेम और समर्पण

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "क्यों कंगन को तरसे गौरा भक्ति इन हिंदी लिरिक्स" भगवान शिव और माता पार्वती के अलौकिक प्रेम, वैराग्य और गृहस्थ जीवन के अनूठे सामंजस्य का जीवंत चित्रण करता है। सनातन धर्म में शिव-पार्वती का संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि आदि-शक्ति और परम ब्रह्म का मिलन है, जहां ऐश्वर्य की कोई कामना नहीं होती, केवल परम प्रेम और भक्ति का साम्राज्य होता है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में माता गौरा (पार्वती जी) की सहज मानवीय भावनाएं और भोलेनाथ की परम वैरागी छवि का अद्भुत संवाद झलकता है। इस सुंदर रचना के माध्यम से साधक के अंतर्मन में भक्ति, त्याग और समर्पण रूपी अमृत का संचार होता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, शिव-पार्वती के पौराणिक प्रसंगों तथा दैनिक साधना में इसके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...

मूलाधार (स्थायी):

क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में।
सब कुछ है तेरे ही घर में, फिर क्यों कमी संसार में॥
कैलाश तुम्हारा डेरा है, भक्तों का लगा जो फेरा है।
भोले भंडारी की महिमा, फैली है हर उस पार में॥
क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...॥

अंतरा 1:

सोना-चाहे चांदी मांगो, हीरे-मोती या मणि लाओ।
आदेश करो माता रानी, तुम अपनी इच्छा बतलाओ॥
पर भोलेनाथ की दुनिया में, वैराग्य का पहरा भारी है।
वे रमाए भभूत फिरें हैं, न चाह उन्हें संसारी है॥
फिर भी तेरी हर इच्छा को, सर आंखों पर धारे हैं।
क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...॥

अंतरा 2:

देवों के देव महादेव हैं, जो तीनों लोक के स्वामी हैं।
वे बाघ की खाल ओढ़े हैं, विष पीने वाले नामी हैं॥
नंदी पर जिनकी सवारी है, सर्पों का हार सजाते हैं।
वे योगेश्वर शिव शंकर तो, बस ध्यान में ही रम जाते हैं॥
उनको रीझाना कठिन नहीं, बस प्रेम की डोरी प्यारी है।
क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...॥

अंतरा 3:

माता ने हंसकर समझाया, मुझे गहनों की चाहत कब है।
मेरा कंगन तो मेरे भोले का, पावन चरणों में जब है॥
जो जगत को सब कुछ देते हैं, मैं उनसे क्या मांगू और?
मेरे भाग में तो सेवा लिखी है, भोले के चरणों की ओर॥
यही प्रेम अमर है जग में, जो गाए संसार सारे हैं।
क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल एक साधारण संवाद नहीं है, बल्कि यह भौतिक सुखों और आध्यात्मिक वैभव के बीच के अंतर को बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है। भजन के प्रारंभ में एक भक्त या सखी माता पार्वती से प्रश्न करती है कि कैलाश के वैभवहीन वातावरण में, जहां केवल बर्फ और वैराग्य है, माता कंगन या अन्य आभूषणों के लिए क्यों तरसती हैं, जबकि वे त्रिभुवन की स्वामिनी हैं।

प्रथम अंतरे में यह स्पष्ट किया जाता है कि भगवान शिव का स्वरूप सांसारिक मोह-माया से परे है। वे भभूत रमाते हैं और उन्हें स्वर्ण या रत्नों की कोई अभिलाषा नहीं है। हालांकि वे सर्वशक्तिमान हैं और सब कुछ प्रदान कर सकते हैं, परंतु उनका अपना जीवन पूर्णतः संयमित और त्यागपूर्ण है।

तृतीय अंतरे में इस भजन का सबसे सुंदर और दार्शनिक मोड़ आता है जहां माता पार्वती स्वयं उत्तर देती हैं कि उन्हें स्वर्ण या कंगन के आभूषणों की कोई वास्तविक लालसा नहीं है। उनका असली आभूषण तो भगवान शिव के चरणों की भक्ति और उनकी सेवा है। जो देवों के देव हैं, जिनकी शरण में संपूर्ण ब्रह्मांड है, उनकी संगिनी होने के नाते समस्त भौतिक वस्तुएं गौण हो जाती हैं। यह भावार्थ हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम और भक्ति के आगे संसार के समस्त स्वर्ण और आभूषण अत्यंत तुच्छ प्रतीत होते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस पावन भजन की विशेषताएं इसकी सादगी, मार्मिकता और उच्च कोटि के दार्शनिक संदेश में निहित हैं। यह भजन शिव-पार्वती के घरेलू और पारिवारिक जीवन के उस स्वरूप को उजागर करता है, जहां सांसारिक कमियों के बावजूद प्रेम और समर्पण सर्वोच्च स्थान रखता है।

  • भक्ति और वैराग्य का संगम: यह भजन भगवान शिव के वैराग्य और माता पार्वती के गृहस्थ धर्म के बीच के सुंदर संतुलन को दर्शाता है।
  • सांसारिक मोह से मुक्ति: भजन यह सिखाता है कि भौतिक वस्तुएं क्षणिक हैं, जबकि ईश्वर की भक्ति और उनका सान्निध्य ही शाश्वत सुख है।
  • पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्य: सनातन परंपरा में शिव-पार्वती को आदर्श दंपत्ति माना गया है, और यह भजन उनके आपसी संवाद के माध्यम से आदर्श संबंधों की प्रेरणा देता है।
  • कीर्तन का आनंद: इस भजन की लय और धुन इतनी मधुर है कि इसे किसी भी महाशिवरात्रि व्रत, सोमवार की पूजा या जागरण के दौरान आसानी से गाया जा सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत की पूर्णता उसके उचित समय, स्थान और भाव के साथ श्रवण या गायन में है। "क्यों कंगन को तरसे गौरा" भजन को गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित अवसरों को श्रेष्ठ माना गया है:

  • साप्ताहिक प्रदोष काल या सोमवार व्रत: भगवान शिव को समर्पित सोमवार के दिन या प्रदोष काल में संध्या के समय इस भजन का स्मरण करने से मन को असीम शांति मिलती है।
  • महाशिवरात्रि और सावन मास: सावन के पवित्र महीने में जब शिव भक्त कांवड़ यात्रा करते हैं या शिवालयों में अनुष्ठान होते हैं, तब यह भजन विशेष रूप से गूंजता है।
  • पारिवारिक सत्संग एवं जागरण: घर में होने वाले छोटे-मोटे धार्मिक अनुष्ठानों, भजन संध्या या माता पार्वती के पूजन (जैसे मंगला गौरी व्रत) के दौरान इसे सामूहिक रूप से गाया जा सकता है।
  • नित्य पूजा के पश्चात: सुबह या संध्या की आरती के उपरांत कुछ क्षण शांत बैठकर इस भजन के भावों का मनन करने से ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में देवों के देव महादेव (भगवान शिव) और जगत जननी माता पार्वती (गौरा) हैं। सनातन संस्कृति में शिव को 'आदि गुरु' और 'महायोगी' माना गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के पालन, संहार और कल्याण के कारक हैं। वहीं माता पार्वती शक्ति, ऊर्जा, करुणा और मातृत्व की प्रतीक हैं। इन दोनों की कथाएं और प्रसंग पुराणों जैसे शिव पुराण कथा में विस्तार से वर्णित हैं। इस भजन के रचयिताओं ने लोकगीतों की परंपरा से प्रेरणा लेते हुए शिव-पार्वती के घरेलू जीवन को अत्यंत सजीव और सरल शब्दों में पिरोया है, जो हर आयु वर्ग के भक्त के हृदय को आसानी से छू लेता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सुबोध और लोक-व्यवहार के अनुकूल (हिंदी एवं अवधी-ब्रज मिश्रित बोलचाल की भाषा) है। इसमें शास्त्रीय शब्दों के स्थान पर ग्रामीण और पारंपरिक संकीर्तन की शैलियों का प्रयोग किया गया है, जिससे आम से आम व्यक्ति भी इसके भावों को तुरंत समझ सकता है। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें लयात्मकता, अनुप्रास और भावुक संवाद का अद्भुत प्रयोग हुआ है, जो श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल आनंद ही नहीं देता, बल्कि जीवन जीने के कई मूल्यवान पाठ भी पढ़ाता है:

  • संतोष ही सबसे बड़ा धन है: माता पार्वती के चरित्र के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि भौतिक सुखों के पीछे भागने के बजाय जीवन में संतोष और आंतरिक शांति होना अधिक महत्वपूर्ण है।
  • प्रेम में त्याग की प्रधानता: सच्चा प्रेम महलों या गहनों का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह विपरीत परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रेरणा देता है।
  • अहंकार का त्याग: महादेव का वैराग्य और माता गौरा की सहजता हमें सिखाती है कि जीवन में दिखावे और अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक / संदर्भगत अर्थ
कंगन हाथ का आभूषण / चूड़ी संसार के भौतिक सुख और श्रृंगार का प्रतीक
गौरा माता पार्वती / गोरे रंग वाली आदि शक्ति, जो समस्त प्रकृति की स्वामिनी हैं
कैलाश भगवान शिव का निवास पर्वत परम शांति, वैराग्य और उच्च साधना का स्थल
भभूत राख / विभूति नश्वरता का प्रतीक और सभी सांसारिक बंधनों से मुक्ति
वैराग्य मोह-माया से विरक्ति ईश्वर प्राप्ति के लिए संसार के विकारों से ऊपर उठना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: क्यों कंगन को तरसे गौरा, भोले के दरबार में...
भावार्थ: यह पंक्ति इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करती है कि त्रिभुवन की स्वामिनी होने के बावजूद माता पार्वती को क्या ऐसी कमी है जो उन्हें भौतिक सुखों (कंगन) के लिए विचारशील बनाती है, जबकि वे स्वयं शिव दरबार में हैं।

पंक्ति: पर भोलेनाथ की दुनिया में, वैराग्य का पहरा भारी है...
भावार्थ: भगवान शिव का धाम भोग-विलासिता का स्थान नहीं, बल्कि महायोग और त्याग का केंद्र है। वहां सोने-चांदी से अधिक महत्व ध्यान और आंतरिक शुद्धि का है।

पंक्ति: मेरा कंगन तो मेरे भोले का, पावन चरणों में जब है...
भावार्थ: माता पार्वती का यह उत्तर समस्त संसार को यह बताता है कि उनके लिए भगवान शिव के चरणकमल ही सबसे बड़े आभूषण और दुनिया का संपूर्ण वैभव हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक गहरा करने के लिए निम्नलिखित पावन मंत्रों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:

ॐ नमः शिवाय॥

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयाारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥

अर्थ: जो कपूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और जिनके गले में सर्पों का हार है, वे भगवान शिव और माता भवानी (पार्वती) मेरे हृदय में सदैव निवास करें, उन्हें मेरा नमन है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य / जानकारी
भजन का नाम क्यों कंगन को तरसे गौरा भक्ति इन हिंदी लिरिक्स
ाराध्य देवता भगवान शिव एवं माता पार्वती (महादेव व गौरा)
संगीत शैली पारंपरिक लोक भजन / संकीर्तन
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित बोलचाल
प्रमुख भाव भक्ति, वैराग्य, प्रेम, समर्पण और संतोष
उपयुक्त अवसर सोमवार व्रत, महाशिवरात्रि, सावन मास, जागरण
मुख्य संदेश भौतिक सुखों से ऊपर उठकर ईश्वर के चरणों में प्रेम रखना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पावन भजन प्रमुख रूप से देवों के देव महादेव (भगवान शिव) और जगत जननी माता पार्वती (गौरा) के पावन प्रेम, त्याग और संवाद को समर्पित है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि भौतिक आभूषण और सांसारिक सुख क्षणिक हैं। सच्चा सुख और वैभव ईश्वर के चरणों की भक्ति, संतोष और सच्चे प्रेम में ही निहित है।

इसे महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, प्रदोष व्रत, माता पार्वती के पूजन और पारिवारिक जागरण या सत्संग के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।

हां, आप इसे सुबह या संध्या की पूजा के समय या आरती के पश्चात अपनी श्रद्धा के अनुसार आसानी से गा सकते हैं। इससे घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।

शिव और माता पार्वती के विवाह, उनके जीवन तथा उनकी लीलाओं का विस्तृत वर्णन प्रमुख रूप से शिव महापुराण में प्राप्त होता है।

यह भजन हमें सिखाता है कि दिखावे की दुनिया से दूर रहकर अपने जीवन में संतोष अपनाना चाहिए और कठिन परिस्थितियों में भी अपनों के प्रति प्रेम व समर्पण कम नहीं होने देना चाहिए।

निश्चित रूप से, भजन में भगवान शिव के भभूत लगाने और योग में लीन रहने के प्रसंग उनके महान वैराग्य और भौतिकता से विरक्ति के स्वरूप को बहुत स्पष्ट रूप से समझाते हैं।

इस भजन के स्मरण से मन शांत होता है, भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है तथा साधक के भीतर सात्विक और भक्तिमय विचारों का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिकुल (Bhaktilok.in) की संपादकीय टीम द्वारा सनातन धार्मिक परंपराओं, लोक कथाओं और शिव-पार्वती की पावन महिमा के अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक, सरल और भक्ति-रस से परिपूर्ण जानकारी प्रदान करना है ताकि वे अपने आध्यात्मिक जीवन को और अधिक समृद्ध बना सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव महापुराण (रुद्र संहिता एवं कोटिरुद्र संहिता) - गीताप्रेस गोरखपुर।
  • भारतीय लोकगीत एवं पारंपरिक शिव भजन संग्रह।
  • सनातन संस्कृति और धार्मिक कथाएं, प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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