Parvati Stotram

घूँटी भर मोर धोती भीजे

69 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"घूँटी भर मोर धोती भीजे" पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और मिथिलांचल की पावन लोक-संस्कृति का एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी पारंपरिक भजन है। यह भजन मुख्य रूप से गंगा स्नान, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा और भगवान श्री कृष्ण की भक्ति से जुड़े पावन अवसरों पर गाया जाता है। इस भजन में एक भक्त की सरल, निश्छल और अनन्य भक्ति का चित्रण है, जो पवित्र गंगा नदी के तट पर प्रभु के दर्शन की अभिलाषा लेकर खड़ा है। जब भक्त गंगा के पावन जल में प्रवेश करता है, तो उसके वस्त्र (धोती और साड़ी) भीगने लगते हैं, जो वास्तव में सांसारिक बंधनों के छूटने और ईश्वरीय प्रेम के रस में सराबोर होने का प्रतीक है। इस भजन का माधुर्य और लोक-संगीत की धुन श्रोताओं को सीधे अध्यात्म और श्रद्धा के सागर में डुबो देती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ घूँटी भर मोर धोती भीजे ॥

घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी।
गंगा जी के तीरे-तीरे, चले कृष्ण मुरारी॥

गंगा जी के तीरे-तीरे चले कृष्ण मुरारी,
हाथ में सोहे मुरलिया, कांधे कमरिया कारी।
घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी॥

कौन गली गइले कृष्ण कन्हाई, कौन गली गइले राधारानी,
मथुरा गली गइले कृष्ण कन्हाई, गोकुल गली राधारानी।
घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी॥

गंगा मैया तोहे चुनरी चढ़इबो, अछत पुष्प चढ़इबो,
दीपक जला के मैया, आरती उतारइबो।
घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी॥

भक्तन के काज सँवारे कन्हाई, विपदा हरे त्रिपुरारी,
शरण में आए जो भी, पार भये नर-नारी।
घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी॥

गंगा जी के तीरे-तीरे, चले कृष्ण मुरारी,
घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन लोक-भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और मर्मस्पर्शी है। यहाँ "घूँटी भर" (टखने तक) धोती भीगने और "घुटना भर" साड़ी भीगने का अर्थ केवल शारीरिक रूप से जल में प्रवेश करना नहीं है, बल्कि यह साधक के अंतर्मन में धीरे-धीरे उतरने वाले भक्ति रस का सूचक है। जैसे-जैसे भक्त पवित्र गंगा के जल में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका अहंकार और सांसारिक मोह नष्ट होने लगता है।

भजन की अगली पंक्तियों में गंगा के किनारे-किनारे भगवान श्री कृष्ण के चलने का वर्णन है। यह इस बात को दर्शाता है कि जहाँ पवित्रता (गंगा) होती है, वहाँ परमात्मा (कृष्ण) स्वतः ही खिंचे चले आते हैं। भक्त अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए गंगा मैया को चुनरी, अक्षत, पुष्प और दीप अर्पित करने की बात करता है। यह सनातन धर्म की पंचोपचार पूजा पद्धति का लोक-स्वरूप है। अंततः, यह भजन जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ भक्त पूरी तरह से प्रभु के रंग में रंग जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का हिस्सा है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सरलता और सहजता: इस भजन में किसी कठिन संस्कृत शब्दावली का प्रयोग नहीं है, बल्कि आम जनमानस की भाषा (भोजपुरी/मैथिली मिश्रित) का उपयोग किया गया है, जिससे यह सीधे हृदय को छूता है।
  • प्रकृति और ईश्वर का समन्वय: इसमें गंगा नदी (प्रकृति) और भगवान श्री कृष्ण (परमात्मा) दोनों की एक साथ वंदना की गई है, जो सनातन धर्म के मूल सिद्धांत को दर्शाती है।
  • समर्पण का भाव: वस्त्रों का भीगना इस बात का प्रतीक है कि भक्त अब संसार की परवाह किए बिना पूरी तरह से भक्ति में डूब चुका है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं होता, परंतु इस विशिष्ट भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • गंगा स्नान एवं पर्व: कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति, गंगा दशहरा और छठ पूजा के पावन अवसर पर गंगा घाटों पर इस भजन का गायन अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • दैनिक संध्या आरती: घर में संध्या काल के समय दीप जलाकर इस भजन को सुनने या गाने से मानसिक शांति मिलती है।
  • सत्संग और कीर्तन: सामूहिक सत्संगों में ढोलक और मंजीरे की थाप पर जब इस भजन को गाया जाता है, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से दो दिव्य सत्ताओं को समर्पित है:

  1. भगवान श्री कृष्ण: जो पूर्ण पुरुषोत्तम हैं और अपनी मुरली की तान से संपूर्ण सृष्टि को आकर्षित करते हैं। इस भजन में उन्हें "कृष्ण मुरारी" और "कृष्ण कन्हाई" कहकर पुकारा गया है।
  2. माँ गंगा: जो मोक्षदायिनी हैं। गंगा के किनारे ही भारतीय सभ्यता और अध्यात्म का विकास हुआ है। गंगा मैया को चुनरी और अक्षत चढ़ाना भक्त की परम श्रद्धा को दर्शाता है।

इस भजन के मूल रचयिता का नाम अज्ञात है, क्योंकि यह सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचा है। यह लोक-कवियों की सामूहिक चेतना की सुंदर अभिव्यक्ति है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर गंगा-यमुना के मैदानी भागों से जुड़ी है। प्राचीन काल से ही भारत में नदियों को माता मानकर पूजने की परंपरा रही है। जब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग समूह बनाकर गंगा स्नान के लिए जाते थे, तो वे मार्ग की थकान मिटाने और ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ऐसे भजनों की रचना करते थे। आधुनिक समय में इस पारंपरिक लोकगीत को कई प्रसिद्ध कलाकारों, जैसे खेसारी लाल यादव, ने अपने अनूठे अंदाज में गाकर युवा पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय बनाया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा भोजपुरी और पूर्वी हिंदी का मिश्रित रूप है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल और गेय (गाने योग्य) है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है। "तीरे-तीरे" और "गली-गली" जैसे शब्दों की पुनरावृत्ति से भजन में एक सुंदर लय और प्रवाह उत्पन्न होता है। यह शैली लोक-साहित्य की अनमोल धरोहर है जो शास्त्रीय नियमों के बिना भी सीधे आत्मा से संवाद करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  • निष्कपट भक्ति: भगवान को रिझाने के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। एक सरल हृदय से चढ़ाया गया अक्षत और पुष्प भी उन्हें स्वीकार्य होता है।
  • पवित्रता का महत्व: जैसे गंगा जल तन को शुद्ध करता है, वैसे ही हरि-नाम संकीर्तन मन को पवित्र करता है।
  • समर्पण: जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं, तो हमें अपने सामाजिक संकोच और अहंकार को पीछे छोड़ देना चाहिए, जैसे भक्त अपनी धोती और साड़ी के भीगने की चिंता नहीं करता।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
घूँटी भर टखने (Ankle) तक भक्ति मार्ग में शुरुआती कदम रखना।
तीरे-तीरे किनारे-किनारे मर्यादा की सीमा में रहकर जीवन जीना।
कमरिया कारी काली कमली (कंबल) सादा जीवन और उच्च विचार का प्रतीक।
अछत अक्षत (बिना टूटा हुआ चावल) अखंड श्रद्धा और पूर्णता का प्रतीक।
विपदा कष्ट या संकट संसार के दुःख जिन्हें केवल ईश्वर ही दूर कर सकते हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"घूँटी भर मोर धोती भीजे, घुटना भर मोर साड़ी..."
जब साधक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो पहले उसके पैर (घूँटी) और फिर धीरे-धीरे उसका संपूर्ण अस्तित्व (घुटना) ईश्वर के प्रेम-रस में भीगने लगता है।

"गंगा जी के तीरे-तीरे, चले कृष्ण मुरारी..."
पवित्रता के मार्ग पर चलने वाले साधक के साथ स्वयं भगवान सदैव अंग-संग रहते हैं। गंगा का तट ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है, जहाँ कृष्ण रूपी आनंद का निवास है।

"मथुरा गली गइले कृष्ण कन्हाई, गोकुल गली राधारानी..."
यह जीवात्मा (राधा) और परमात्मा (कृष्ण) के अलग-अलग मार्गों से होकर अंततः एक ही गंतव्य (प्रेम) पर मिलने की यात्रा को दर्शाता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक गहराई से समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥"

(श्रीमद्भगवद्गीता - 9.26)

अर्थ: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ वह सब मैं सगुण रूप से प्रकट होकर ग्रहण करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम घूँटी भर मोर धोती भीजे
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण एवं गंगा मैया
भाषा भोजपुरी / मैथिली / पूर्वी लोकभाषा
मुख्य रस भक्ति रस, शांत रस, वात्सल्य रस
गायन का अवसर गंगा स्नान, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, दैनिक कीर्तन
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, हरमोनियम

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. "घूँटी भर मोर धोती भीजे" भजन का मुख्य संदेश क्या है?

यह भजन ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और निश्छल प्रेम का संदेश देता है। यह सिखाता है कि सरल हृदय से की गई पूजा ही भगवान को सबसे प्रिय होती है।

2. इस भजन में "धोती और साड़ी भीगने" का क्या अर्थ है?

यह सांसारिक बंधनों और लोक-लाज को छोड़कर ईश्वर के भक्ति रस में पूरी तरह सराबोर होने का प्रतीक है।

3. यह भजन किस क्षेत्र में अधिक लोकप्रिय है?

यह भजन मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों (मिथिलांचल) में अत्यंत लोकप्रिय है।

4. इस भजन को किस अवसर पर गाना सबसे उत्तम माना जाता है?

इसे गंगा स्नान, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति और किसी भी पारिवारिक मांगलिक कार्य या कीर्तन के अवसर पर गाया जा सकता है।

5. क्या इस भजन का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है?

हाँ, इस भजन में गंगा मैया के साथ-साथ भगवान श्री कृष्ण (कृष्ण मुरारी) की लीलाओं और उनके सुंदर रूप का वर्णन किया गया है।

6. इस भजन के रचयिता कौन हैं?

यह एक पारंपरिक लोक-भजन है, जिसके मूल रचयिता का नाम अज्ञात है। यह लोक-परंपरा के माध्यम से हम तक पहुँचा है।

7. इस भजन में गंगा मैया को क्या अर्पित करने की बात कही गई है?

भक्त गंगा मैया को चुनरी, अक्षत (चावल), पुष्प और दीप अर्पित करके उनकी आरती उतारने की कामना करता है।

8. इस भजन को आधुनिक समय में किसने लोकप्रिय बनाया है?

पारंपरिक रूप से गाए जाने वाले इस भजन को भोजपुरी गायक खेसारी लाल यादव और अन्य लोक कलाकारों ने गाकर इसे डिजिटल मंचों पर अत्यधिक लोकप्रिय बनाया है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन का संकलन पारंपरिक लोकगीतों, क्षेत्रीय गायन शैलियों और सनातन धर्म के ग्रंथों के आधार पर किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रामाणिक लोक-साहित्य पहुँचाना है ताकि हमारी सांस्कृतिक धरोहर जीवंत बनी रहे।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (भक्ति योग अध्याय)
  • उत्तर भारतीय लोक-साहित्य एवं पारंपरिक गीत संग्रह
  • गंगा महात्म्य एवं पौराणिक कथाएं

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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