"तुझे लाख सहारे क्या करना" एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और भक्तिरस से परिपूर्ण पारंपरिक भजन है, जो जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य शरणागति और निश्छल प्रेम का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह भजन साधक को यह सिखाता है कि जब प्रभु स्वयं सहारा बन जाएं, तो संसार के अन्य सभी आधार निरर्थक हो जाते हैं। भक्ति परंपरा में इस भजन को विशेष रूप से श्रीकृष्ण, शिव और देवी की उपासना के समय गाया जाता है। इसका भाव यह है कि मनुष्य चाहे कितने भी सांसारिक सहारे जुटा ले, परंतु जब तक ईश्वर की कृपा न हो, तब तक जीवन की समस्त व्यवस्थाएं अपूर्ण ही रहती हैं। यह भजन भक्त के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें पूर्ण समर्पण का भाव जागृत करता है। भजन का स्वर मधुर, भाव भरा और संकीर्तन के लिए अत्यंत उपयुक्त है, जिसे प्रातःकाल, संध्या आरती अथवा सत्संग के समय गाया जा सकता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
जग में कोई नहीं अपना,
प्रभु नाम ही सहारा है।
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
मात-पिता और बंधु-बांधव,
सब स्वार्थ के हैं साथी।
जब दुख की घड़ी आती है,
कोई नहीं पास आता।
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
धन-दौलत और ऐश्वर्य सारे,
यहीं रह जाएंगे।
प्रभु चरणों की भक्ति ही,
जीवन साथ निभाएगी।
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
जो प्रभु का हो जाता है,
वह भवसागर तर जाता है।
नाम जपो मन लगाकर,
प्रभु सदा सहायक है।
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
छोड़ दे सारे भरोसे,
प्रभु चरणों में आ जा।
जो शरण में आ जाता है,
वह कभी नहीं पछताता।
तुझे लाख सहारे क्या करना,
जब प्रभु तेरा सहारा है।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मूल संदेश अत्यंत गहन और आध्यात्मिक है। भजन का मुखड़ा ही साधक को यह बताता है कि संसार में चाहे कितने भी सहारे हों, परंतु जब तक प्रभु का सहारा नहीं, तब तक जीवन की सभी व्यवस्थाएं अस्थिर और अपूर्ण हैं। "तुझे लाख सहारे क्या करना" का अर्थ है कि मनुष्य के पास यदि अनेक सांसारिक आधार हों, लेकिन ईश्वर की कृपा न हो, तो वे सभी सहारे अंततः निरर्थक सिद्ध होते हैं। यह भजन भक्ति की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ भक्त केवल प्रभु को ही अपना सर्वस्व मान लेता है।
भजन की दूसरी पंक्तियाँ "जग में कोई नहीं अपना, प्रभु नाम ही सहारा है" यह सत्य उजागर करती हैं कि संसार में माता-पिता, भाई-बंधु, मित्र और संबंधी सभी स्वार्थ के आधार पर साथ देते हैं। जब जीवन में दुख, संकट और विपत्ति आती है, तब ये सभी संबंध पीछे हट जाते हैं। ऐसे समय में केवल प्रभु का नाम ही सच्चा सहारा बनता है। यह भजन सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आध्यात्मिक आश्रय की ओर प्रेरित करता है।
तीसरा भाव यह है कि धन, दौलत, ऐश्वर्य और भौतिक सुख-सुविधाएं सब यहीं रह जाएंगी। मृत्यु के समय कोई भी सांसारिक वस्तु साथ नहीं जाती। केवल प्रभु भक्ति और नाम संकीर्तन ही जीवन का सच्चा साथी है, जो जन्म-जन्मांतर तक साथ निभाता है। यह भजन साधक को वैराग्य और विवेक की ओर अग्रसर करता है।
चौथा भाव यह है कि जो व्यक्ति प्रभु का हो जाता है, वह भवसागर से पार उतर जाता है। नाम जप और भक्ति से मनुष्य के समस्त पाप, दुख और कष्ट नष्ट हो जाते हैं। प्रभु सदा अपने भक्तों के सहायक बने रहते हैं। अंतिम पंक्तियाँ साधक को आह्वान करती हैं कि वह सारे भरोसे छोड़कर प्रभु की शरण में आ जाए। जो एक बार प्रभु की शरण में आ जाता है, वह कभी पछताता नहीं। यह भजन शरणागति, समर्पण और अनन्य भक्ति का सजीव उदाहरण है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन भक्ति परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- शरणागति का भाव: यह भजन पूर्ण शरणागति और समर्पण का संदेश देता है।
- वैराग्य एवं विवेक: सांसारिक सहारों की अस्थिरता को उजागर करता है।
- नाम महिमा: प्रभु नाम की महिमा और उसकी शक्ति का गुणगान करता है।
- सरल भाषा: भजन की भाषा अत्यंत सरल और हृदयग्राही है, जिसे कोई भी सहज गा सकता है।
- संकीर्तन उपयुक्त: यह भजन सामूहिक संकीर्तन, आरती और सत्संग के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
इस भजन का धार्मिक महत्व यह है कि यह साधक को मोह-माया से मुक्त कर आत्म-कल्याण की ओर प्रेरित करता है। भजन सुनने और गाने से मन को शांति मिलती है, भय दूर होता है और भक्ति भाव जागृत होता है। यह भजन विशेष रूप से श्रीकृष्ण, शिव और देवी उपासना में गाया जाता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को किसी भी शुभ अवसर पर गाया जा सकता है। विशेष रूप से निम्नलिखित समय पर इसका गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है:
- प्रातःकाल: स्नान के बाद पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित करके।
- संध्या आरती: संध्या के समय आरती के साथ।
- एकादशी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि: विशेष पर्वों पर।
- सत्संग एवं कीर्तन: सामूहिक भजन के समय।
भजन गाने की विधि अत्यंत सरल है। शुद्ध मन से, भक्ति भाव के साथ, प्रभु का ध्यान करते हुए इस भजन को गाएं। भजन गाते समय मन को प्रभु चरणों में लगाएं। यदि संभव हो तो ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग करें। भजन के बाद प्रभु की आरती अवश्य करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "तुझे लाख सहारे क्या करना" भजन किस देवता को समर्पित है?
यह भजन मुख्य रूप से श्रीकृष्ण, शिव और देवी की उपासना में गाया जाता है। इसका भाव सर्वव्यापी ईश्वर के प्रति शरणागति का है।
प्रश्न 2: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि संसार के सभी सहारे अस्थिर हैं, केवल प्रभु का नाम ही सच्चा सहारा है।
प्रश्न 3: क्या इस भजन को घर पर गाया जा सकता है?
हाँ, इस भजन को घर के पूजा स्थल पर, प्रातः या संध्या के समय भक्ति भाव से गाया जा सकता है।
प्रश्न 4: इस भजन को गाने से क्या लाभ होते हैं?
इस भजन को गाने से मन को शांति मिलती है, भय दूर होता है, भक्ति भाव जागृत होता है और आत्मिक उन्नति होती है।
प्रश्न 5: क्या इस भजन का कोई विशेष समय है?
प्रातःकाल और संध्या आरती का समय इस भजन के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। विशेष पर्वों पर भी इसका गायन शुभ होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें पारंपरिक भक्ति परंपरा, संकीर्तन महिमा और शरणागति के भाव को शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। भजन के बोल पारंपरिक रूप से प्रचलित हैं और इनका भावार्थ भक्ति शास्त्रों एवं संत वाणी के अनुरूप है।
संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति योग), श्रीमद्भागवत महापुराण, संत वाणी एवं पारंपरिक भजन संग्रह।
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