श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 7

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 157 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
तस्मात्
therefore
सर्वेषु कालेषु
at all times
माम्
Me
अनुस्मर
remember
युध्य
fight
च
and
मयि
in Me
अर्पितमनोबुद्धिः
with mind and intellect fixed
माम्
to Me
एव
certainly
एष्यसि
you shall come
असंशयम्
without doubt.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए तू सब समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करने से तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च - आध्यात्मिक विवेचना

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

भगवद्गीता के आठवें अध्याय का सातवां श्लोक केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण कला है। जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में मोह और कर्तव्य के द्वंद्व में फँसे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो मार्ग दिखाया, वह आज के आधुनिक युग के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु' का अर्थ है—समय की हर इकाई में, हर क्षण में। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक कर्मों के साथ निरंतर चलने वाली एक धारा है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से, मनुष्य का मन एक चंचल अश्व के समान है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से उस मन को 'परमात्मा' रूपी लगाम से बांधने का सूत्र देते हैं। जब हम अपने कर्मों को 'मय्यर्पितमनोबुद्धि' (मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करके) करते हैं, तो हम कर्तापन के अहंकार से मुक्त हो जाते हैं। यह स्थिति ही मोक्ष का द्वार है। यह श्लोक कर्मयोग और भक्ति के उस अद्भुत संगम को दर्शाता है जहाँ युद्ध (संघर्ष) और योग (आंतरिक शांति) एक साथ चलते हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन का संग्राम लड़ते हुए भी हम भीतर से शांत और ईश्वर के प्रति समर्पित रह सकते हैं। यह श्लोक मानव चेतना को भौतिकता की सीमाओं से ऊपर उठाकर दिव्य चेतना में विलीन करने का एक सशक्त माध्यम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'तस्मात्' पर थोड़ा बल दें और 'असंशयम्' का उच्चारण स्पष्टता के साथ करें। इसे प्रतिदिन कम से कम 11 बार जपने से मन की एकाग्रता में अद्भुत वृद्धि होती है। इसे अपने दैनिक कर्मों को प्रारंभ करने से पूर्व एक संकल्प के रूप में दोहराना चाहिए।

साधना विधि: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर, स्नान के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या चित्र के सम्मुख बैठकर इस श्लोक का ध्यान करें। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। जब आप अपने कार्यस्थल पर जाएं, तो मन ही मन इस श्लोक का स्मरण करें, इससे आपके कार्य में 'योग' का समावेश होगा और आप तनावमुक्त होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर पाएंगे।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तस्मात्इसलिएअज्ञान और मोह से ऊपर उठने के लिए।
सर्वेषु कालेषुसभी समयों मेंहर क्षण, चाहे सुख हो या दुख, सफलता हो या विफलता।
माम्मेरापरमेश्वर, जो सर्वव्यापी और अंतर्यामी हैं।
अनुस्मरस्मरण करनिरंतर चिंतन, जो भक्ति की पराकाष्ठा है।
युध्य चऔर युद्ध करअपने नियत कर्मों का त्याग न कर, उन्हें धर्मपूर्वक कर।
मयिमुझमेंअपने मन को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना।
अर्पितअर्पण करअहंकार का त्याग और समर्पण की भावना।
मनोबुद्धिमन और बुद्धिसंकल्प और निर्णय लेने की शक्ति का ईश्वरीयकरण।
मामेवमुझे हीलक्ष्य केवल परमात्मा की प्राप्ति है।
एष्यसिप्राप्त करेगापरमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव।
असंशयम्निःसंदेहइसमें कोई संदेह नहीं, यह अटल सत्य है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 'अक्षरब्रह्मयोग' (आठवें अध्याय) का हिस्सा है। महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में, जब अर्जुन ने अपने प्रियजनों को शत्रु पक्ष में देखा, तो उनका गांडीव हाथ से छूट गया। वे मोहग्रस्त होकर युद्ध से विमुख हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया कि जीवन स्वयं एक युद्ध है।

पौराणिक संदर्भों में, यह श्लोक उस समय का है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'अभ्यास योग' की महत्ता समझा रहे थे। वे अर्जुन को बता रहे थे कि केवल युद्ध करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि युद्ध करते समय मन की स्थिति क्या होनी चाहिए, यह सबसे महत्वपूर्ण है। वेदों में भी 'स्मरण' को भक्ति का प्रथम सोपान माना गया है। जैसे प्रह्लाद ने हर क्षण भगवान का स्मरण किया, वैसे ही अर्जुन को भी अपने कर्म (युद्ध) को यज्ञ मानकर करने का आदेश दिया गया। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वह अंततः परमात्मा की सेवा है। व्यास मुनि द्वारा रचित यह महाकाव्य हमें सिखाता है कि जीवन की जटिलताओं के बीच भी परमात्मा का स्मरण कैसे किया जाए। यह श्लोक अर्जुन के माध्यम से पूरी मानवता को एक संदेश है कि 'कर्म' और 'भक्ति' दो अलग मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब कर्म में भक्ति का पुट होता है, तो वह कर्म बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का कारण बन जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता: निरंतर स्मरण से मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव से मुक्ति: जब हम फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देते हैं, तो तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • कर्म शुद्धि: ईश्वर को समर्पित कार्य करने से कर्मों के बंधन नहीं बनते।
  • सकारात्मक ऊर्जा: इस श्लोक का जप करने से चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच (आभा) का निर्माण होता है।
  • भय का नाश: 'असंशयम्' का भाव मन से भविष्य के प्रति सभी प्रकार के भय को मिटा देता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: मन और बुद्धि को ईश्वर में अर्पित करने से धीरे-धीरे आत्म-ज्ञान का उदय होता है।
  • दैवीय कृपा: निरंतर स्मरण से साधक पर भगवान की अहैतुकी कृपा बरसने लगती है।
  • जीवन में संतुलन: यह श्लोक हमें कठिन परिस्थितियों में भी समभाव (Equanimity) में रहना सिखाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों, जैसे कि गीता प्रेस गोरखपुर के भाष्य और शंकराचार्य कृत गीता भाष्य के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु शास्त्रोक्त विधि और तार्किक आध्यात्मिक चिंतन को प्राथमिकता देता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख न मानकर, अपने जीवन में उतारने योग्य एक मार्गदर्शिका के रूप में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यह बिल्कुल संभव है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'युध्य च' कहकर स्पष्ट किया है कि सांसारिक कर्तव्यों को छोड़ना नहीं है, बल्कि उन्हें करते हुए मन के एक कोने में ईश्वर का निरंतर स्मरण रखना है। यह अभ्यास से आता है।

इसका अर्थ है कि अपने मन (संकल्प) और बुद्धि (निर्णय) को ईश्वर के अधीन कर देना। जब आप कोई भी निर्णय लें, तो यह सोचें कि क्या यह ईश्वर को प्रिय है? यही समर्पण है।

नहीं, अर्जुन केवल एक माध्यम थे। यह उपदेश पूरी मानवता के लिए है जो अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में संघर्ष कर रही है।

ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) सबसे उत्तम है, लेकिन भक्ति में समय का बंधन नहीं है। आप दिन में कभी भी, जब भी मन अशांत हो, इसका स्मरण कर सकते हैं।

भगवद्गीता के श्लोकों के लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति पढ़ और समझ सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: इसलिए तू सब समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें मन और बुद्धि को अर्पित करने से तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा। Krishna says: Therefore, at all times remember Me and fight. With your mind and intellect fixed on Me, you will certainly come to Me alone, without doubt.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यहाँ भगवान सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए भी ईश्वर-स्मरण संभव है। हमें अपने कर्म करते हुए भी मन को परमात्मा में लगाना चाहिए। Here the Lord teaches that God-remembrance is possible while living in the world. We should perform our duties while keeping our mind fixed on the Supreme.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/28 25% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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