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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 8 · श्लोक 6

अध्याय 8 · श्लोक 6

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६॥

yaṃ yaṃ vāpi smaran bhāvaṃ tyajaty ante kalevaram | taṃ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यम् यम्: whatever; वा अपि: indeed; स्मरन्: remembering; भावम्: state of being; त्यजति: gives up; अन्ते: at the end; कलेवरम्: the body; तम् तम्: that very; एव: indeed; एति: attains; कौन्तेय: O son of Kunti; सदा: always; तद्भावभावितः: absorbed in that thought.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।

English Translation

O son of Kunti, whatever state of being one remembers when he gives up his body at the end, that state he attains, for he is ever absorbed in that thought.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक बताता है कि मृत्यु के समय का विचार जीवन भर के संस्कारों पर निर्भर करता है। जैसा हम जीवन में सोचते हैं, वैसा ही अन्तकाल में याद आता है और वैसी ही गति मिलती है। This verse states that the thought at death depends on lifelong impressions. As we think throughout life, so we remember at death and attain accordingly.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।