पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
सनातन धर्म के ग्रंथों में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ के समान है, जो न केवल जीवन जीने की कला सिखाता है, बल्कि मृत्यु के रहस्य को भी उद्घाटित करता है। प्रस्तुत श्लोक—"यं यं वापि स्मरन्भावं..."—गीता के आठवें अध्याय का छठा श्लोक है, जो 'अक्षरब्रह्मयोग' के अंतर्गत आता है। यह श्लोक मानव चेतना के उस सूक्ष्म विज्ञान को स्पष्ट करता है, जिसे आधुनिक विज्ञान 'सबकॉन्शियस माइंड' या अवचेतन मन कहता है, परंतु हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे 'संस्कार' और 'वासना' के रूप में युगों पूर्व परिभाषित कर दिया था।
ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, मनुष्य का जीवन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि एक द्वार है। जिस प्रकार एक रेशम का कीड़ा एक पत्ते को छोड़ने से पहले दूसरे पत्ते को पकड़ने की तैयारी करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर त्यागते समय अपने जीवन भर के संचित विचारों और इच्छाओं के आधार पर अगली योनि का चयन करती है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि हमारा वर्तमान ही हमारा भविष्य निर्धारित करता है। यदि हम जीवन भर क्रोध, लोभ या मोह में लिप्त रहते हैं, तो अंत समय में वही भाव प्रबल हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि हम निरंतर ईश्वर का चिंतन करते हैं, तो मृत्यु के समय भी वही दिव्य स्मृति बनी रहती है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक चेतावनी और एक मार्गदर्शिका है, जो हमें जीवन को सचेत होकर जीने की प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाता है कि 'स्मरण' ही 'निर्माण' है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर के उच्चारण पर ध्यान देना आवश्यक है। 'यं यं' का उच्चारण करते समय नासिका के स्वर का ध्यान रखें। 'कलेवरम्' शब्द का अर्थ शरीर है, जिसे त्यागते समय मन की स्थिति ही गंतव्य का मार्ग प्रशस्त करती है।
साधना विधि: इस श्लोक को प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात कम से कम 11 बार पढ़ना चाहिए। इसे पढ़ते समय अपनी श्वासों पर नियंत्रण रखें और यह अनुभव करें कि आप अपने भीतर के उन विचारों को शुद्ध कर रहे हैं जो अंत समय में आपके साथ जाएंगे। यह अभ्यास मन को एकाग्र करने और व्यर्थ के विचारों से मुक्त होने में अत्यंत सहायक है। गीता के इस श्लोक का निरंतर चिंतन करने से व्यक्ति के भीतर एक 'वैराग्य' और 'भक्ति' का उदय होता है, जो उसे सांसारिक दुखों से ऊपर उठाता है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने धनुष को त्याग देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों का उपदेश देते हैं। यह श्लोक उसी संवाद की एक कड़ी है। पौराणिक ग्रंथों में 'भरत' राजा की कथा इस श्लोक का सबसे सटीक उदाहरण मानी जाती है। राजा भरत ने अपना सब कुछ त्याग कर वन में तपस्या की, परंतु अंत समय में उन्होंने एक मृग (हिरण) के बच्चे के प्रति मोह कर लिया। परिणामस्वरूप, मृत्यु के समय उनका ध्यान उस मृग पर था, और उन्हें अगले जन्म में मृग की योनि प्राप्त हुई।
यह कथा हमें सिखाती है कि मृत्यु के समय केवल वही विचार मन में आते हैं, जिन्हें हमने जीवन भर 'पोषण' दिया है। शास्त्र कहते हैं कि मन एक उपजाऊ भूमि है। यदि हम इसमें काम, क्रोध, लोभ के बीज बोएंगे, तो अंत समय में वही फसल कटेगी। इसके विपरीत, यदि हम 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'राम' नाम का निरंतर अभ्यास करते हैं, तो अंत समय में वही नाम हमारी जिह्वा और मन पर होगा। उपनिषदों में भी 'अन्त्येष्टि' के समय ईश्वर के स्मरण पर बल दिया गया है। यह श्लोक केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक 'कर्म-फल' का गणित है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'कौन्तेय' कहकर संबोधित करते हैं, जो यह दर्शाता है कि यह ज्ञान केवल विद्वानों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहता है। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि मृत्यु कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे जीवन का एक तार्किक निष्कर्ष है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग) के मूल संस्कृत श्लोकों और भाष्यकारों के सिद्धांतों के आधार पर संकलित किया गया है। इसमें किसी भी प्रकार के अवैज्ञानिक या अंधविश्वासी दावों का समर्थन नहीं किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को भारतीय दर्शन की गहराई से परिचित कराना और उन्हें जीवन के अंतिम सत्य के प्रति जागरूक करना है। संदर्भ हेतु गीता प्रेस गोरखपुर की 'श्रीमद्भगवद्गीता' और शंकराचार्य कृत 'गीता भाष्य' का अध्ययन किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है। Krishna says: O son of Kunti, whatever state of being one remembers when he gives up his body at the end, that state he attains, for he is ever absorbed in that thought.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक मन के संस्कारों की शक्ति दिखाता है। हम जैसे विचारों को निरंतर पालते हैं, अन्तकाल में वे ही उभरते हैं। इसलिए सदा उच्च भाव रखना चाहिए। This verse reveals the power of mental impressions. The thoughts we constantly entertain arise at death. Hence, one should always cultivate noble thoughts.