श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 5

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
अन्तकाले
at the time of death
च
and
माम्
Me
एव
alone
स्मरन्
remembering
मुक्त्वा
abandoning
कलेवरम्
the body
यः
who
प्रयाति
departs
सः
he
मद्भावम्
My nature
याति
attains
न
not
अस्ति
there is
अत्र
here
संशयः
doubt.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और जो मनुष्य अन्तकाल में शरीर त्यागते समय केवल मेरा स्मरण करता हुआ प्राण त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अन्तकाले च मामेव - श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत सत्य

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के ग्रंथों में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ के समान है, जो अज्ञान के घोर अंधकार में भटकती हुई आत्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाता है। 'अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्' श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन की अंतिम परीक्षा का वह सूत्र है, जिस पर संपूर्ण जन्म-मरण का चक्र निर्भर करता है। भारतीय दर्शन में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक परिवर्तन माना गया है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर का त्याग कर नवीन यात्रा प्रारंभ करती है।

इस श्लोक का ब्रह्मांडीय महत्व इस तथ्य में निहित है कि हमारा अंतिम विचार ही हमारे अगले गंतव्य का निर्धारण करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि चेतना की वह अवस्था, जो मृत्यु के क्षण में प्रबल होती है, वही आत्मा को उसके अनुरूप लोक में ले जाती है। यदि उस क्षण में मन में केवल परमात्मा का स्मरण हो, तो आत्मा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर सीधे भगवद्धाम को प्राप्त करती है। यह सिद्धांत 'अन्तिम विचार' की शक्ति को रेखांकित करता है। यह केवल मृत्यु के समय की बात नहीं है, बल्कि यह एक जीवन भर के अभ्यास का परिणाम है। जो व्यक्ति जीवन भर भगवान के नाम का जप करता है, वही अंत समय में उनका स्मरण कर पाने में समर्थ होता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण एक तैयारी है, ताकि हम उस अंतिम क्षण में विचलित न हों और परमात्मा के चरणों में अपना स्थान सुनिश्चित कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'अन्तकाले' का उच्चारण करते समय काल की अनंतता का अनुभव करें। 'मामेव' पर ध्यान केंद्रित करते हुए यह भाव लाएं कि आप स्वयं को भगवान को समर्पित कर रहे हैं। 'नास्त्यत्र संशयः' का अर्थ है कि इसमें कोई संदेह नहीं है, अतः इसे पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के साथ उच्चारित करें। नित्य प्रातः काल स्नान के उपरांत गीता के इस श्लोक का 108 बार जप करने से साधक के मन में भगवद-स्मरण की आदत दृढ़ होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अन्तकालेमृत्यु के समयजीवन की अंतिम घड़ी, जब प्राण शरीर से अलग हो रहे हों।
चऔरयह समुच्चय बोधक शब्द निरंतरता को दर्शाता है।
माम्मुझको (भगवान को)परमेश्वर, जो सर्वव्यापी और सच्चिदानंद स्वरूप हैं।
एवहीअनन्य भक्ति का सूचक, केवल भगवान का ही स्मरण।
स्मरन्स्मरण करते हुएनिरंतर चिंतन, जो अभ्यास से ही संभव है।
मुक्त्वाछोड़करशरीर से मोह का त्याग, अनासक्ति की पराकाष्ठा।
कलेवरम्शरीरनश्वर भौतिक आवरण, जो आत्मा का अस्थायी निवास है।
यः प्रयातिजो जाता हैमृत्यु के उपरांत आत्मा की यात्रा का आरंभ।
स मद्भावम्वह मेरे भाव कोभगवान के स्वरूप में लीन होना, सायुज्य मुक्ति।
यातिप्राप्त करता हैपरम गति, जहाँ से पुनः संसार में नहीं आना पड़ता।
नास्त्यत्र संशयःइसमें संदेह नहींभगवान का अटल वचन, जो साधक को अभय प्रदान करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह आठवां अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से मृत्यु के पश्चात की गति के बारे में प्रश्न किया, तब भगवान ने इस श्लोक के माध्यम से 'स्मरण' के विज्ञान को स्पष्ट किया। पौराणिक संदर्भों में हम देखते हैं कि राजा भरत ने अपने अंतिम समय में एक मृग (हिरण) का स्मरण किया था, जिसके कारण उन्हें अगले जन्म में मृग योनि प्राप्त हुई। यह दृष्टांत हमें सचेत करता है कि हमारा मन जिस वस्तु या व्यक्ति में आसक्त होगा, मृत्यु के समय वही हमारे सामने आएगा।

महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने अपने प्राणों को तब तक रोके रखा जब तक कि उत्तरायण का समय नहीं आया, ताकि वे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन करते हुए देह त्याग सकें। यह श्लोक उसी सिद्धांत की पुष्टि करता है। वेदों में भी 'स्मृति' को ही मोक्ष का द्वार माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि 'यथा क्रतुर्भवति'—अर्थात मनुष्य जैसा संकल्प करता है, वैसा ही वह बनता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह श्लोक उस संकल्प को 'भगवद-भाव' में बदलने का मार्ग है। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तकनीक है जिसे 'स्मरण-योग' कहा जा सकता है। इतिहास गवाह है कि जितने भी महान भक्त हुए हैं, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भगवान के नाम का ही आश्रय लिया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मृत्यु कोई भय की वस्तु नहीं, बल्कि एक अवसर है, यदि हम जीवन भर भगवान के स्मरण का अभ्यास करें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मृत्यु का भय समाप्त होना: नियमित पाठ से साधक को यह बोध होता है कि मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, जिससे मृत्यु का स्वाभाविक भय कम हो जाता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: निरंतर भगवान के स्मरण का अभ्यास मन को चंचलता से हटाकर एकाग्रता की ओर ले जाता है।
  • कर्मों का शुद्धिकरण: जब मन में हर समय भगवान का वास होता है, तो व्यक्ति अनैतिक कर्मों से स्वतः दूर हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस श्लोक के जप से साधक के चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • मानसिक शांति: तनाव और अवसाद से मुक्ति मिलती है क्योंकि मन सांसारिक चिंताओं के बजाय परमात्मा में स्थिर रहता है।
  • अंतिम समय में स्मृति की सुरक्षा: जो व्यक्ति जीवन भर अभ्यास करता है, उसे अंतिम क्षण में भगवान का स्मरण सहज ही हो जाता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह श्लोक साधक को भौतिक जगत से ऊपर उठकर आध्यात्मिक चेतना के उच्च स्तर पर ले जाता है।
  • आत्म-विश्वास में वृद्धि: 'नास्त्यत्र संशयः' का भाव साधक के भीतर भगवान के प्रति अटूट विश्वास जगाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के मूल संस्कृत पाठ और आचार्य शंकर, रामानुजाचार्य एवं मधुसूदन सरस्वती जैसे महान भाष्यकारों के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के रूप में प्रस्तुत की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को सरल हिंदी में समझाना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि गीता के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को उजागर करता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख के रूप में नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति के रूप में ग्रहण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, यह एक निरंतर अभ्यास है। यदि आपने जीवन भर भगवान का स्मरण नहीं किया, तो अंतिम क्षण में मन को भगवान में लगाना अत्यंत कठिन है। यह अभ्यास की निरंतरता मांगता है।

नहीं, यह श्लोक उस परम सत्य को इंगित करता है जो निराकार और साकार दोनों रूपों में है। 'माम्' का अर्थ उस परम चेतना से है जिसे आप अपने इष्ट के रूप में पूजते हैं।

अन्तकाल का अर्थ मृत्यु के अंतिम क्षण के साथ-साथ, जीवन में आने वाले कठिन समय या किसी भी बड़े परिवर्तन का क्षण भी हो सकता है, जहाँ हमें पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।

नहीं, गीता का ज्ञान सभी के लिए खुला है। श्रद्धा और पवित्र भाव ही इस श्लोक के जप के लिए सबसे बड़ी दीक्षा है।

इसके लिए 'स्मरण-योग' का अभ्यास करें। दिन भर में छोटे-छोटे अंतराल पर भगवान का नाम लें, गीता का पाठ करें और सत्संग से जुड़े रहें। अभ्यास ही सफलता की कुंजी है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: और जो मनुष्य अन्तकाल में शरीर त्यागते समय केवल मेरा स्मरण करता हुआ प्राण त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है। Krishna says: And whoever, at the time of death, gives up the body and departs, remembering Me alone, attains My state; there is no doubt about this.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह श्लोक सिखाता है कि मृत्यु के समय मन की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हम जीवन भर भगवान का स्मरण करते हैं, तो अन्तकाल में भी वही भाव रहेगा और हम मुक्ति पा सकते हैं। This verse teaches that the state of mind at the time of death is crucial. If we remember the Lord throughout life, that thought will remain at the end and we can attain liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/28 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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