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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 8 · श्लोक 12

अध्याय 8 · श्लोक 12

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२॥

sarva-dvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca | mūrdhny ādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सर्वद्वाराणि: all doors (of the senses); संयम्य: restraining; मनः: mind; हृदि: in the heart; निरुध्य: confining; च: and; मूर्ध्नि: in the head; आधाय: placing; आत्मनः: his; प्राणम्: life force; आस्थितः: established; योगधारणाम्: in yogic concentration.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में रोककर, और प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित होकर...

English Translation

By closing all the senses, confining the mind in the heart, and fixing the life force in the head, established in yogic concentration...

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक योग की आंतरिक प्रक्रिया का वर्णन करता है: इन्द्रियों को वश में कर, मन को हृदय में एकाग्र कर, और प्राण को सहस्रार चक्र में ले जाकर ध्यान स्थिर करना। This verse describes the internal yogic process: controlling the senses, focusing the mind in the heart, and raising the prana to the crown chakra to stabilize meditation.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।