श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 9

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 22 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
पुण्यः
पवित्र
गन्धः
गन्ध
पृथिव्याम्
पृथ्वी में
च
और
तेजः
तेज
च
भी
अस्मि
हूँ
विभावसौ
अग्नि में
जीवनम्
जीवन
सर्वभूतेषु
समस्त प्राणियों में
तपः
तप
च
भी
अस्मि
हूँ
तपस्विषु
तपस्वियों में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं पृथ्वी में पुण्य गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; समस्त प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च - श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य दर्शन

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का यह नवम श्लोक (7.9) आध्यात्मिक दर्शन का एक ऐसा स्तंभ है, जो साधक को यह बोध कराता है कि परमात्मा केवल मंदिरों की मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं। जब हम पृथ्वी की सौंधी सुगंध को अनुभव करते हैं, अग्नि के तेज को देखते हैं, समस्त प्राणियों में स्पंदित जीवन को महसूस करते हैं, और तपस्वियों के कठिन तप में छिपी शक्ति को निहारते हैं, तब हमें भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का साक्षात्कार होता है।

यह श्लोक अद्वैत वेदांत की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) का सिद्धांत व्यावहारिक रूप लेता है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान सिखाता है। यदि पृथ्वी की गंध में ईश्वर है, तो पृथ्वी पवित्र है। यदि अग्नि के तेज में ईश्वर है, तो ऊर्जा का स्रोत पूजनीय है। यह श्लोक मनुष्य को एक ऐसी दृष्टि प्रदान करता है जिससे वह संसार को 'माया' के जाल के रूप में नहीं, बल्कि 'ईश्वर के विलास' के रूप में देख सके। इस श्लोक का चिंतन मन को संकीर्णताओं से मुक्त कर व्यापक ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ता है, जिससे भक्त का अहंकार गलने लगता है और वह स्वयं को परमात्मा की एक छोटी सी इकाई के रूप में अनुभव करने लगता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर के उच्चारण पर ध्यान दें। 'पुण्यो' में अनुस्वार का नासिक्य प्रयोग करें। 'विभावसौ' में 'व' और 'स' का स्पष्ट उच्चारण करें। इसे शांत चित्त होकर, पद्मासन या सुखासन में बैठकर, अपनी आँखें बंद करके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का ध्यान करते हुए पढ़ें जो समस्त तत्वों का मूल आधार है। प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पश्चात इस श्लोक का 11 बार पाठ करना मानसिक एकाग्रता और सात्विक ऊर्जा के संचार के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
पुण्यःपवित्र/पुण्यमयीजो दोषरहित है और आत्मा को शुद्ध करने वाला है।
गन्धःसुगंधपृथ्वी का वह गुण जो उसकी मौलिकता और अस्तित्व का प्रमाण है।
पृथिव्यांपृथ्वी मेंपंचमहाभूतों में से प्रथम तत्व, जो धारण करने वाली है।
तेजःप्रकाश/ऊर्जाअग्नि का वह गुण जो अज्ञान के अंधकार को नष्ट करता है।
विभावसौअग्नि मेंअग्नि का एक नाम, जो स्वयं प्रकाशित है।
जीवनंप्राणशक्तिवह चेतना जो निर्जीव को सजीव बनाती है।
सर्वभूतेषुसमस्त प्राणियों मेंचींटी से लेकर ब्रह्मा तक व्याप्त एक ही आत्मा।
तपःतपस्याइंद्रिय संयम और संकल्प की अग्नि।
तपस्विषुतपस्वियों मेंजो स्वयं को तपाकर परमात्मा को प्राप्त करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय 'ज्ञान-विज्ञान योग' से उद्धृत है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन विषादग्रस्त थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि संसार की प्रत्येक वस्तु में उनका ही अंश विद्यमान है। यह श्लोक 'विभूति योग' की भूमिका तैयार करता है। पौराणिक संदर्भों में, अग्नि को 'विभावसु' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'जो स्वयं प्रकाश का स्रोत है'। वेदों में अग्नि को 'देवों का मुख' माना गया है, क्योंकि हम जो भी आहुति देते हैं, वह अग्नि के माध्यम से ही देवताओं तक पहुँचती है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे केवल वैकुंठ में नहीं, बल्कि इस भौतिक जगत के आधारभूत तत्वों में भी स्थित हैं। जब हम पृथ्वी की गंध को सूंघते हैं, तो हम वास्तव में ईश्वर के उस गुण का आस्वादन कर रहे होते हैं जो पृथ्वी को धारण किए हुए है। इसी प्रकार, तपस्वियों के तप में जो संकल्प शक्ति है, वह भी भगवान का ही अंश है। यह दर्शन हमें यह सिखाता है कि कोई भी कार्य, यदि वह तप और सत्य के मार्ग पर है, तो वह ईश्वर की ही सेवा है। महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से भक्त को यह संदेश दिया है कि 'ईश्वर से दूर कुछ भी नहीं है'। यह ज्ञान अर्जुन के उस संशय को दूर करने के लिए था कि क्या ईश्वर को केवल वन में जाकर ही पाया जा सकता है? श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि वे संसार के प्रत्येक तत्व में विद्यमान हैं, बस उन्हें देखने वाली दृष्टि (दिव्य चक्षु) की आवश्यकता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक का नित्य पाठ मन की चंचलता को कम करता है और विचारों में स्थिरता लाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): यह श्लोक साधक के चारों ओर एक सात्विक ऊर्जा का कवच बनाता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है।
  • प्रकृति से जुड़ाव: यह हमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाता है, क्योंकि हम पृथ्वी में ईश्वर को देखने लगते हैं।
  • अहंकार का नाश: जब हम यह समझते हैं कि हमारा जीवन भी ईश्वर का ही अंश है, तो 'मैं' का भाव कम होने लगता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: 'तप' का स्मरण करने से विद्यार्थी और साधक अपनी एकाग्रता शक्ति को बढ़ा सकते हैं।
  • कर्म शुद्धि: यह बोध कि ईश्वर हर जगह है, हमें अनैतिक कार्यों से रोकता है।
  • दैवीय कृपा: निरंतर जप से भक्त को ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप का अनुभव होने लगता है।
  • भय से मुक्ति: जब ईश्वर हर जगह है, तो भक्त को किसी भी स्थिति में अकेलापन या भय महसूस नहीं होता।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और आधुनिक आध्यात्मिक व्याख्याओं के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रसम्मत और प्रामाणिक ज्ञान प्रदान करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु वेदान्त के उस उच्च दर्शन को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, गीता के अनुसार पृथ्वी का मूल गुण 'गंध' है। चूँकि पृथ्वी ईश्वर की ही रचना है और वे उसके आधार हैं, अतः गंध में भी उनका ही अंश विद्यमान है। यह एक दार्शनिक सत्य है कि सृष्टि का हर गुण परमात्मा से ही उद्भूत है।

तपस्या का अर्थ है संकल्प की शक्ति। जब कोई तपस्वी अपनी इंद्रियों को वश में करता है, तो वह जो आत्म-बल अनुभव करता है, वह भगवान की ही शक्ति है। भगवान ने स्वयं कहा है कि वे तपस्वियों का 'तप' हैं।

इस श्लोक का उपयोग 'स्मरण' के लिए किया जा सकता है। जब भी आप प्रकृति को देखें, अग्नि को देखें या किसी को कठिन परिश्रम करते देखें, तो ईश्वर का स्मरण करें। यह आपको हर पल ईश्वर के सानिध्य का अनुभव कराएगा।

यह श्लोक किसी कर्मकांड से अधिक 'ज्ञान योग' का हिस्सा है। इसे पूजा के दौरान पढ़ना शुभ है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य 'चिंतन' और 'ध्यान' है।

विभावसु अग्नि का एक पर्यायवाची शब्द है। 'विभा' का अर्थ है प्रकाश और 'वसु' का अर्थ है धन या तत्व। अर्थात, वह जो प्रकाश रूपी धन का स्वामी है। यह अग्नि की दिव्यता को दर्शाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं पृथ्वी की पुण्य सुगन्ध हूँ, अग्नि का तेज हूँ, समस्त प्राणियों का जीवन हूँ, और तपस्वियों का तप हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सभी श्रेष्ठ गुणों और शक्तियों का स्रोत है। सुगन्ध, प्रकाश, जीवन और तप – ये सब उसी की विभूतियाँ हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 9 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 9/30 30% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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