श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 8

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 23 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रसो ऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
रसः
रस
अहम्
मैं
अप्सु
जल में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
प्रभा
प्रकाश
अस्मि
हूँ
शशिसूर्ययोः
चन्द्रमा और सूर्य में
प्रणवः
प्रणव (ॐ)
सर्ववेदेषु
समस्त वेदों में
शब्दः
शब्द
खे
आकाश में
पौरुषम्
पौरुष
नृषु
मनुष्यों में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! मैं जलों में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पौरुष हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

रसोऽहमप्सु कौन्तेय: भगवद्गीता का दिव्य दर्शन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के मूल आधार स्तंभ श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का यह आठवां श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड के अस्तित्व का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ब्लूप्रिंट है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि परमात्मा कोई दूर स्थित सत्ता नहीं है, बल्कि वह हमारे चारों ओर व्याप्त तत्वों में स्पंदित हो रहा है। जब हम जल पीते हैं, तो उसमें विद्यमान 'रस' (स्वाद) के रूप में ईश्वर ही तृप्ति प्रदान करते हैं। जब हम सूर्य और चंद्रमा को देखते हैं, तो उनकी 'प्रभा' (प्रकाश) में उसी का तेज है। यह श्लोक अद्वैत वेदांत की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ ब्रह्म ही है) का सिद्धांत चरितार्थ होता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक साधक को 'दृष्टि परिवर्तन' का मार्ग दिखाता है। एक भक्त जब इस श्लोक का चिंतन करता है, तो उसके लिए संसार का हर पदार्थ पूजनीय हो जाता है। जल में रस, प्रकाश में तेज, ध्वनि में ओंकार और मनुष्य में पौरुष—ये सब ईश्वर के ही विभिन्न विभव (विस्तार) हैं। यह बोध मनुष्य के अहंकार को नष्ट करता है और उसे विनम्रता की ओर ले जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर अनुभव में ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना ही वास्तविक योग है। इस श्लोक का निरंतर स्मरण मानसिक विकारों को दूर कर चेतना को उच्चतर आयामों में ले जाने में सक्षम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

रसो ऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द पर ध्यान केंद्रित करें। 'रसोऽहमप्सु' का उच्चारण करते समय जल के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें। 'प्रणवः' (ॐ) का उच्चारण करते समय नाभि से ध्वनि उत्पन्न करें। यह श्लोक ध्यान (Meditation) के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके तीन बार जपें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
रसःस्वादजल की जीवनदायिनी शक्ति और उसका स्वाद ईश्वर का ही अंश है।
अहम्मैंपरमात्मा स्वयं को सर्वव्यापी सत्ता के रूप में घोषित कर रहे हैं।
अप्सुजल मेंजल जो जीवन का आधार है, उसमें ईश्वर का निवास है।
कौन्तेयहे कुंतीपुत्र (अर्जुन)संबोधन जो जीव और ईश्वर के घनिष्ठ संबंध को दर्शाता है।
प्रभाप्रकाश/तेजसूर्य और चंद्रमा का तेज ईश्वर की ही दिव्य शक्ति है।
शशिसूर्ययोःचंद्रमा और सूर्य मेंसमय और काल के नियंत्रक ग्रहों में ईश्वर की उपस्थिति।
प्रणवःॐकारसमस्त वेदों का सार और ब्रह्मांड की आदि ध्वनि।
सर्ववेदेषुसभी वेदों मेंज्ञान के मूल स्रोत में ईश्वर का ही वास है।
शब्दःध्वनि/आकाशआकाश तत्व का गुण 'शब्द' ईश्वर का ही स्वरूप है।
पौरुषंपुरुषार्थ/वीरतामनुष्य के भीतर का साहस और कर्मठता ईश्वर की देन है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का नाम 'ज्ञान-विज्ञान योग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी 'विभूति' और 'योग' के बारे में बताया है। पौराणिक संदर्भों में, जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में विषादग्रस्त थे, तब भगवान ने उन्हें यह समझाया कि यह युद्ध केवल बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। यह श्लोक उसी श्रृंखला का हिस्सा है जहाँ भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि वे निर्गुण निराकार होते हुए भी सगुण साकार रूप में सृष्टि के हर तत्व में कैसे विद्यमान हैं।

वेदों में 'प्रणव' (ॐ) को ईश्वर का साक्षात स्वरूप माना गया है। मांडूक्य उपनिषद में ॐ के चार चरणों की व्याख्या की गई है, जो इसी श्लोक के 'प्रणवः सर्ववेदेषु' से मेल खाती है। महाभारत के शांति पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को यही उपदेश दिया था कि जो मनुष्य जल में रस और सूर्य में प्रकाश को ईश्वर का स्वरूप मानकर वंदन करता है, वह कभी भी अधर्म के मार्ग पर नहीं चलता। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि मनुष्य का 'पौरुष' (पुरुषार्थ) तब तक ही सार्थक है जब तक वह ईश्वर की प्रेरणा से संचालित है। जब अर्जुन ने यह सुना, तो उनका मोह भंग हुआ और उन्हें समझ आया कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि ईश्वर उनके हर श्वास, हर विचार और हर कर्म में साथ हैं। यह ज्ञान ही गीता का सार है, जो मनुष्य को सामान्य से असाधारण बनाने की क्षमता रखता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक के निरंतर जप से मन में व्याप्त अनावश्यक चिंताएं समाप्त होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: जब हम जल पीते समय या सूर्य को देखते समय इस श्लोक का स्मरण करते हैं, तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • अहंकार का शमन: यह बोध कि 'पौरुष' भी ईश्वर का ही अंश है, मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर विनम्र बनाता है।
  • कर्म शुद्धि: यह श्लोक साधक को याद दिलाता है कि उसके हर कर्म में ईश्वर साक्षी हैं, जिससे वह पाप कर्मों से बचता है।
  • दिव्य दृष्टि: नियमित अभ्यास से साधक को संसार के हर पदार्थ में ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं।
  • भय मुक्ति: यह जानकर कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं, साधक के मन से मृत्यु और अनिष्ट का भय समाप्त हो जाता है।
  • ज्ञान की प्राप्ति: 'प्रणव' के चिंतन से बुद्धि प्रखर होती है और वेदों के गूढ़ रहस्यों को समझने की क्षमता विकसित होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह श्लोक साधक को 'योग' की अवस्था तक ले जाने में सहायक है, जहाँ वह स्वयं को परमात्मा से अभिन्न अनुभव करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और विभिन्न वैष्णव आचार्यों की टीकाओं के आधार पर संकलित की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत और तार्किक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। इस लेख में दी गई व्याख्याएं गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता' और 'उपनिषदों' के सिद्धांतों के अनुरूप हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल सूचना न मानकर अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, गीता के श्लोक स्वयं में सिद्ध मंत्र हैं। इन्हें श्रद्धा और पवित्रता के साथ कोई भी व्यक्ति जप सकता है।

जल का अपना कोई स्वाद नहीं होता, लेकिन वह जीवन का आधार है। यहाँ 'रस' का अर्थ उस जीवन शक्ति (Life Force) से है जो जल के माध्यम से हमें जीवित रखती है।

नहीं, पौरुष का अर्थ है—पुरुषार्थ, साहस, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलने की आंतरिक शक्ति। यह ईश्वर की ही एक विभूति है।

जब भी आप जल ग्रहण करें, एक क्षण के लिए रुकें और अनुभव करें कि यह ईश्वर का प्रसाद है। सूर्य को देखते समय उनके तेज में ईश्वर को देखें। यही अभ्यास आपको धीरे-धीरे ईश्वर के करीब ले जाएगा।

हाँ, यह श्लोक ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत (Law of Conservation of Energy) की ओर संकेत करता है। जिस प्रकार ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है, उसी प्रकार परमात्मा भी विभिन्न रूपों में व्याप्त हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! मैं जल का रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश हूँ, सभी वेदों में ॐकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ, और मनुष्यों में पौरुष (पुरुषार्थ) हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सर्वव्यापी है। हर वस्तु में उसका अंश है। इस भाव से सबमें ईश्वर के दर्शन करना ही सच्ची भक्ति है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/30 27% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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