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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 7

अध्याय 7 · श्लोक 7

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७॥

mattaḥ parataraṃ nānyat kiñcid asti dhanañjaya | mayi sarvam idaṃ protaṃ sūtre maṇi-gaṇā iva ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मत्तः: मुझसे; परतरम्: परे; न: नहीं; अन्यत्: अन्य; किञ्चित्: कुछ भी; अस्ति: है; धनञ्जय: हे धनंजय; मयि: मुझमें; सर्वम्: सब; इदम्: यह; प्रोतम्: पिरोया हुआ है; सूत्रे: धागे में; मणिगणा: मणियों के समूह; इव: जैसे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।

English Translation

There is nothing whatsoever higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, as clusters of gems on a thread.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान सर्वोच्च हैं। सारी सृष्टि उनके अधीन है और उनमें आधारित है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।