श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 6

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 39 मिनट का पठन 153 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
एतत्
इन दोनों (अपरा-परा प्रकृति) से
योनीनि
जिनकी उत्पत्ति है
भूतानि
समस्त भूत (प्राणी)
सर्वाणि
सभी
इति
इस प्रकार
उपधारय
समझ
अहम्
मैं
कृत्स्नस्य
सम्पूर्ण
जगतः
जगत का
प्रभवः
उत्पत्ति स्थान
प्रलयः
प्रलय स्थान
तथा
भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

समस्त प्राणी इन दोनों (अपरा और परा प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू समझ। और मैं सम्पूर्ण जगत का उत्पत्ति स्थान तथा प्रलय स्थान भी हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय (ज्ञानविज्ञानयोग) का यह छठा श्लोक संपूर्ण सृष्टि के उद्गम, अस्तित्व और विलीनीकरण के परम रहस्य को उजागर करता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह दिव्य संदेश दे रहे हैं कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी दृश्यमान या अदृश्य है, वह सब उन्हीं की परा और अपरा प्रकृति का विस्तार है। भारतीय सनातन दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर अनेक मत-मतांतर रहे हैं, परंतु गीता का यह श्लोक उन सभी सिद्धांतों को एक ही परम सत्ता में समाहित कर देता है। यहाँ 'अपरा प्रकृति' (जड़ तत्व जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) और 'परा प्रकृति' (चेतन तत्व यानी जीव शक्ति) दोनों को भगवान अपनी ही शक्तियाँ बताते हैं।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह हमें सिखाता है कि सृष्टि का कण-कण ईश्वरमय है। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे भीतर से द्वैत भाव, राग-द्वेष और अहंकार का समूल नाश हो जाता है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक व्याख्या नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) के साथ एकाकार होने का एक व्यावहारिक मार्ग है। इसके अनुशीलन से साधक को यह बोध होता है कि वह इस अनंत ब्रह्मांड से अलग नहीं है, बल्कि उसी परमेश्वर का एक अंश है जो संपूर्ण जगत का आदि और अंत है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६॥"

"etad-yonīni bhūtāni sarvāṇīty upadhāraya |
ahaṁ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayas tathā ||"

सरल हिंदी अनुवाद:

"हे अर्जुन! तुम ऐसा समझो कि संपूर्ण प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (परा और अपरा) से ही उत्पन्न होने वाले हैं। और मैं ही इस संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण (प्रभव) हूँ तथा प्रलय (विनाश) का भी कारण हूँ।"

पवित्र जप एवं साधना विधि:

इस श्लोक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसकी एक निश्चित साधना विधि है जिसका पालन करने से साधक के अंतःकरण की शुद्धि होती है:

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४:०० से ६:०० बजे) इस श्लोक के जप और ध्यान के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन व दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पूर्व ३ बार दीर्घ प्राणायाम करें ताकि मन स्थिर हो सके।
  • ध्यान: हृदय चक्र में भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज रूप या विराट रूप का स्मरण करते हुए श्लोक का उच्चारण करें।
  • संख्या: प्रतिदिन कम से कम २१ या १०८ बार इस श्लोक का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत का गहरा रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से प्रत्येक पद के शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ को विस्तार से समझाया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
एतत् (Etad) इन दोनों को यहाँ 'एतत्' शब्द पूर्व श्लोकों में वर्णित भगवान की दो प्रकृतियों—अपरा (जड़ जगत) और परा (चेतन जीव) की ओर संकेत करता है।
योनीनि (Yonīni) उत्पत्ति का कारण / गर्भ योनि का अर्थ है वह स्रोत जहाँ से जीवन का प्रादुर्भाव होता है। दोनों प्रकृतियाँ ही समस्त चराचर जीवों की माता-पिता के समान मूल कारण हैं।
भूतानि (Bhūtāni) समस्त प्राणियों को इसमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देव, दानव, पशु, पक्षी, वृक्ष और सूक्ष्म जीवाणु भी सम्मिलित हैं।
सर्वाणि (Sarvāṇi) सभी को / बिना किसी अपवाद के सृष्टि का कोई भी अंश ऐसा नहीं है जो इन दोनों प्रकृतियों से बाहर हो। सब कुछ इसी के अंतर्गत आता है।
इति (Iti) इस प्रकार / ऐसा यह निश्चयवाचक शब्द है, जो अर्जुन को इस सत्य पर पूर्ण विश्वास करने का निर्देश देता है।
उपधारय (Upadhāraya) जानो / हृदयंगम करो केवल बौद्धिक रूप से समझना नहीं, बल्कि इसे अपने जीवन के अनुभव में उतारना और गहराई से महसूस करना।
अहम् (Aham) मैं (परमेश्वर श्रीकृष्ण) यहाँ 'अहम्' किसी व्यक्ति विशेष का अहंकार नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापी परब्रह्म है जो सबका आधार है।
कृत्स्नस्य (Kṛtsnasya) संपूर्ण / समस्त का यह शब्द ब्रह्मांड की समग्रता को दर्शाता है। इसमें अनंत कोटि ब्रह्मांड और उनके सभी लोक समाहित हैं।
जगतः (Jagataḥ) संसार का / ब्रह्मांड का जो निरंतर गतिशील है, बदल रहा है, वही जगत है। इस परिवर्तनशील जगत का आधार अपरिवर्तनीय परमात्मा है।
प्रभवः (Prabhavaḥ) उत्पत्ति का स्थान / आदि कारण जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाला निकालती है, वैसे ही भगवान स्वयं से इस सृष्टि को प्रकट करते हैं।
प्रलयः (Pralayaḥ) विनाश / लय होने का स्थान अंत में सब कुछ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। वे ही सृष्टि के संहारकर्ता और अंतिम विश्राम स्थल हैं।
तथा (Tathā) और / भी यह शब्द उत्पत्ति और प्रलय दोनों क्रियाओं को समान रूप से भगवान के अधीन सिद्ध करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का सातवां अध्याय 'ज्ञानविज्ञानयोग' के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध करने की प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि जीवन और मृत्यु, सृष्टि और प्रलय के गूढ़ रहस्यों से भी अवगत कराया। इस अध्याय में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि ज्ञान क्या है और विज्ञान क्या है। 'ज्ञान' का अर्थ है ईश्वर के निराकार और साकार रूप को जानना, और 'विज्ञान' का अर्थ है सृष्टि के कण-कण में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना।

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें उपनिषदों के 'सत्कार्यवाद' और 'विवर्तवाद' को समझना होगा। मुण्डकोपनिषद् में एक अत्यंत सुंदर उदाहरण आता है:

"यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥" (मुण्डकोपनिषद् १.१.७)

अर्थात: जिस प्रकार मकड़ी स्वयं जाले का निर्माण करती है और फिर उसे अपने भीतर ही समेट लेती है, जिस प्रकार पृथ्वी से अनेक औषधियाँ और वनस्पतियाँ स्वतः उत्पन्न होती हैं, और जिस प्रकार जीवित मनुष्य के शरीर से बाल और रोम उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार उस अविनाशी परमेश्वर से ही इस संपूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है।

भगवान श्रीकृष्ण इसी उपनिषदिक सत्य को अत्यंत सरल भाषा में अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह संसार कोई संयोग नहीं है, न ही यह किसी शून्य से उत्पन्न हुआ है। इसके पीछे एक परम चेतना कार्य कर रही है। महाभारत के शांति पर्व में भी जब भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म और मोक्षधर्म का उपदेश देते हैं, तो वे इसी श्लोक के भाव को दोहराते हुए कहते हैं कि जो पुरुष संपूर्ण जगत को नारायण का ही रूप समझता है, वह कभी भी मोहग्रस्त नहीं होता।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में बैठे इस भय को दूर करना चाहते हैं कि वे अपने सगे-संबंधियों को मार रहे हैं। वे समझाते हैं कि जीवन और मृत्यु केवल प्रकृतियों का खेल है। आत्मा अजर-अमर है और वह स्वयं परमात्मा का ही अंश (परा प्रकृति) है। इसलिए, उत्पत्ति और प्रलय दोनों ही भगवान की लीला मात्र हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का श्रद्धापूर्वक पाठ और मनन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

१. भय और चिंता से मुक्ति

जब साधक को यह विश्वास हो जाता है कि सृष्टि का आदि और अंत भगवान ही हैं, तो उसके भीतर से मृत्यु और अनहोनी का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

२. मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक के नियमित जप से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो तनाव, अवसाद और मानसिक अशांति को दूर कर मन को शांत करती हैं।

३. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के दिव्य अक्षरों का उच्चारण शरीर के चक्रों को जागृत करता है, जिससे साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक आभामंडल (Aura) का निर्माण होता है।

४. अहंकार का नाश

यह जानकर कि सब कुछ ईश्वर की ही शक्ति से संचालित है, मनुष्य के भीतर का 'मैं' और 'मेरा' का भाव समाप्त हो जाता है, जिससे वह अधिक विनम्र बनता है।

५. कर्मों की शुद्धि (Karmic Purification)

ईश्वर को सृष्टि का एकमात्र कारण मानने से साधक अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करने लगता है, जिससे वह निष्काम कर्मयोगी बन जाता है।

६. एकाग्रता और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि

विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए इस श्लोक का पाठ अत्यंत लाभकारी है। यह बुद्धि को कुशाग्र करता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाता है।

७. अद्वैत भाव की जागृति

साधक सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर के दर्शन करने लगता है, जिससे समाज में बंधुत्व, करुणा और प्रेम की भावना का विस्तार होता है।

८. मोक्ष मार्ग की प्रशस्तता

इस श्लोक का निरंतर चिंतन साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर अंततः भगवान के परम धाम को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस लेख की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन किया गया है। आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक संजीवनी' और श्रील प्रभुपाद के 'भगवद्गीता यथारूप' के दार्शनिक दृष्टिकोण को इस व्याख्या का आधार बनाया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, विशुद्ध और प्रामाणिक सनातन ज्ञान को सरल भाषा में पहुँचाना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से आध्यात्मिक सत्यों को उजागर करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

अपरा प्रकृति भगवान की भौतिक या जड़ शक्ति है, जिसमें आठ तत्व शामिल हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। यह परिवर्तनशील और विनाशी है। इसके विपरीत, परा प्रकृति भगवान की आध्यात्मिक या चेतन शक्ति है, जिसे 'जीव' कहा जाता है। यह अविनाशी है और इसी के द्वारा संपूर्ण भौतिक जगत का उपभोग और संचालन होता है।

'प्रभव' का अर्थ है उत्पत्ति का स्थान और 'प्रलय' का अर्थ है विलीन होने का स्थान। जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है और अंत में मिट्टी में ही मिल जाता है, वैसे ही यह संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान श्रीकृष्ण की शक्तियों से ही प्रकट होता है और महाप्रलय के समय उन्हीं में समाहित हो जाता है। इसलिए वे ही सृष्टि के आदि और अंत हैं।

दैनिक जीवन में यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम किसी भी परिस्थिति में अकेले नहीं हैं। जब हम यह जान लेते हैं कि हमारे भीतर और बाहर की हर वस्तु ईश्वर की ही शक्ति है, तो हम जीवन के उतार-चढ़ाव में विचलित नहीं होते। यह हमें प्रकृति का सम्मान करना और सभी जीवों के प्रति दयाभाव रखना सिखाता है।

हाँ, इस श्लोक में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वास है। जब हम इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, तो हमारे मन के नकारात्मक विचार नष्ट होते हैं जिससे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान के विराट रूप का स्मरण करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव भी शांत होते हैं।

यहाँ 'योनीनि' का अर्थ 'उत्पत्ति का कारण' या 'गर्भ' है। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि परा और अपरा प्रकृतियाँ मिलकर एक ऐसे दिव्य गर्भ का निर्माण करती हैं जिससे ८४ लाख योनियों के जीवों की उत्पत्ति होती है। इन दोनों प्रकृतियों के पीछे जो परम पुरुष हैं, वे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

समस्त प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (अपरा और परा) से उत्पन्न होते हैं – ऐसा समझ। और मैं ही सम्पूर्ण जगत का उत्पत्ति स्थान और प्रलय स्थान हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही सृष्टि के मूल कारण हैं। सब कुछ उन्हीं से उत्पन्न होता है और अंत में उन्हीं में विलीन हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/30 20% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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