श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 5

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 24 मिनट का पठन 165 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
अपरा
अपरा (नीची)
इयम्
यह
इतः
इससे
तु
तो
अन्याम्
दूसरी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
विद्धि
जान
मे
मेरी
पराम्
परा (श्रेष्ठ)
जीवभूताम्
जीवस्वरूपा
महाबाहो
हे महाबाहो
यया
जिससे
इदम्
यह
धार्यते
धारण किया जाता है
जगत्
जगत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! यह (आठ तत्त्वों वाली) मेरी अपरा (नीची) प्रकृति है, परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 5 - आध्यात्मिक विवेचन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का यह पांचवां श्लोक संपूर्ण वेदांत दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को सृष्टि की दोहरी संरचना का बोध करा रहे हैं। एक ओर 'अपरा' प्रकृति है, जो जड़ है—पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और मन, बुद्धि, अहंकार से निर्मित है। दूसरी ओर 'परा' प्रकृति है, जो स्वयं जीव है। यह श्लोक इस बात का उद्घोष है कि यह भौतिक जगत स्वयं में निर्जीव है; इसे चेतनता प्रदान करने वाली शक्ति केवल 'जीव' है, जो परमात्मा का ही अंश है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है। हम केवल मांस-मज्जा का शरीर नहीं हैं, बल्कि उस 'परा प्रकृति' का हिस्सा हैं जो इस पूरे ब्रह्मांड को धारण किए हुए है। जब हम इस सत्य को आत्मसात करते हैं, तो हमारे भीतर का अहंकार स्वतः विलीन होने लगता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक सूत्र में मणियाँ पिरोई होती हैं, उसी प्रकार यह संपूर्ण जगत परमात्मा की परा शक्ति द्वारा धारण किया गया है। इसका महत्व इस बात में है कि यह हमें पदार्थवाद (Materialism) से ऊपर उठाकर आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) की ओर ले जाता है। यह ब्रह्मांडीय चेतना का वह बिंदु है जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता का मिलन होता है। यहाँ कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि जीव का महत्व भौतिक जगत से कहीं अधिक है, क्योंकि जीव ही वह सेतु है जो परमात्मा को इस संसार से जोड़ता है। इस ज्ञान का चिंतन करने से साधक के हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का उदय होता है, क्योंकि वह समझ जाता है कि हर जीव में वही 'परा प्रकृति' विद्यमान है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता रखें। 'अपरेयमितस्त्वन्याम्' का उच्चारण करते समय संधि विच्छेद का ध्यान रखें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसका लयबद्ध पाठ मानसिक एकाग्रता को तीव्र करता है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके इसका तीन बार पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अपरानिम्न स्तर कीजड़ प्रकृति, जो केवल भौतिक पदार्थों का समूह है।
इयम्यहजो हमारे समक्ष दृश्यमान संसार है।
इतःइससेअपरा प्रकृति से भिन्न।
तुलेकिनएक विशेष अंतर को स्पष्ट करने हेतु।
अन्याम्दूसरीपरमात्मा की एक और शक्ति।
प्रकृतिम्प्रकृतिईश्वर की कार्य करने की शक्ति (माया)।
विद्धिजानोइसे केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अनुभव का विषय बनाओ।
मेमेरीयह प्रकृति ईश्वर से पृथक नहीं, उनकी ही है।
परामश्रेष्ठ/दिव्यचेतन शक्ति, जो जड़ को गति देती है।
जीवभूताम्जीव रूपवह शक्ति जो आत्मा के रूप में स्थित है।
महाबाहोहे महाबाहोअर्जुन को संबोधित करते हुए, उनकी वीरता को स्मरण दिलाना।
ययाजिसके द्वारावह शक्ति जो आधार है।
इदम्यहसंपूर्ण ब्रह्मांड।
धार्यतेधारण किया जाता हैसृष्टि का अस्तित्व इसी शक्ति पर टिका है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में, जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' का ज्ञान दिया। यह श्लोक उसी ज्ञान की आधारशिला है। पौराणिक संदर्भों में, 'प्रकृति' को 'माया' कहा गया है। सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति और पुरुष का मिलन ही सृष्टि का कारण है। यहाँ कृष्ण स्वयं को 'पुरुषोत्तम' के रूप में स्थापित कर रहे हैं और यह बता रहे हैं कि प्रकृति (माया) उनकी ही दासी है।

वेदों में 'परा' और 'अपरा' का वर्णन 'क्षर' और 'अक्षर' पुरुष के रूप में मिलता है। उपनिषदों में कहा गया है—"एकोऽहं बहुस्याम" (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊं)। इस श्लोक में कृष्ण उसी 'बहुस्याम' की प्रक्रिया को समझा रहे हैं। जब वे कहते हैं कि "जीवभूतां महाबाहो", तो वे अर्जुन को यह याद दिला रहे हैं कि तुम केवल एक योद्धा नहीं हो, बल्कि तुम उस शाश्वत चेतना का अंश हो। यह ज्ञान केवल कुरुक्षेत्र तक सीमित नहीं है; यह आदिकाल से ऋषियों की परंपरा में चला आ रहा है। महर्षि व्यास ने इसे गीता में पिरोकर मानव जाति को यह संदेश दिया है कि संसार के दुखों का मूल कारण 'अपरा' प्रकृति में आसक्ति है। जब मनुष्य 'परा' प्रकृति (आत्मा) को पहचान लेता है, तो वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक हमें यह भी बताता है कि ईश्वर इस संसार से दूर नहीं, बल्कि संसार के कण-कण में जीव के माध्यम से व्याप्त हैं। यही अद्वैत का मूल सिद्धांत है जो हमें समस्त सृष्टि के प्रति समभाव रखने की प्रेरणा देता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-बोध की प्राप्ति: नियमित चिंतन से व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का बोध होता है, जिससे व्यर्थ के भय समाप्त होते हैं।
  • मानसिक स्थिरता: यह श्लोक मन को भौतिक आकर्षणों से हटाकर आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
  • अहंकार का शमन: यह बोध कि हम केवल एक 'जीव' हैं जो परमात्मा द्वारा धारण किए गए हैं, अहंकार को नष्ट करता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से मन में दिव्य तरंगें उत्पन्न होती हैं।
  • कर्मिक शुद्धि: जब हम यह समझ लेते हैं कि सब कुछ ईश्वर की शक्ति से हो रहा है, तो हम कर्तापन के भाव से मुक्त हो जाते हैं।
  • एकाग्रता में वृद्धि: श्लोक का लयबद्ध पाठ मस्तिष्क की एकाग्रता शक्ति को बढ़ाता है।
  • समभाव की उत्पत्ति: सभी जीवों में उसी 'परा प्रकृति' को देखने से प्रेम और करुणा का विस्तार होता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान के स्वरूप का चिंतन करने से साधक को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) के अंतर्गत आती है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्रीधर स्वामी के भाष्य) के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है। हमने सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक शब्द का अर्थ मूल संस्कृत व्याकरण और वेदांत दर्शन के सिद्धांतों के अनुरूप हो। यह लेख किसी भी प्रकार के अवैज्ञानिक दावों से मुक्त है और पूर्णतः आध्यात्मिक शोध पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

अपरा प्रकृति जड़ है (पदार्थ), जबकि परा प्रकृति चेतन है (आत्मा)। अपरा प्रकृति परिवर्तनशील है, जबकि परा प्रकृति शाश्वत है।

जीव ईश्वर का अंश है। जिस प्रकार सूर्य की किरण सूर्य से अलग नहीं है, उसी प्रकार जीव परमात्मा का ही अंश है, परंतु वह माया के प्रभाव में स्वयं को सीमित मान लेता है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम भौतिक वस्तुओं के पीछे न भागें, बल्कि अपने भीतर की चेतना को पहचानें। यह तनाव कम करने और जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने में सहायक है।

महाबाहो का अर्थ है 'विशाल भुजाओं वाला'। यह अर्जुन की वीरता का प्रतीक है, लेकिन यहाँ कृष्ण इसका उपयोग अर्जुन को उनके कर्तव्य और उनकी आंतरिक शक्ति का स्मरण दिलाने के लिए कर रहे हैं।

कोई कठोर नियम नहीं है, परंतु शुद्धता और श्रद्धा अनिवार्य है। इसे शांत मन से, अर्थ को समझते हुए पढ़ना ही सबसे उत्तम विधि है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! यह आठ तत्त्वों वाली मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है। परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (उच्च) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जीवात्मा ईश्वर की उच्चतर शक्ति है। वह शरीर और इन्द्रियों से परे है और समस्त जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/30 17% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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