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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 · श्लोक 5

अध्याय 7 · श्लोक 5

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥

apareyam itas tv anyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām | jīva-bhūtāṃ mahā-bāho yayedaṃ dhāryate jagat ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अपरा: अपरा (नीची); इयम्: यह; इतः: इससे; तु: तो; अन्याम्: दूसरी; प्रकृतिम्: प्रकृति को; विद्धि: जान; मे: मेरी; पराम्: परा (श्रेष्ठ); जीवभूताम्: जीवस्वरूपा; महाबाहो: हे महाबाहो; यया: जिससे; इदम्: यह; धार्यते: धारण किया जाता है; जगत्: जगत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे महाबाहो! यह (आठ तत्त्वों वाली) मेरी अपरा (नीची) प्रकृति है, परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।

English Translation

This is the inferior Prakriti, O mighty-armed; but know My other Prakriti, the superior, which is the very life-element, by which this universe is sustained.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अब कृष्ण अपनी परा (दिव्य) प्रकृति का वर्णन करते हैं – जीवात्मा। जीव ही इस जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।